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इसराइलः सरकार पर संशय

इसराइल की 120 सदस्यीय ससंद (नेसेट) के चुनाव में देश की किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से वहां तीसरी दफा चुनाव कराने की आशंका पैदा हो रही हैं। प्रधानमंत्री बैजामिन नेतन्याहू की दक्षिण पंथी लिकुड पार्टी को केवल 31 सीटें जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी मध्यमार्गी बेन्नी गैंट्स की ब्लू एंड व्हाइट पार्टी को 33 सीटें मिली है। पूर्व रक्षामंत्री एविग्डोर लिबरमैन की इसराइल ब्येन्टु पार्टी को 9 स्थान प्राप्त हुए हैं। जबकि अरब पार्टियों के गठबंधन ने 13 स्थानों पर जीत दर्ज की है। यद्वपि राष्ट्रपति रूवन रिवलिन राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के प्रयास में लगे हैं। राष्ट्रपति के आग्रह पर नेतन्याहू और बेन्नी गैंट्स द्वारा यूनिटी गर्वेंमेंट के विकल्प पर सहमत हो जाने के समाचार भी आ रहें हैं।
इससे पहले अप्रेल माह में हुए चुनाव में लिकुड और ब्लू एंड व्हाइट दोनों ही दलों को 35-35 स्थान मिले थे। संसद में लिकुड पार्टी को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं मिलने पर नेतन्याहू सरकार बनाने में विफल हो गए थे। परिणाम स्वरूप देश में दोबरा चुनाव करवाने पड़े।
ताजा चुनाव परिणामों में इसरायली जनता ने किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं दी है, ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि पिछले एक दशक से सत्ता में बने रहने वाले प्रधानमंत्री बंेजामिन नेेतन्याहू सत्ता से रूखसत होंगे या किसी ईश्वरीय चमत्कार के चलते वह पांचवी दफा इसराइल के प्रधानमंत्री बन सकेंगे। हालंाकी नेतन्याहू के गठबंधन को संसद में 55 सीटें हासिल हुई है। दुसरी और बैनी गैंट्स ने 57 सदस्यों के गठबंधन का दावा किया है। जोड़तोड की राजनीति के जादुगर कहे जाने वाल नेतन्याहू की असल परीक्षा इस बात को लेकर है कि वह बहुमत के आंकडे़ तक कैसे पंहुचते हैं।
पूर्व आर्मी चीफ आॅफ स्टाफ बेन्नी गैंट्स की ब्लू एंड व्हाइट पार्टी ने देश को साफ सुथरी सरकार देने के वादे पर अपना चुनाव अभियान चलाया ।यदि गैंट्स एक वामपंथी गठबंधन के साथ मिलकर काम करने को राजी हो जाते हैं तो उनका गठबंधन 57 सीटों तक पहंुच सकता है। नेतन्याहू के पास पहले से ही 55 सदस्यों का गठबंधन है। नेतन्याहू के गठबंधन में 38 दक्षिणपंथी और 17 अति रूढ़िवादी लोग है, ऐसे में दोनों ही नेता एविग्डोर लिबरमैन की इसराइल ब्येन्टु पार्टी के सहयोग पर निर्भर रहेेंगे, जिसके पास कुल 9 सीटें है।
इसराइल का संसदीय इतिहास इस बात का गवाह है कि वहां के मतदाताओं ने पिछले सात दशकों में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, लेकिन इसके बावजूद नेतन्याहू किसी न किसी तरह सत्ता की चैखट तक पहंुचने में कामयाब होते रहे हैं। ताजा चुनाव परिणामों में उन्हें पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला है फिर भी साल 2009 में प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका दूसरा सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन है। इससे पहले साल 2009 में उन्हंे 27, 2013 में 18 तथा 2015 के चुनाव में 30 सीटंे मिली, जबकि अप्रेल 2019 में उन्हें संसद में 35 सीटें मिली थी।
यद्वपि नेतन्याहू के नेतृत्व में इसराइल आर्थिक व सामरिक मोर्चें पर खुब फला फुला हैं। अमेरिका सहित दुनिया के सभी बडे़ देशों के नेताओं के साथ नेतन्याहू के अच्छे संबंध है। इसके बावजूद इसराइल की जनता ने उनकी पार्टी लिकुड को केवल 31 सीटे दी है। नेतन्याहू के पूरे चुनाव अभियान का बारिकी से विश्लेषण करे तो एक बात तो साफ हो जाती है कि नेतन्याहू को अपने अरब विरोधी रूख की कीमत इस चुनाव में चुकानी पड़ी। नेतन्याहू चाहते थे कि लोकतांत्रिक देश के रूप में इसराइल के अस्तित्व को नकारने वाली यहूदी विरोधी अरब पार्टियों की इसराइल में कोई जगह न हो। अपने दक्षिणपंथी आधार को मजबूत करने के लिए जिस तरह से उन्होंने अरब नेताओं को नजर अंदाज करना शुरू किया उसके परिणामस्वरूप अरब पार्टियां आपसी मतभेद भुलाकर एक हो गयी। इन पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा और बड़ी कामयाबी हासिल की। इसराइल में अरबों की संख्या 18 लाख के करीब है जो वहां की आबादी का कुल 20 प्रतिशत है। इसका परिणाम यह हुआ कि वामपंथी और अरब मतदाता बड़ी संख्या में नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने की कोशिशों में जुट गये। चुनाव परिणाम के बाद अब जो समीकरण बन रहे है उसे देखते हुए लगता है, उनकी कोशिशें सफल भी हो जांएगी। इसके अलावा उनकी सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और कुशासन से भी जनता नाखुश थी। इन सबके चलते नेतन्याहू मुश्किल में आ गए।
पांचवी बार प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने का सपना देख रहे नेतन्याहू अगर सत्ता से बाहर होते हैं तो इसका असर भारत- इसराइल संबंधों पर भी दिख सकता है। भारत ने इसराइल के साथ कई बडे़ रक्षा सौदे किए हंै। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेतन्याहू के बीच काफी अच्छे संबंध है। यह संबंध तब और अधिक मजबूत हुए जब जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल गए थे।
यद्यपि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सितंबर 1950 में ही इसराइल को मान्यता दे दी थी फिर भी दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने में 70 वर्ष का समय लग गया। पहले भारत हमेशा फिलीस्तीन के पक्ष में खड़ा दिखाई देता था। राजीव गांधी ने वर्ष 1985 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन के समय इसराइल के प्रधानमंत्री शायमन पेरेज से मिलकर संबंध बहाली की दिशा में कदम बढाया। उस समय दोनों देशों के बीच कुछ औपचारिक करार हुए और संबंधों को सामान्य करने की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ी।
इसरायल भारत का महत्वपूर्ण डिफंेस स्पलायर है। भारत के सामने जब भी कोई सामरिक संकट उपस्थित हुआ है तो उस वक्त इसराइल ने आगे बढकर हमारी मदद की है। नेतन्याहू 9 सिंतबर को भारत आने वाले थे लेकिन चुनाव के चलते उन्हें अपनी यात्रा रद्व करनी पड़ी।
इसराइल के सत्तर सालों के इतिहास में यह पहला मौका है जबकि छः माह के अंतराल में दो दफा चुनाव होने के बावजूद सरकार के सवाल पर संशय बना हुआ है। नेतन्याहू या गैंट्स जोड़-तोड़ से कोई सरकार बना भी लेते है, तो भी इसराइल मंे राजनीतिक स्थिरता की गांरटी बहुत कम होगी। हालांकी नेतन्याहू ने अपने मुख्य प्रतिद्वद्वी गैं्टस से मिलकर एकता सरकार बनाने की अपील की है ताकि तीसरी बार चुनाव कराने की नौबत न आए लेकिन गैंट्स खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते है। ऐसे में गैंट्स की ब्लू एंड व्हाइट पार्टी या नेतन्याहू की रूढिवादी लिकुड पार्टी संसद में पर्याप्त सीटों के साथ एक गंठबंधन बनाने के लिए उभरेगी यह बताना जल्दबाजी होगा। हाल फिलहाल जो परिस्थितियां बन रही है उसमंे एक बात तो साफ है कि इसराइल में नेतन्याहू युग का समापन लगभग तय हैं। ऐसे में भारत को वहां होने वाले नेतृत्व परिर्वतन पर नजर रखनी होगी तभी भारत इसराइल में अपने हितों को सुरक्षित रख सकेगा।


-एन. के. सोमानी
( व्याख्याता अर्तराष्ट्रीय राजनीति)
एम.जे.जे. गल्र्स काॅलेज,सूरतगढ
जिला- श्री गंगानगर (राज0)
मो0 98284-41477

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