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उस दिन के ख्वाब सजाओ जो…..!

यदि कोई हमें भरमाए नहीं तो न ही चैन मिलता है और न ही आँखों में निंदिया रानी झांकती है। बचपन से ही हमने भ्रम में रहने की आदत डाल ली है या यूं कहें कि भ्रम में रहने की आदत डाल दी गई है कि यथार्थ की बात हम सुनना ही नहीं चाहते!सही भी है कि वास्तविकता से दो-चार होने में भारी मानसिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
चाँद को हम मुठ्ठी में कैद कर लेना चाहते हैं।चाँद भी बेचारा धरती पर उतरकर थाली-कटोरी में पनाह ले लेता है।बड़े होते हैं तब भी चाँद-सितारों की जिद और किसी के लिए क्या कुछ करने की चाहत पर चाँद-सितारे तोड़ कर ला देने का वायदा, आश्वासन या घोषणा ! जब हम भ्रम से ही जीवन चक्र प्रारम्भ करते हैं, तब इसके बढ़ते क्रम में भ्रम से छुटकारा कैसा!बचपन में यह सुनना कितना अच्छा लगता था,जब कहा जाता था-
“आओ तुम्हें चाँद पे ले जाएँ,प्यार भरे सपने सजाएँ
छोटा सा बंगला बनाएँ,एक नई दुनिया बसाएँ।”
या फिर यह भी कि-
“गुड़िया रानी बिटिया रानी,परियों की नगरी से एक दिन
राजकुंवर जी आएंगे,महलों में ले जाएंगे।”
तो हुजूर, हम तो बचपन से ही भ्रम में जी रहे हैं, कभी चाँद पर ले जाने की बात तो कभी महलों के सपने!इससे कम पर तो हम मानने वाले भी नहीं।यह बात वे भी जानते हैं।ऐसे में हमारे पालनहार यदि घोषणावीर न बनें तो क्या बनें!क्या वे यह कहें कि नहीं भाई,सारे ठेके हम अपने भाई-बन्धु, रिश्तेदारों को ही देंगे क्योंकि यही हमारा कर्तव्य है।या फिर यह कहकर वोट मांगे कि भइये,काम तो हम तोहार करेंगे ही और तुम्हरे लिए भी बहुते काम करेल,पर हमरा कमीसन फीक्स होएल।इसपे कोई चू चपड़ नइ।
कहने का मतलब यही है कि सही बात किसी को हजम होगी नहीं और इसीलिये उन्हें कल्पना लोक का निर्माण करना पड़ता है।इस काम में जो जितनी बाजीगरी दिखाते हुए तिलस्म खड़ा कर ले,बाजी उसके हाथ।
किसी का तिलस्मी जाल अच्छे दिन दिखाकर चकाचौंध कर देता है जिसमें बैंक खातों में नोटों की बरसात होते दिखाई दे जाए तो किसी का तिलस्मी जाल सच्चे दिन दिखाकर फाँसने की कोशिश करता है।इसमें कुछ लोगों को लगता है कि कुछ हजार नोट मिल जाने से गरीबी की दीमक मिट जाएगी,रोजगार की दरिया बह निकलेगी, अभी तक हुए अन्याय को मिटाकर न्याय का समन्दर लबालब भर जाएगा।ऐसे तिलस्म बजरिये पत्र ही पैदा किये जा सकते हैं,चाहे वह दृष्टि पत्र हो,संकल्प पत्र हो या घोषणा पत्र हो।वायदों,आश्वासनों और नारों से ही नजर बाँधने वाली तिलस्म पैदा होती है।जिस तरह बचपन में हवाई बातें कर बच्चे को सुलाया जाता था,ठीक उसी तरह आम जन को भी सोने की आदत है और ये पालनहार अपने घोषणा पत्र के जरिये कुछ इस तरह से सुलाते हैं या कहें कि भरमाते हैं जिससे भ्रम में रहकर पाँच साल भरपूर नींद ली जा सके –
“मैं गाऊं तुम सो जाओ
सुख सपनो में खो जाओ
माना आज की रात है लम्बी
माना दिन था भारी
पर जग बदला
बदलेगी एक दिन तकदीर हमारी
उस दिन के ख्वाब सजाओ।”

डॉ प्रदीप उपाध्याय,
16, अम्बिका भवन, बाबूजी की कोठी, उपाध्याय नगर, मेंढकी रोड़, देवास, म.प्र.

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