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कविता : ‘एक चिड़िया’

‘एक चिड़िया’
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संस्कारों के ढहते  किलों के नीचे
दब गई है /एक चिड़िया/ उसकी चहक
वहशी दरिंदों की शिकार/
सुनहले सपनों के सूरज की किरण न देख सकी
ना देख सकी कल का प्रभात
एक आघात
जो हिला गया
पुरे देश को /सब की आत्मा को
अश्रु से भर गए आँख/ किन्तु
लाश पर होती रही राजनीति
ऐसी अनीति?
जो वर्षों से पल रही है /
कुछ लोगों के नीच विचारों में
महल/ चौबारों में
और चिड़िया फड़फड़ा  रही है /
तड़प रही है /
व्यवस्था की जर्जर डालियों पर
जहाँ ना नैतिकता के पत्ते हैं
न सुविचारों के फूल /
यहाँ तो बस
शूल ही शूल
किन्तु
नम आँखों से
हजारों लाखों द्वारा
दी गई विदाई
किसी महान आत्मा को
कहाँ नसीब होने वाली है
हो भी तो कैसे ?
इसी विदाई की जड़ में तो
क्रांति की एक आग है
बदलाव का तारसप्तक है
तुम्हारी मृत्यु
दामिनी, निर्भया या ज्योति जो कहें
अवश्य दिखाएगा एक रास्ता
तुम्हारा बलिदान
फिर होगा
भारत महान
और इसी महानता के शब्दों में
तुम चहकती रहोगी
मेरी चिड़िया !

सन्तोष पटेल

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