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कविता : कन्यादान

तू जिगर का टुकड़ा है मेरा
कैसे तुझसे मैं अंजान बनूं।
तू वस्तु नहीं जान है मेरी
भला कैसे मैं तेरा दान करूं?

तुझसे महकता है मेरा घर-आंगन
तुम्ही से है मेरा यह जीवन ।
मेरे जीवन का आधार ,मेरा प्राण है तू
भला कैसे मैं तेरा दान करूं?

बस विदा करता हूं मैं तुझे नए घर को
तू जाके उस घर को भी अब स्वर्ग बना ।
पर तू न गुपचुप कोई दर्द सहना
न खुद को अकेली-असहाय समझना ।
मेरे लिए तो प्रभू का वरदान है तू
भला कैसे मैं तेरा दान करूं?

ससुरा में लगना पुष्प बनके महकने
पर आती रहना मेरी बगिया में चहकने ।
यहां अपने हैं सब तेरे,
रहती है तू सबके दिलों में
तो भला एक पल में
कैसे मैं तुझे पराया कर दूं?

न कोई अनचाही चीज है तू
न इस बाप पे कोई बोझ है तू ।
मेरी दुनिया मेरा जहां है तू
तुझे ना मैं खुदसे बेगाना करूं
बांधता हूं तुझे एक नए बंधन में
पर मैं ना कभी तेरा दान करूं ।।

कर दूं जो दान तू हो जाएगी पराई
किस अभागे ने है ए रीत बनाई?
तू है मेरे जीवन भर की कमाई
फिर कैसे मैं तुम्हारा दान करूं?

मुकेश सिंह
सिलापथार,असम।
मो०- 09706838045
[email protected]

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