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कविता : नव सृजन

नव सृजन
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उठो जागो अब वहुत हो चुका विश्राम
समय खिसक रहा नही रहा अभिराम।

सबको जागृत कर दग्ध हृदय में
नयी स्फूर्ति उत्साह का निज धाम
समरसता सौहार्द कर्तव्यभाव से
बोधतत्व से पूरित जीवन दल को॥१॥

जयकार ध्वनि सुखशान्ति प्रेरित
अन्तर्द्वन्द मन को व्यथित हृदय
आप्लावित हो उठे आध्यात्म शक्ति
अन्धकार तिमिर मिटे जीवनदल को ॥२॥

उद्धेलित कर दो अलसाये मन को
नयी स्फूर्ति प्रेरणा से जन जन को
स्वागत समय अभिनन्दन प्रेम भाव
आप्लावित कर दो सुख दे जीवन को॥३॥

नया सबेरा नयी चाह पुकार रही
भेदभाव राग द्वेष अभिमान भाव
ध्वलित हो उठे सबके अवगुंठन
सुधा रस बरसा जीवन धन को॥४॥

उठो जागो अब हो चुका बहुत विश्राम
समय खिसक रहा नही रहा अभिराम।

डा. देवनारायण शर्मा
सुल्तान पुर ,उत्तर प्रदेश

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