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क्या इस आरक्षण से प्रधानमंत्री पद आरक्षित हो पाएगा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काफी सोची समझी रणनीति के तहत लोकसभा चुनाव के एक सौ दिन पहले आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण देने का चुनावी दाव खेला है, यद्यपि सीतापुर (उ.प्र.) की जनसभा में उन्होंने ‘‘एक पत्थर से दो शिकार’’ की तर्ज पर चुनाव से पहले यह विधेयक लाने का जवाब दे दिया है, उन्होंने जहां यह कहा कि- ‘हमारे देश में तो बारहों महिने चुनाव होते रहते है, इसलिए जब भी यह विधेयक लाता तब यही सवाल उठता, इसलिए इस आरोप का कोई अर्थ नहीं है।’’ साथ ही प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में अपनी वह मनोकामना भी यह कहकर प्रस्तुत कर दी कि- ‘‘मैं चाहता हूँ कि देश में अब लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हो, जिससे कि पाँच साल के लिए चुनाव का झंझट ही खत्म हो जाए।’’ लेकिन प्रधानमंत्री जी की इस सफाई के बाद ही यह सवाल तो अपनी जगह है ही कि यदि ऐसा ही था तो पिछले साढ़े चार साल के शासन काल में यह विधेयक क्यों नहीं लाया गया? और क्या अब इस विधेयक के पारित हो जाने और माननीय राष्ट्रपति जी के हस्ताक्षर के बाद इसके लागू हो जाने के बाद केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए ‘‘प्रधानमंत्री की कुर्सी’’ फिर से आरक्षित हो जाएगी?
यद्यपि इस आरक्षण विधेयक के प्रस्तुतिकरण के समय सरकार की ओर से कहा गया कि यह दस फीसदी कोटा किसी अन्य प्रचलित कोटे को कम करके नहीं दिया गया है, तथा यह आरक्षण सिर्फ और सिर्फ आर्थिक आधार पर अर्थात् आठ लाख रूपये से कम वार्षिक आमदानी वालों के लिए है, इसमें कोई जाति या धर्म आदि का विभेद नहीं है। सरकार के इस स्पष्टीकरण पर यह सवाल भी उठाया गया कि यदि आठ लाख रूपये वार्षिक की आय से कम वाला परिवार गरीब होकर आरक्षण प्राप्त करने का अधिकारी है तो फिर आयकर की सीमा सिर्फ ढ़ाई लाख क्यों रखी गई? उसे भी बढ़ाकर आठ लाख किया जाना चाहिए, जिससे तथाकथित गरीब परिवार आयकर के बंधन से मुक्त हो सके?
यद्यपि सरकार या प्रधानमंत्री ने इस सवाल का कोइ्र जवाब नहीं दिया है, किंतु प्रधानमंत्री या सरकार कितनी ही दलीलें पेश करें, किंतु यह एकदम सही है कि यह आरक्षण प्रधानमंत्री का चुनावों के पहले का ‘मास्टर स्ट्रोक’ है और चूंकि 190 मिलियन परिवार लाभान्वित होने वाले है, जो देश के महत्वपूर्ण मतदाता है, इसलिए कांग्रेस सहित किसी भी बड़े विपक्षी दल ने इस विधेयक का विरोध भी नहीं किया और यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से आसानी से पारित भी हो गया, कोई भी दल वोटरों की इतनी बड़ी संख्या को नाराज कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की हिम्मत नहीं कर सकता था।
ऐसा कतई नहीं है कि मोदी जी के इस दांव को आज से पहले किसी ने भी खेलने की कौशिश नहीं की, नब्बे के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने में काफी हिम्मत दिखाई थी तो इससे पहले पी.व्ही. नरसिंहराव के शासनकाल में भी ऐसा ही विधेयक लाया गया था, किंतु बिना संविधान संशोधन के आरक्षण विधेयक प्रस्तुत किया गया था, इसलिए वह लागू नहीं हो पाया था। अब मोदी जी ने उसी विधेयक को संविधान संशोधन के साथ प्रस्तुत किया और वह संसद से पारित होकर लागू होने की राह पर है।
अब इसमें तो कोई दो राय नहीं कि यह आरक्षण विधेयक लोकसभा के भावी चुनावों में अपनी जीत के लिए ही प्रधानमंत्री द्वारा लाया गया है, अब इसकी नुक्ताचीनी भी काफी होगी क्योंकि कई राजनीतिक व सामाजिक संगठन आरक्षण कोटे की सीमा पचास फीसदी से अधिक करने का दबाव बनाने लगे है और साथ ही यह भी दलील दी जाने लगी है कि देश में पिछड़े वर्गों के सदस्यों की संख्या ज्यादा है, और यह सबसे बड़ा ‘वोट बैंक’ है, इसलिए मतदाताओं के इस वर्ग को आरक्षण में और अधिक सुविधाऐं दी जानी चाहिए, यदि इस दलील पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो इसका असर आगामी चुनावों में देखने को मिल सकता है। केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा पिछड़े वर्गों में अपनी पैठ बढ़ाने का लाभ आम चुनाव व उत्तरप्रदेश में देख ही चुकी है, इसलिए अब वर्तमान स्तर पर उठाई गई इस मांग को भाजपा नजरअंदाज नहीं कर पाएगी।
यद्यपि मौजूदा आरक्षण विधेयक का आधार आर्थिक माना गया है, किंतु अब कुछ ऐसी स्थितियां निर्मित होने लगी है कि इसे जातिय जाल से दूर नहीं रखा जा सकेगा, क्योंकि इस आरक्षण ने पहले से आरक्षण प्राप्त वर्गों को और अधिक आरक्षण सुविधा प्राप्त करने के लिए आकर्षित जो किया है? इसी परिपे्रक्ष्य में उस मांग को देखा जाना चाहिए जिसके तहत् कई राजनीतिक दलों ने ओबीसी कोटा सत्ताईस फीसदी से बढ़ाकर दुगुना अर्थात् चैपन फीसदी करने की मांग कर डाली है। सपा और राजद ने तो अपनी इस मांग के समर्थन में आंदोलन चलाने की घोषणा भी कर डाली है। भाजपा और प्रधानमंत्री फिलहाल इस मांग पर मौन है।
इधर सरकार की इस राजनीतिक लाभकारी पहल ने उस पुरानी मांग को फिर हवा दे दी है, जिसके तहत् जातिगत जनगणना की रिपोर्ट व आंकड़े उजागर करने की मांग की जा रही थी और सरकार उन्हें गोपनीय बता रही थी। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मोदी सरकार ने 2020 की जनगणना के पहले देश में पिछड़े वर्गों की जनगणना कराने तथा उसके आंकड़े जुटाकर उन्हें गोपनीय रखने का फैसला लिया था और 2010 के जातिगत जनगणना आंकड़ों को भी गोपनीय रखा था।
इस तरह कुल मिलाकर यह सही है कि आरक्षण मोदी जी का चुनावी मास्टर स्ट्रोक है, किंतु इस विधेयक के संसद से पारित हो जाने और राष्ट्रपति जी के हस्ताक्षर के बाद लागू भी हो जाने के बाद क्या मोदी जी की प्रधानमंत्री पद की कुर्सी सुरक्षित हो गई है, ऐसा फिलहाल सुनिश्चित रूप से तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि फिलहाल मोदी जी के इस कदम ने देश में नई सियासती हलचल तो पैदा कर ही दी है, इससे निपटना भाजपा व मोदी जी के लिए एक चुनौति ही है?

ओमप्रकाश मेहता

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