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खेती किसानी में नवाचार का उजाला भरने वाले डॉ महेंद्र मधुप

देश के ख्यातनाम और लब्ध प्रतिष्ठित कृषि पत्रकार डॉ महेंद्र मधुप राजस्थान के एक ऐसे शख्सियत है जिन्होंने खेत और खलिहान के विकास का बीड़ा उठाकर कृषि वैज्ञानिकों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच मुहैया करा कर एक नई पहचान दिलाई है। अधिकांश किसान वैज्ञानिक बहुत कम शिक्षित हैं मगर इनके पास खेतीबाड़ी का बेजोड़ तुजुर्बा है जिनके बुते पर उन्होंने कृषिजन्य कार्यों को आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचाकर नए आयाम स्थापित किये। इन किसानों की यह जीवटता ही है की उन्होंने पुस्तैनी खेतीबाड़ी में नवाचार अपनाकर नया इतिहास रच दिया। डॉ मधुप ने इन्हीं नवाचारी और प्रयोगधर्मी किसानों की कहानियों को प्रकाशन का मंच प्रदान कर मिशन फार्मर साइंटिस्ट परिवार से जोड़ने में सफलता प्राप्त की। इनमें से अनेक किसानों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुरुस्कृत होने का सौभाग्य मिला है।
विगत छह दशक से इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया से जुड़े डॉ मधुप किसान नवाचारियों पर राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय पत्र पत्रिकाओं में स्तम्भ लेखन कर रहे हैं व पुणे राष्ट्रीय कृषि पत्रिका शरद कृषि के 2005 से 12 वर्ष तक संपादक रहे। कृषि पत्रकारिता के लिए राष्ट्रपति द्वारा आत्माराम पुरस्कार 2005 व देश में कृषि पत्रकारिता के सर्वोच्च सम्मान पबंत के चैधरी चरणसिंह पुरस्कार 2007 से नवाजे जा चुके हैं। राजस्थान में पत्रकारिता क्षेत्र में प्रथम पीएच.डी.1973 में प्राप्त की। डॉ महेंद्र मधुप तीन दशकों से भी अधिक समय से देश के कृषि वैज्ञानिकों को खेत खलिहान में उनके द्वारा किये गए अनूठे और अद्भुत कार्यों से जन जन में वाकिफ कर वैश्विक पहचान दिलाने के लिए सतत प्रयत्नशील है। डॉ मधुप का प्रयास है की किसानों ने खेतों में नवीन पद्धति को अपनाकर जो उपलब्धियां हासिल की है वे किसी कृषि वैज्ञानिक से कम नहीं है। उनका विचार है आज के दौर में किसानों को किसी सहायता या कर्ज माफी से अधिक सहयोग ,सम्मान विश्वास और सामाजिक सम्बल की जरुरत है। ये सब चीजे उसे समय पर मिल जाये तो किसी भी अनहोनी से बचा जा सकता है साथ ही कृषि जन्य कार्यों को अपनाकर आगे बढ़ा जा सकता है। कृषि विभाग की सरकारी सेवा से निवृति के बाद डॉ मधुप खेतों के वैज्ञानिक पुस्तक श्रृंखला की शुरुआत के संकल्प के साथ इस क्षेत्र में एकजुटता के लिए संघर्षशील है। डॉ मधुप ने इस श्रृंखला की खेतों के वैज्ञानिक ,वैज्ञानिक किसान और प्रयोगधर्मी किसान के बाद चैथी पुस्तक अन्वेषक किसान में देश के 13 राज्यों के 56 किसान वैज्ञानिकों से कृषि क्षेत्र को रूबरू कराया है। इन पुस्तकों में कृषि वैज्ञानिक किसानों द्वारा किये गए उल्लेखनीय कार्यों को दर्शाया है जिससे कृषि कार्यों को नयी दिशा मिली है। 2017 से 2019 तक प्रकाशित डॉ मधुप की किसान वैज्ञानिकों पर 4 पुस्तकों खेतों के वैज्ञानिक, किसान वैज्ञानिक, प्रयोगधर्मी किसान व अन्वेषक किसान से पहले दुनिया की किसी भाषा में किसान वैज्ञानिकों के जीवन, संघर्ष व शोध पर एक भी किताब नहीं थी। उन्होंने इन पुस्तकों के माध्यम से किसानों की जीवन गाथा को नजदीक से देखा और परखा है। यह भी जाना है की उन्होंने कैसे नवाचारों को अपनाकर खेती की शक्ल में बदलाव कर दूसरों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने। इन प्रयोगधर्मी किसानों के संघर्ष को सलाम कर उनके खून पसीनें की महक को घर घर और खेत खलिहान में पहुँचाने की महती जरुरत है तभी देश को कृषि विकास के पथ पर आगे बढ़ाया जा सकता है।
ये प्रयोगधर्मी कृषि वैज्ञानिक अब किसानों के लिए ही नहीं बल्कि रोजी-रोटी की तलाश में इधर-उधर भटकने वाले युवाओं के लिए भी मार्गदर्शक बन गए हैं। इन्होंने साबित कर दिया कि कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कामयाबी खुद-ब-खुद मिलती चली जाती है। बस जरूरत है तो कड़ी मेहनत और लगन की। जो लोग पूरी तत्परता से खेती में जुट जाते हैं, उन्हें अपनी जरूरतों के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती है। खुद तो स्वावलंबी बने ही साथ ही सैंकड़ों लोगों को अब प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी मुहैया करा रहे हैं। धरती से जुड़े इन वैज्ञानिकों का कहना है की उनकी हमेशा कोशिश होती है कि उम्दा किस्म का उत्पाद तैयार किया जाए। उत्पाद की गुणवत्ता में किसी तरह का समझौता नहीं हो । उन्होंने खेती की बारीकियां सीखी और अधिक उपज प्राप्त करने के गुर भी सीखे। प्रशिक्षण शिविरों में वैज्ञानिकों की ओर से बताई गई बातों को गंभीरता से लिया। वैज्ञानिकों ने जो सीख दी, उसे आत्मसात करते हुए नए-नए प्रयोग किए। आज ये किसान किसी के मोहताज नहीं है। अपनी कड़ी मेहनत के बूते खेत और खलिहान को आर्थिक सम्बल प्रदान करने में सफल हुए है। किसान वैज्ञानिकों का प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये जो परिचय विस्तार मय पते व मोबाइल नंबर हुआ,उसके कारण किसान वैज्ञानिकों की प्रतिष्ठा व आर्थिक स्थिति में भारी उछाल आया।
पौराणिक समय में खेत खलिहान ही हमारी रोजी रोटी के सबसे बड़े साधन थे। किसान हल जोतते, बुआई करते और फसल काटते थे। वे ही मजदूर थे। रखवाले थे, अन्नदाता थे और कृषि वैज्ञानिक थे। धीरे धीरे कालचक्र में आये बदलाव का शिकार किसान भी हुए। आज भी देश की आबादी के 50 प्रतिशत लोग कृषि से सीधे जुड़े हैं। मगर इस आधी आबादी ने कई कारणों से खेती से अपना मुंह मोड़ लिया जिसके कारण देश में बेकारी की समस्या उत्पन्न हुई। कृषि उपज का पूरा मूल्य नहीं मिलना और सूखा भी इनमें एक कारण रहा है। आजादी के बाद हरित क्रांति का आगाज हुआ और एक बार फिर खेत खलिहान की कीमत हमने समझी। कृषि में नवाचार भी हुए। देखा जाये तो हमारे किसान किसी वैज्ञानिक से काम नहीं है। किसानों ने अपने अनुभव और बुद्धिकौशल से खेती में नवाचार अपनाये। आमतौर पर लोग कृषि विज्ञान का मतलब खेती बाड़ी ही लगाते हैं। लेकिन कृषि विज्ञान के अन्तर्गत फसलों की निगरानी, आनुवंशिकी और पादप प्रजनन फसलों की देख−रेख, आनुवंशिकी और पादप प्रजनन, फसलों पर लगने वाले कीड़ों का नियंत्रण, पौधों में लगने वाली बीमारियों का अध्ययन, मिट्टी की गुणवत्ता से संबंधित विषयों की जानकारी और उसके भीतर के लाभदायक जीवाणुओं के बारे में अध्ययन और उसे उर्वर बनाए जाने हेतु जानकारी हासिल की जाती है। मनुष्य ने तकनीक पहले बनायी, विज्ञान का सिद्धांत बाद में आया। लिहाजा किसान जो तकनीक खुद से ईजाद करते हैं, उसे वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ कर हरित क्रांति को सच में सफलीभूत किया। देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की 15 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी है। यदि कृषि तकनीकी के क्षेत्रों की बात करें तो देश में कृषि मशीनरी उद्योग की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत है जिसमें हर साल वृद्धि हो रही है। इस क्षेत्र को निम्न भागों ट्रैक्टर, रोटावेटर, थ्रेशर और पॉवर टिलर में बांटा गया है। फार्म मशीनरी की तकनीकों में पिछले एक दशक में काफी बदलाव आए हैं। रोटावेटर, सीडड्रिल मशीन, लैंड लेवलर, ड्राइवर लैस ट्रैक्टर, प्लान्टर और हार्वेस्टर जैसी कुछ तकनीक आई हैं जिन्होंने कृषि की परिभाषा को बदल दिया।
आज आवश्यकता इस बात की है की कृषि वैज्ञानिकों के कार्यों को सूझ बूझ के साथ आगे बढ़ाया जाये और इस क्षेत्र की उपयोगी पुस्तकों को कॉलेज और विश्व विधालयों में पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाये ताकि प्रारम्भ से ही हमारी आधी आबादी अपने प्रयोगधर्मी किसानों के जीवन गाथाओं से लाभान्वित हो सके। डॉ मधुप ने अपनी पुस्तकों में नवाचारी किसानों की जीवन गाथा की जानकारी देते हुए बताया है की कैसे उन्होंने अपनी फसलों,सब्जियों में नयी तकनीक अपनाकर कृषि जन्य कार्यों को सफलता पूर्वक लाभ में बदलने का करिश्मा कर दिखाया है। यदि सभी किसान भाई अपने अनुभवों को खेत खलिहान में सफलता के साथ क्रियान्वित करें तो जीवन में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। ये प्रयोग केवक खेत तक सीमित न होवें अपितु कृषि जन्य अन्य कार्यों में भी इनका इस्तेमाल करें तो सफलता प्राप्त की जा सकती है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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