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घोषणा पत्रों के बस्ते बीच गर्दभदेव!

पिछले कई वर्षों के घोषणापत्र बस्तों में बंधे पड़े थे पार्टी मुख्यालय के पिछवाड़े। एकदम सुर्ख लाल रंग के बस्ते में। खतरे के निशान से ऊपर झरते! वादा पत्रों के पहाड़ों से झरते शब्द। इन घोषणा पत्रों पर मकड़ियों के ढेरों जाले। पवन के किसी झोंके के साथ श्वेत वर्ण से चमकते। पेड़ों से टूटी सूखी पत्तियों का ढेर। पवन के झोंके से खरखराहट का संगीत देती। श्वान देवता की दीर्घ शंकाएं साक्षात नजर आती है और लघु शंका की सुगंध दूर चौराहे तक महसूस की जा सकती है। सड़क पर चलने वाला आम आदमी भी इसकी सुगंध नथुनों में भर कर बता देता कि यह लोकप्रिय राजनीतिक पार्टी के मुख्यालय का घोषणापत्र कक्ष का पिछवाड़ा है। इस पिछवाड़े की चर्चा कर रहा हूं श्रीमान! पिछवाड़े के वर्णन में ही मेरी ऐसी-तैसी हो गई। अगवाड़े की चर्चा की होती तो जाने क्या होता! घोषणापत्रों की फाइलों, जालों, सूखे पत्तों व श्वान शंकाओं के साथ ही गिरगिट, छिपकली जैसे रेंगने वाले जीवों के साथ बिलबिलाते कीड़ों और हवाई यात्रा करते कीटों का समूह 10 -12 चांद लगाने का कार्य तो जरूर कर रहा है। वर्णन में अच्छे-अच्छों की नानी मृत्यु को प्राप्त हो जाती है श्रीमानजी!

घोषणा पत्रों के इसी समुद्र तट पर गर्दभ महाशय अपनी चारों टांगों पर खड़े चिंतन की मुद्रा में दिखाई पड़े। मैंने पूछा गर्दभ महाशय! आप ऐसे पिछवाड़े क्यों खड़े हैं? आपको तो घोषणा पत्रों के आगे ही खड़ा होना चाहिए। प्रत्युत्तर में गर्दभ जी ने कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि मेरी ओर सिर घुमा कर मात्र मेरी मूर्खता का उपहास ही किया। गर्दभ राज ने जब घोर चिंतन कर लिया तो हल्के से अपने दाहिने खुर को आगे बढ़ाया और पत्तों की सरसराहट के बीच बाएं खुर को भी उसके बराबर ले जाकर खड़ा कर दिया। दो चार गिरगिट व छिपकलियां भी इधर-उधर भागने दौड़ने लग गई। बिलबिलाते कीड़े एक और नए आनंद से बिलबिलाने लगे। हवाई यात्रा वाले सज्जन कीट भी घोषणा पत्रों के नशे में गर्दभराज के ऊपर मंडराने से लगे। गर्दभ जी ने अपना दायां खुर उस घोषणापत्र के मोटे से बस्ते पर दे मारा। अगले ही क्षण घोषणा पत्र झर्र-झर्र की स्वर लहरियों के साथ ही शहीद हो गए। उस में बंधे हुए सारे शब्द आजाद हो गए। कुछ सूखे पत्तों पर गिरे तो कुछ शब्द श्वान शंकाओं पर। कुछ के पन्ने पवन देव से बातें करते हुए हवा में छितरने लगे। गर्दभ जी को इन सब क्रियाओं में कोई रुचि न दिखी जैसे यह सब रोजमर्रा का कार्य हो। गर्दभ जी ने एक मोटे से घोषणा पत्र को अपने नियंत्रण में लिया। उसे आलोचनात्मक ढंग से निरखा। उसमें ऐसी रुचि प्रदर्शित की मानो वह इस घोषणापत्र का निर्माता स्वयं ही हो। शायद हो भी!

जब घोषणा पत्र देखने से मन भर गया तो उसने अपना अगला पैर वादा पत्र के एक हिस्से पर टिका दिया। फिर लगा उसे चबाने। वादा पत्र में से एक वादे के कागज को दांतो से उठाकर चबाने लगा। चबा-चबाकर धीरे-धीरे उदरस्थ करने लगा। इस दौरान वह कभी नेत्रों को खोलता तो कभी बंद करता। कभी कानों को हिलाता तो कभी पूंछ को फटकारता। मानो उसे परम आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति हो रही हो। बीच-बीच में वह अपने दांत दिखाए बगैर मुस्कुरा भी देता मानो वह घोषणा पत्र न हो कर कोई चुटकुलों की किताब हो। अंत में गर्दभ जी लगे हंसने इन चुटकुलों पर। एक दो बार तो उसने चबाना छोड़ कर ऊपर टूटी छत की ओर ताकते हुए जोरदार अट्टहास भी लगाया। एक के बाद एक घोषणा पत्र व वादे पत्र खाने लगा। जब उसका घोषणा-वादे पत्र आदि खाने से मन भर गया; या स्वाद से जी भर आया तो स्वाद बदलने की गरज से वह कई-कई वर्षों से किए जाने वाले वादों-घोषणा पत्रों के कीचड़ में से पैर मारता हुआ आगे बढ़ा। इस बीच उसने अपने लटके होठों को फुरफुराया, मुस्कुराया और अब पंफलेट व घोषणा-विकास के आंकड़ों की बुकलेट को खाने का मन बनाया। उसने एक ताक में मुंह मारा कि पार्टी के वादे-विकास संबंधी बुकलेटों का ढेर गर्दभ महाशय पर गिर पड़ा। गर्द, छिपकली, मकड़ी आदि जब अपनी लीला रचा चुके तो गर्दभ जी ने अपने होठों से वादों, नारों, जुमलों आदि की बुकलेट में अपना मुंह मारा। नारों से अटे-पड़े एक पेज को गर्दभ जी ने खाया ही था कि वे धड़ाम से वादों-घोषणा पत्रों के कीचड़ में गिर पड़े। गर्दभ जी के प्राण पखेरू उड़ गए। उनके साथ कीट पतंगे भी उड़ने लगे। गर्द व सूखे पत्तों की सरसराहट और घोषणा पत्रों की फरफराहट ही वातावरण में शेष थी। घोषणापत्र खाकर गर्दभ जी का शव धरती पर पड़ा था असहाय!

रामविलास जांगिड़, 18 , उत्तम नगर , घूघरा , अजमेर (305023) राजस्थान

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