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नई तकनीक से दिमाग की नसों का इलाज

विजय न्यूज़। उमेश कुमार सिंह
नेपाल से 34 साल की महिला मरीज की जानलेवा दिमागी बीमारी का सफलता पूर्वक ऑपरेशन किया गया सर्जिकल प्रक्रिया काफी कठिन थी, इसलिए सर्जरी करने के लिए विशेषज्ञ की टीम को 4 घंटे का समय लगा. शुरुआत में रोगी को बार-बार सिर दर्द हो रहा था, लेकिन वह इस बड़ी बीमारी के लक्षणों को नजर अंदाज करती रही, जिसके कारण धीरे-धीरे उसकी दोनों आंखों में धुंधलापन आने लगा. नेत्र रोग विशेषज्ञ से परामर्श करने पर पता चला कि इंट्राऑक्यूलर दबाव इस हद तक बढ़ गया था, जो आंखों की नसों को बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकता था और उसे अंधा भी कर सकता था. इससे यह भी पता चला कि यह दबाव किसी दिमागी दबाव के कारण बढ़ रहा है. आंखों के बढ़ते दबाव के मूल कारणों की पहचान करने के लिए उन्होंने आगे की जांच के लिए अस्पताल आये.
गुरुग्राम स्थित आर्टेमिस हॉस्पिटल के अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस के डायरेक्टर डॉ. विपुल गुप्ता का कहना है कि विस्तृत जांच में पता चला कि दिमाग की नसों में गंभीर सूजन है और एंजियोग्राफी द्वारा धमनियों और नसों के बीच असामान्य संबंध की पहचान करने के लिए इसकी आगे की जांच की गई, जिसे आर्टेरियो-वेनस फिस्टुला (एवीएफ ) के रूप में जाना जाता है.

गुरुग्राम स्थित आर्टेमिस हॉस्पिटल के अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस के डायरेक्टर डॉ. विपुल गुप्ता

गलत कनेक्शन के कारण खून हाई प्रेशर के साथ सीधा नसों में जा रहा था, जिससे नसों में सूजन आ गई थी. टीम ने तुरंत इसे पहली ही सिटिंग में ठीक करने का फैसला किया. उसमें विशेष रूप से काफी बड़ी और असामान्य एवीएफ थी जो दिमाग में दबाव बना रही थी. यह दबाव दिमाग से आंखों तक पहंच रहा था, जिससे जल्द ही आंखों का खराब होना तय था. फिस्टुला को बंद करना अत्यंत जरूरी था, लेकिन चूंकि फिस्टुला दिमाग की एक बड़ी और सामान्य नस के बहुत करीब था, इसलिए पहले वहां खून के बहाव को सुरक्षित करना आवश्यक था.
डॉ.विपुल गुप्ता का कहना है कि आजकल वास्तव में दिमागी आघात भी एक बड़ी समस्या है, दरसल दिमागी आघात एक आपातकालीन अवस्था है और इसका जितना जल्दी हो सके, इसका उपचार किया जाना चाहिए. पुरानेे समय में ऐसे रोगों के मामले में मरीज और उनके परिजन नाउम्मीद हो जाया करते थे. चिकित्सकों के पास भी इसके सीमित उपचार ही थे. हाल के समय में इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है और ऐसे रोगों के उपचार की दवाइयां ही नहीं, बल्कि बचाव के भी उपाय सामने आए है.
दिमागी आघात या दौरे के सामान्य लक्षण है, जैसे कि आघात तेजी से आते हैं और यही कारण है कि आघात के लक्षण ज्यादातर अचानक बिना किसी चेतावनी सामने आते है. आघात के मुख्य लक्ष्य निम्नांकित है-शरीर के एक हिस्से में अचानक कमजोरी या सुन्न हो जाना, बोलने में परेशानी, बोलने में तुतलाहट या समझने या खुद को व्यक्त करने में परेशानी, चेहरे के एक हिस्से में कमजेारी आना और इससे चेहरे की आकृति की बिगडना, देखने में परेशानी होना. एक या दोनों आंखें कमजोर होना, चलने में परेशानी आना, दोनों पैरों में समन्वय का अभाव और चक्कर आना, बेहोशी जैसी स्थिति या उल्टियों के साथ सिरदर्द आदि.
टीम ने दिमाग की सामान्य नसों को सुरक्षित करने के लिए हृदय के जरिए पैर की रक्त वाहिकाओं के माध्यम से जाने का फैसला किया और माइक्रोकैथेटर का उपयोग करके उसमें एक बड़ा गुब्बारा रखा. एक बहुत ही कठिन और एक जोखिम भरी प्रक्रिया होने के नाते, टीम ने असामान्य कनेक्शन को बंद करने और सामान्य नसों को संरक्षित करने के लिए ओनिक्स नाम के एक पदार्थ को सफलतापूर्वक इंजेक्ट किया.
ओनिक्स नाम का यह पदार्थ एक विशेष तरल पदार्थ है, जो पानी की तरह होता है और रक्त के संपर्क में आते ही जम जाता है. सामान्य नसों में प्रवेश करने वाले पदार्थ को रोकने के लिए उसमें एक बड़े गुब्बारे का इस्तेमाल किया गया. इस तकनीक के इस्तेमाल से आजकल हम यह ऑपरेशन करने में कामयाब रहे हैं, केवल 2 दिन में ही पीडि़त की आंखों से धुंधलापन कम होने लगता है और जाचों से पता चल जाता है कि आंखों की नसों पर पड़ रहा दबाव भी कम हो गया था.

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