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निष्क्रियता गंभीर बीमारियों को जन्म देती है

स्वस्थ जीवन का अधिकार हर मनुष्य को है। इसी को लक्ष्य बनाकर आज से 71 साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना की गयी थी। संगठन द्वारा विश्व स्वास्थ्य दिवस हर साल 7 अप्रैल को आयोजित किया जाता है। इसका मकसद वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता फैलाना और सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना है। इस वर्ष की थीम यूनिवर्सल स्वास्थ्य कवरेज हर कोई हर जगह रखी गई है। आज भी विश्व के 10 करोड़ लोग घोर गरीबी में जीते हैं और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते हैं। फलस्वरूप विभिन्न बीमारियों से घिरे रहते है और समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण अंततोगत्वा अकाल मौत के शिकार हो जाते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन चाहता है कोई भी व्यक्ति इलाज के आभाव में नहीं मरे और सब को समय पर उपचार मिले। इसी को दृष्टिगत रखते हुए विश्व स्वास्थ्य दिवस का आयोजन किया जाता है ताकि जागरूकता के साथ सतर्क रहकर अपने स्वास्थ्य का भलीभांति ख्याल रखा जा सके।

बाल मुकुन्द ओझा

आज हर व्यक्ति अच्छी सेहत की बात करता है और इसके प्रति काफी हद तक लोगों में जागरूकता भी आई हैस आज भी अधिकांश व्यक्तियों के रोग का या तो समय पर पता नहीं चल पाता है या उसका सही तरह से उपचार नहीं हो पाता है, जिसके कारण हर साल पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों की असमय ही मृत्यु हो जाती हैस पूरी दुनिया में लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से विश्व स्वास्थ्य दिवस का आयोजन किया जाता है।
जीवन में स्वास्थ्य ही अनमोल धन है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में सफलता अर्जित कर सकते है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है। व्यक्ति की सबसे बड़ी दौलत उसका शरीर और उसका स्वास्थ्य होता है। जीवन में स्वास्थ्य का मूल्य समझ कर ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना की गई थी। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए।
भारत में आम तौर पर लोगों में स्वास्थ्य चेतना का अभाव है। शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति भी लोग तभी चिंतित होते हैं जब कोई रोग उन्हें घेर लेता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि निष्क्रियता कई गंभीर बीमारियों को जन्म देती है। विश्व लगातार बढ़ रही निष्क्रियता नामक महामारी का शिकार हो रहा है आरामदेह जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ, जैसे हृदय रोग और डायबीटीज, अब तक संपन्न देशों की बीमारियाँ मानी जाती थीं लेकिन अब विकासशील देश भी अब इसके शिकार हो रहे हैं । विश्व भर में इन बीमारियों से हर वर्ष दो करोड़ लोगों की मौत होती है और इनमें से अस्सी प्रतिशत गरीब देशों से हैं। इस तरह की बीमारियाँ दौड़-भाग से रोकी जा सकती हैं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि विश्व के पचासी प्रतिशत लोग निष्क्रिय जीवनशैली बिता रहे हैं और विश्व के दो-तिहाई बच्चे भी पूरी तरह से सक्रिय नहीं हैं और इससे उनके भविष्य पर भी बुरा असर पड़ेगा । संगठन का कहना है कि साधारण व्यायाम जैसे पैदल चलना, नृत्य करना और यहाँ तक की सीढ़ियाँ चढ़ना भी सेहत को ठीक रख सकता है । शोध बताते हैं कि खानपान में साधारण परिवर्तन और हल्के व्यायामों से आंतों के कैंसर के खतरे को सत्तर प्रतिशत और डायबिटीज को साठ प्रतिशत कम किया जा सकता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव स्वास्थ्य की परिभाषा है । भारत ने पिछले कुछ सालों में तेजी के साथ आर्थिक विकास किया है, लेकिन इस विकास के बावजूद बड़ी संख्या में लोग कुपोषण के शिकार हैं जो भारत के स्वास्थ्य के प्रति चिंता उत्पन्न करता है।
स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है। स्वस्थ लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से निपटने के लिए और किसी भी परिवेश के मुताबिक अपना अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं। रोग की अनुपस्थिति एक वांछनीय स्थिति है लेकिन यह स्वास्थ्य को पूर्णतया परिभाषित नहीं करता है। यह स्वास्थ्य के लिए एक कसौटी नहीं है और इसे अकेले स्वास्थ्य निर्माण के लिए पर्याप्त भी नहीं माना जा सकता है। लेकिन स्वस्थ होने का वास्तविक अर्थ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन जीने के स्वस्थ तरीकों को अपनाया जाना है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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