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परवान चढ़ते रिश्ते

विश्व बिरादरी में भारत के सबसे पुराने और भरोसेमंद मित्र रूस से रिश्तों को नई दिशा देने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिन की रूस यात्रा काफी कारगर रही। मोदी भारत और रूस के बीच होने वाली 20 वीं वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए रूस गये थे। यात्रा के दौरान उन्होंने रूस के सुदूर पूर्व के क्षेत्र व्लादिवोस्तक में आयोजित ईस्टर्न इकोनाॅमिक फोरम (ईईएफ) की बैठक में भाग लिया। पुतिन ने उन्हंे मुख्य अतिथि के रूप में ईईएफ की बैठक में आमंत्रित किया था। बैठक में पीएम मोदी ने सुदूर पूर्व (फार ईस्ट) के विकास के लिए एक बिलियन डाॅलर (करीब 72 हजार करोड़ रूपए) देने की घोषणा की ।
रूस भारत का महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी है। दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों का लंबा इतिहास है। एक समय ऐसा भी भी था जब हमारे करीब 70 फिसदी रक्षा उपकरण रूस से ही आते थे। लेकिन हाल के वर्षों में रूस ने जिस तरह से भारत की सुरक्षा चिंताओं को दरकिनार करते हुए चीन और पाकिस्तान से अपनी नजदीकी बढाई है, उससे दोनों देशों के संबंधों में बदलाव आया है। रूस की इस बदलती रणनीति के लिए जहां एक ओर वैश्विक परिस्थितयां उतरदायी हैं, वही भारत के स्वयं के सामरिक हित भी कम निर्णायक नहीं है। पिछले एक-डेढ़ दशक में जिस तरह से भारत अपने हितों की पूर्ति के लिए अमेरिकी पाले में गया है, उसको देखते हुए रूस ने चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाने जरूरी समझ लिए।

इतिहास में अगर थोड़ा सा पीछे जाएं तो बंाग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रूस तमाम तरह की शंकाओं और अंाशकाओं को निर्मूल साबित करते हुए भारत के पक्ष में दृढता के साथ खड़ा रहा। भारत-रूस मित्रता अक्टूबर 2000 में उस समय और अधिक मजबूत हुई जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति पुतिन ने ’भारत-रूस रणनीति साझेदारी’ के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। आज भी दोनों देश कई बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं। भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का रूस ने हमेशा समर्थन किया है। भारत का कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट रूस की मदद से ही बनाया जा रहा हैं। लेकिन हालिया परिस्थितियों में दोनों देश मित्रता के परस्पर विपरित मोर्चें पर खडे़ दिखाई दे रहे हैं।
दरअसल अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों को देखते हुए रूस को यह लगने लगा है कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका से बड़ी मात्रा मेें हथियारों की खरीद कर रहा है। एक हद तक यह सही भी है। इस बदलाव की दो बड़ी वजह है । प्रथम, वैश्विकस्तर पर जिस तरह से भूराजनीतिक स्थितियां बदल रही हंै उसमें भारत ही नहीं बल्कि दुनिया का कोई भी देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहेगा । द्वितीय, चीन द्वारा भारत के इर्दगिर्द जिस तरह की व्यूह रचना की गई है, उसे देखते हुए भारत के लिए अत्याधुनिक उच्च तकनीक के हथियार खरीदना जरूरी हो गया है। भारत को लगता है कि उसे अपनी सामरिक सुरक्षा के लिए अमेरिका से उच्च तकनीक के हथियार मिल सकते है। टू प्लस टू वार्ता के बाद अब यह माना जा रहा है कि अगले तीन से चार दशकों में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी होगा। जाहिर है उक्त परिस्थितियों में रूस का नजरिया बदलना ही था।

वर्तमान में बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने दोनों देशों को एक बार फिर से नजदीक ला दिया है। जम्मू-कश्मीर में धारा अनुच्छेद 370 हटाए जाने से बोखलाया हुआ पाकिस्तान जिस तरह से इस मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने पर तुला हुआ है, उसमें भारत के लिए रूस जैसे विश्वस्त मित्र का साथ होना जरूरी है। कश्मीर मुद्दे पर अगस्त में रखी गयी यूएनओं की क्लोज डोर बैठक में रूस के खुले समर्थन ने दोनों देशों के रिश्ते को और मजबूत किया है। दूसरी ओर अफगानिस्तान की बदलती परिस्थितियां रूस को भारत के साथ के लिए प्रेरित कर रही है। अमेरिका-तालिबान शांति वार्ता के खटाई में पड़ने के बाद रूस अफगानिस्तान में बड़ी भूमिका निभाना चाहेगा। निसंदेह भारत उसके लिए अहम मददगार साबित होगा। ध्यान रहे कि अभी हाल ही में काबुल में हुए एक बम धमाके में एक अमेरिकी सैनिक के मारे जाने की घटना के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगान शांति वार्ता से हटने की घोषणा की है।
क्रीमिया व यूके्रन में सैन्य हस्तक्षेप के बाद पुतिन जिस तरह से अपने बहुधु्रविय विश्व व्यवस्था वाले एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहते हैं, उसमें भारत बड़ा मददगार साबित हो सकता है। इसके अलावा मंदी के दौर से गुजरती रूसी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए भी पुतिन भारत का साथ चाहते हैं। पुतिन चाहते हैं कि भारत सुदूर पूर्व के क्षेत्र में बड़ा निवेश करे। इसीलिए व्लादिवोस्तोक में होने वाले सम्मेलन में भारत को केंद्र में रखा गया।
वैश्विक स्तर पर अभी जो परिस्थितयां और हालात बन रहे हंै, उनमें न तो भारत रूस को छोड़ना चाहेगा न रूस भारत को। इस लिए बेहतर यही होगा कि दोनों देश अतीत के पुराने संबंधांे के प्रकाश में ही वर्तमान स्थितियों से निबटने का प्रयास करे। मोदी की रूस यात्रा से इस बात के संकेत भी मिले है। यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार और सैन्य तकनीक से संबंधित जो समझौते हुए हैं, वह दोनों देशों के बीच नई सामरिक व आर्थिक भागीदारी की पटकथा लिखते नजर आ रहे है। व्लादिवस्तोक और चेन्नई के बीच नया समुद्री मार्ग खुलने से भारत-रूस व्यापारिक रिश्ते और मजबूत होगें। अंतरीक्ष में सहयोग के लिए भी दोनों देशों के बीच सहमती बनी है। अब गगनयान के लिए भारतीय अंतरीक्ष यात्री रूस में प्रशिक्षण लेगंे। इसके अलावा अगले साल भारत और रूस के बीच बाघों के संरक्षण पर उच्च स्तरीय फोरम के आयोजन पर भी सहमती बनी है।
हालांकी आर्थिक और रणनीतिक मोर्चें पर आज भी दोनों देशों के बीच विश्वास बरकरार है। रूस में भारत का निवेश बढा है। रूस ने भी हमारे यहां करीब बारह अरब डालर का निवेश किया है। पीछले पांच सालों में भारत ने अपने कुल हथियार आयात में 62 प्रतिशत से अधिक रूस से आयात किये हंै। दोनों देशों ने साल 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब डाॅलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में बीते 4 दशक से दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। भारत भी इस बात को अच्छे से जानता है कि वह रूस की शर्त पर अमेरिका से संबंध नहीं बढ़ा सकता है। इस लिए वह रूस के साथ सहयोग को बनाये रखने हेतू दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहा है। मोदी-पुतिन शिखर वार्Ÿाा के दौरान दोनों नेताओं के बीच ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध का मुद्दा भी उठा । टंªप के इस फैंसले से भारत व रूस दोनों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसे में दोनोें नेता ने अपने-अपने देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबावों को कम करने संबंधी उपायों पर भी चर्चा की।

रूस-पाकिस्तान और रूस-चीन संबंधों के कारण भारत अपने को असहज महसूस कर रहा है। हालांकी पाकिस्तान व चीन के साथ रूस के अपने हित जुडे़ हैं। भारत को खुश करने के लिए पुतिन चीन और पाकिस्तान के प्रति अपनी हालिया नीतियों में कोई बदलाव करेगें इसकी संभावना कम ही है। फिर भी अगर पीएम मोदी की रूस यात्रा के बाद पुतिन भारत-चीन-पाकिस्तान के साथ संबंधों में संतुलन के कोई संकेत देेते हैं, तो इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत ही कहा जाना चाहिए ।
बहराल मोदी का रूस दौरा दोनों ही देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पीएम नरेंन्द्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के व्यक्तिगत संबंधों की कैमेस्टरी के चलते दोनों देशों के संबंध परवान चढेंगे।
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एन.के.सोमानी( असिस्टेट प्रोेफेसर)
अंतरराष्ट्रीय राजनीति
एम.जे.जे. गल्र्स काॅलेज, सूरतगढ़
ेेजिलाः श्रीगंगानगर(राज.)पिनः 335 804
मो0 98284-41477

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