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पहचान खोती रामलीला

रामलीला उत्तरी भारत में परम्परागत रूप से विजयादशमी के अवसर पर खेला जाने वाला राम के चरित पर आधारित नाटक है। जहां तक दस्तावेजों का सवाल है। 1830 में वाराणसी के रामनगर में पहली रामलीला मंचन होने का उल्लेख मिलता है। इसके प्रवर्तक तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदीतनारायण सिंह थे। यूनेस्को के मुताबिक बनारस के रामनगर की रामलीला अभी तक चलने वाला संसार का एक मात्र लोकनाट्य हैं। दिल्ली की प्रसिद्ध रामलीला की शुरूआत अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के जमाने से हुई थी।

रामलीला की सदियों से चली आ रही भारतीय परम्परा अब खत्म होने के कगार पर है। एक जमाने में गांव-गांव में दशहरे के दस दिन पहले से रामलीला का मंचन होता था और आखिरी दिन पाप पर पुण्य की जीत यानि दशहरा को रावण वध। रावण वध की परम्परा तो आज भी चल रही है भले ही इसके स्वरूप में काफी बदलाव आ चुका है। लेकिन रामलीला मंडलियां आज धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब तो गांवों में भी सूचना-प्रसार क्रांति ने इस कदर लोगों को जकड़ रखा है कि मनोरंजन और जीवन का पर्याय समझाने वाली हमारी इस विरासत को बचाने कोई नजर नहीं आता।

यद्यपि इस बात का कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन यह मान्यता है कि सबसे पहली रामलीला 17वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत ने चित्रकूट में खेली। बहरहाल इतिहास में भले ही यह विवाद हो लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उत्तर भारत की हिन्दी बोलियों और बाद की हिन्दुस्तानी भाषा में खेले गए सभी आधुनिक लोक नाटकों की जनक रामलीला ही है और सभी प्रकार की रामलीलाओं का आधार गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस है।

विरासतों के अपने इतिहास में यूनेस्को ने भारत की रामलीलाओं को विश्व की सबसे बड़ी बहुजातीय, बहुधर्मी और बहुनस्लीय सांस्कृतिक विरासत की ईवेंट माना है। रामलीला में नृत्य, संगीत की प्रधानता नहीं होती क्योंकि रामलीला का चरित नायक गंभीर, वीर, धीर, शालीन एवं मर्यादाप्रिय पुरुषोत्तम राम हैं। परिणामस्वरूप वातावरण में विशेष प्रकार की गंभीरता रहती है।

आम जन तक रामकथा को पहुंचाने की परम्परागत रंगमंचीय कला रामलीला राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में भी कम होती जा रही हैं। इस क्षेत्र के देहाती इलाकों में रहने वाले रामलीला के परम्परागत दर्शक टेलीविजन वीडियो व सिनेमा जैसे माध्यमों को महत्व देने लगे हैं। धीरे-धीरे दम तोड़ रही रामलीला के कारण रामलीला मंडलियों में कार्य करने वाले कलाकार खिन्न होकर रामलीला के स्थान पर गांवो में भजन गायकी, खेत मजदूरी व विभिन्न संस्थानो में चौकीदारी, बस कन्डक्टरी जैसे कार्य करने लगे हैं।

शेखावाटी क्षेत्र के सीकर व झुंझुनू जिलों के गांवों में रामलीला मंडलियो द्वारा रामकथा की रामायण की चौपाईयों के साथ नाट्य प्रस्तुतियां की जाती हैं। रामलीला करने का सिलसिला क्षेत्र के गांवों में कस्बों व शहरों की तरह केवल दशहरा व दीपावली के दिनो में ही नही बल्कि साल भर चलता रहता हैं। एक दशक पूर्व तक शेखावाटी क्षेत्र में करीब 40 रामलीला मंडलियां होती थी। जिनमें हर मंडली में 15 से 20 कलाकार होते थे, मगर अब मात्र 8-10 मंडलियां ही रह गई हैं। जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है।

इस क्षेत्र की रामलीला मंडलियों के कार्यक्रम वर्षात के मौसम को छोडक़र वर्ष भर चलते रहते हैं। ये मंडलियां एक गांव से दूसरे गांव अपने पूरे साजो सामान के साथ जाती रहती हैं। गांव के किसी सार्वजनिक चौक में दो-चार काठ से बने तख्ते रखकर रंगमंच तैयार करते हैं। रंगमंच के पिछे विभिन्न दृश्यों के परदे लगायें जातें हैं जो घटना क्रम के अनुसार बदलते रहतें हैं। रामलीला में इन पर्दों का बहुत महत्व रहता है। रामलीला मंचन के दौरान ही दर्शको से आरती की थाली में दक्षिणा ली जाती हैं। रामलीला मंडलियां एक गांव में दस से पन्द्रह दिनों तक ठहर कर अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं तथा लोगों से मिलने वाला चढ़ावा ही आय का मुख्य साधन होता है।

एक दशक पहले तक रामलीला मंडलियों की प्रस्तुती का जादू लोगो के सिर चढकर बोला करता था। गांवो में लोग रामलीला मंडली का बेताबी से इंतजार किया करते थे। रामलीला स्थल पर लोग सांयकाल ही अपने बैठने के लिये पीढ़ा, मुढ़ा, दरी, बोरी आदि रखकर अपना स्थान सुरक्षित कर देते थे। गांव के छोटे बच्चे तो दिनभर रामलीला के कलाकारों के इर्द गिर्द मंडराते रहते थे। रामलीला मंडली का नकलीड़ा (जोकर) तो दर्शको को हंसाहंसा कर लोटपोट कर देता था। पहले गांवो में जब तक रामलीला का मंचन होता उस वक्त पूरे गांव का वातावरण राममय हो जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान क्षेत्र के गांवों में रामलीला के प्रति उत्साह में जबरदस्त गिरावट आई हैं। दूरदर्शन पर रामायण के प्रसारण को प्राय: सभी लोगों ने देखा हैं। इसलिए दूरदर्शन की चमक दमक के समक्ष गांवो में प्रस्तुत की जाने वाली रामलीला लोगों को अब अर्थहीन ‘ड्र्रामा ‘लगने लगी हैं। आज मनोरंजन के तरीके ही बदल गयें हैं। अपने पात्रों को सजीव दर्शानें के लिये पहले हम महिनों रिहर्सल किया करते थे आज इतना समय किसके पास है। वर्षों रामलीला में राम का अभिनय करने वाले संजय सैनी का कहना है कि दूरदर्शन पर रामलीला के प्रदर्शन के बाद से तो इन रामलीलाओं का क्रेज ही समाप्त हो गया है।

झुंझुनू जिले के मानोता गांव के भागीरथ रामलीला वाले ग्रामीण क्षेत्र में रामलीला के पितामह माने जाते हैं। विगत 37 वर्षो से अनवरत रामलीला कर रहें हैं। उनके दो भाई मदन व रामनिवास की रामलीला मंडलियां भी क्षेत्र में सक्रियता से कार्यरत हैं। इन तीनों भाइयों के अभिनय और काबलीयत को लोग दाद देते नही थकते थे । मगर भागीरथ अब रामलीला से खिन्न हैं। क्योंकि लोगों की आस्था रामलीला के प्रति तेजी से खत्म होती जा रही हैं। अब एक-एक पैसे के लिए लोगों को कहना पड़ता हैं पहले ऐसा नही था। पहले लोगों द्वारा रामलीला मंडलियों को अपने घरों पर बुलाकर बड़े प्रेम के साथ भोजन करवाया जाता था। भागीरथ नही चाहते कि उनकी अगली पीढियां रामलीला करें । उनका कहना है कि मुझे तो अब इस धंधे से घृणा होने लगती हैं। रामलीला के बहाने कुछ राम भक्ति हो जाती हैं। इस कारण यह कार्य कर रहा हूँ ।

गुढागौडज़ी कस्बे के रामावतार शर्मा द्वारा रामलीला में हनुमानजी के पार्ट की सजीव प्रस्तुती की जाती थी। संजीवनी बूटी लाते वक्त जब वे सौ फीट की ऊॅंचाई से सीने के बल रस्सी पर चल कर नीचे आते वक्त दर्शक रोमांचित हो उठते थे। मगर रामलीला में काम करने वाले वरिष्ठ कलाकार धीरे-धीरे उपेक्षित हो अन्य लाईन में जा रहें हैं। रामलीला मंडलीयों से जुड़े कलाकार इसी रवैये से व्यथित हैं। उनका कहना है कि चकाचौंध के दौर में रंगमंच पिट रहा हैं। उनके पास इतने पैसे भी नही है कि वे आधुनिक थियेटर के गुणों वाले मंच गांवों में तैयार करें और वैसी आय की उम्मीद भी गांवों में नही हैं। सरकारी स्तर पर भी इन रामलीला मंडलियों को कोई सहायता या संरक्षण नही मिल पाता हैं।

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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