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बजट एक फरवरी को पेश करने के साहसिक निर्णय के सकारात्मक परिणाम

यों तो आर्थिक क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा एक के बाद एक साहसिक निर्णय किए जा रहे हैं पर गए साल से आम बजट को परंपरागत समय से पहले प्रस्तुत करने का निर्णय कर साहसिक कार्य किया है। अब इस साल भी सरकार एक फरवरी को आम बजट प्रस्तुत करने जा रही है। हांलाकि गए साल सरकार द्वारा समय से पहले नई परंपरा रखते हुए आम बजट प्रस्तुत करने पर सरकार विपक्ष की आलोचना का शिकार भी हुई और इसे पूरी सहित पांच राज्यों के चुनावों से भी जोड़ कर देखा गया। भले ही कुछ भी कहा जाए पर जोखिम वाले फैसले लेने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कोई जबाव नहीं है। बजट के मामलें में मोदी सरकार के दो निर्णय अपने आप में महत्वपूर्ण होने के साथ ही समय की मांग के अनुरुप कहा जा सकता है। बदली परिस्थितियों में रेल बजट अलग से प्रस्तुत करने की पंरपरा को ढोए जाना कहीं भी युक्तिसंगत नहीं माना जा सकता हैं वहीं एक फरवरी को बजट प्रस्तुत करना आर्थिक विकास को गति देने और देशहित में ही माना जा सकता है। गए साल के अनुभव तो इसी और संकेत कर रहे हैं। वैसे भी एक फरवरी को बजट प्रस्तुत करने और वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले ही बजट की आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने से बजट घोषणाओं, योजनाओं और कार्यक्रमों की समयवद्ध क्रियान्विति सुनिश्चित होने लगती है। नए बजट प्रावधानों व घोषणाओं का वित्तीय वर्ष की शुरुआत यानी कि एक अप्रेल से किया जाना संभव हो पाता है। इससे पहले फरवरी के अंतिम सप्ताह में बजट प्रस्तुत होने और बजट की औपचारिकताओं को पूरे करने में लगने वाले समय के कारण वित्त मंत्री को बजट प्रस्तुत करने के बावजूद आवश्यक खचो। के लिए एकाध माह का लेखानुदान अलग से पारित कराना पड़ता था। गए साल से बजट पेश करने के समय में परिवर्तन के जो परिणाम प्राप्त हुए हैं व जुलाई में लागू जीएसटी और जीएसटी में लगातार सुधार के प्रयासों के बावजूद उत्साहजनक ही देखने को मिले हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यह रहा कि सरकार को लेखानुदान पास कराने से मुक्ति मिल गई वहीं आधारभूत संरचना के कार्यों सहित अन्य कार्यों के लिए वित्तीय वर्ष के आरंभ होने के साथ ही राशि मिलना आरंभ होने लगी है। हांलाकि विशेषज्ञ पुरानी व्यवस्था में बजट राशि जारी होने में देरी को सरकार के लिए इसलिए लाभदायक मानते रहे हैं कि देरी से राशि जारी होने से सरकार को बचत होती थी और राजकोषीय घाटें को कम करने में सहायता मिलती थी। पर तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि परियोजनाएं निर्बाध गति से चलना आसान हुई है। बजट पहले प्रस्तुत करने से राजस्व खर्च बढ़ा है वहीं सकारात्मक बात यह भी है कि जीएसटी के कारण कारोबारी व्यवधान के बावजूद कर संग्रह में तेजी आई और अधिक कर संग्रह प्राप्त हुआ है। एक मोटे अनुमान के अनुसार नई बजट व्यवस्था से कम से कम छह सप्ताह यानी की ड़ेढ़ माह का समय बच जाता है। पहली तिमाही के लिए लेखानुदान लेने की भी आवश्यकता नहीं रहती। हांलाकि वित्त मंत्री अरुण जेटली का यह अंतिम पूर्ण बजट होगा क्योंकि अगले बजट के समय सरकार चुनावों की तैयारियों में होगी। हांलाकि यह माना जा रहा है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित अन्य प्रदेशों के विधान सभा चुनावों और 2019 के आरंभ में लोकसभा के चुनावों के देखते हुए बजट पूरी तरह से चुनावी मोड़ में लोकलुभावन होगा। चुनाव से जुड़े सभी वर्गो के लिए बजट में घोषणाएं होने की संभावनाओं से नकारा नहीं जा सकता। सभी वर्गो की आंकाक्षाएं और अपेक्षाएं भी बढ़ी है। हांलाकि नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली को देखते हुए इस बजट में भी कोई कड़वी दवा हो तो उससे भी नकारा नहीं जा सकता।
इसमें भी दो राय नहीं हो सकती कि प्रधानमंत्री के साहसिक निर्णयों पर जनता ने सकारात्मक मोहर लगाई है। देखा जाए तो हमारे देश की जनता साहसिक निर्णयों का स्वागत करती रही हैं, भले ही इन साहसिक निर्णयों से आमजन को लाख परेशानियांे का सामना करना पड़ा हो। ताजातरीन उदाहरण नवंबर, 16 में मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी का हो या जुलाई, 17 में जीएसटी लागू करने का निर्णय। विपक्ष की लाख आलोचनाओं और नोटबंदी या जीएसटी के कारण उत्पन्न परेशानियों से रुबरु होने के बावजूद आमजन ने इन निर्णयों को सराहा। इसका बड़ा कारण यह है कि आमनागरिक कठोर निर्णयों के पीछे यह मानकर चलते हैं कि इनमें देशहित छिपा हुआ है। यह कोई आज की बात भी नहीं है। लालबहादुर शास्त्री का सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का आह्वान हो या इन्द्रा गांधी का राजा-महाराजाओं के प्रीविपर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्र्ीयकरण, बांग्लादेश की आजादी की जंग, अमेरिका से टकराव यहां तक कि लोगों ने आपातकाल की भी अच्छाइयां ढूंढ ही ली। राजीव गांधी का टेक्निकल मिशन या अन्य फैसलें। मजे की बात यह है कि कठोर निर्णयों के परिणामों से रुबरु होने के बावजूद चुनाव परिणामों ने फैसले लेने वाली सरकारों में विश्वास ही व्यक्त किया। इसका ताजातरीन उदाहरण नोटबंदी के बाद यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने हैं। इन्द्रा गांधी के समय प्रीविपर्स समाप्ति व बैंकों के राष्ट्र्ीयकरण के बाद के परिणाम इसके साक्षी है। दरअसल हमारे देश का जनमानस भविष्य के सपनों को लेकर जीता है और वर्तमान की कठिनाइयों को सहज स्वीकार कर लेता है। ऐसे में कड़वी दवा को गटकने में भी जनमानस को परहेज नहीं देखा गया है।
अब इसमें कोई दो राय नहीं कि वित्तीय वर्ष समाप्ति से पूर्व बजट की आवश्यक औपचारिकताएं पूरी हो जाती है तो यह देशहित में ही माना जाना चाहिए और भले ही लाख खामियां गिनाई जाए पर इससे आर्थिक विकास को गति ही मिलेगी, यह साफ हो गया है।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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