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मजदूर -किसान के जीवन में कब खुशहाली आएगी !

आजादी के बाद से मजदूर और किसान आज भी बदहाली का जीवन जीने को अभिशप्त हैं।एक ओर मजदूर को अपना श्रम बेचने के लिए मजदूर मण्डी में स्वयं को प्रदर्शित करना पड़ता है तो दूसरी ओर किसान अपनी फसल के उचित मूल्य पाने के लिए अनाज मंडी में आँसू बहाता है।किसान कर्ज में डूबा रहता है और आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है।मजदूर-किसान हित की बात तो सभी करते हैं लेकिन उनके वास्तविक कल्याण की दिशा में कोई सार्थक प्रयास होता नहीं दिखाई दे रहा है।इन्हें भी वोट बैंक की तरह ही उपयोग में लाया जा रहा है।मजदूर और किसानों के हित की बातें विशिष्ट अवसरों पर ही कही जाती है।

अभी फिर वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला मजदूरों का दिवस यानी मजदूर दिवस यानी मई दिवस आ गया है।।मजदूरों के लिए बहुत कुछ कहा जाएगा,भाषणबाजी होगी और दिन पूरा होते ही अगले वर्ष तक के लिए सारी बातें भूला दी जाएंगी।कार्ल मार्क्स ने लिखा था-”दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ,”दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि मजदूर तो एक नहीं हो सके,पूंजीपति जरूर एक हो गये। देशभर को जमा पूंजी मुठ्ठीभर लोगों के हाथों में जमा होती जा रही है।आज कार्ल मार्क्स को साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के लोगों ने ही भूला दिया है।लेनिन की प्रतिमाओं को ढहाया जा चुका है।विभिन्न साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के पोषक देश स्वयं पूंजीवादी व्यवस्था की राह पर चल निकले हैं।फ्रांस और रूस में हुई क्रांति तथा उसके बाद विश्व में पूंजीवाद के विरूद्ध बने माहौल तथा समाजवाद और साम्यवाद के प्रसार के बावजूद मजदूरों की हालत जस की तस बनी हुई है।समाजवादी और साम्यवादी व्यवस्था वाले देश भी कमोबेश पूंजीवाद के रास्ते पर ही जब चल निकले हैं और मजदूरों की बात कहने वाले संगठन कमजोर हो चले हैं तब सर्वहारा वर्ग के कल्याण की बात कौन करेगा और किससे उम्मीद की जा सकती है।

मजदूर दिवस उन कर्मठ लोगों का दिन है जिन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, चाहे औद्योगिक श्रमिक हों या कृषि मजदूर ,उनका हर स्तर पर शोषण हो रहा है तथा उनका भविष्य भी अंधकारमय बना हुआ है। कार्ल मार्क्स ने कहा था कि एक व्यक्ति को अपने जीवन यापन की आवश्यक चीजें यानी रोटी,कपड़ा और मकान तो मिलना ही चाहिए जबकि आज भी सर्वहारा वर्ग इससे वंचित है।

पूंजीवादी व्यवस्था ने आय और उत्पादन के अर्थ ही नहीं बदले बल्कि पूंजी और विकास के पैमाने ही बदल दिये हैं।मशीनीकरण ने उपयोगी श्रम को भी उपयोगहीन कर दिया है और व्यक्ति गौण हो गया है।जबकि सूफोक्लेस ने कहा है कि-”बिना श्रमिक के कुछ भी सफल नहीं है।”रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं और बेरोजगारी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।कुशल-अकुशल श्रम का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है।

हमारे देश में भले ही संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद शब्द को स्थान दिया गया है लेकिन अब हमने निजीकरण और पूंजीवाद की सभी बुराईयों को आत्मसात करते हुए समाजवाद से मुँह फेर लिया है।उत्पादन और वितरण की समान व्यवस्था पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह भी है कि श्रम संगठनों और राजनीतिक दलों ने उदारीकरण,निजीकरण और वैश्वीकरण के सम्मुख हथियार डाल दिये हैं।आज मजदूरों की आवाज दबंगता से सशक्त तरीके से कोई नहीं उठा पा रहा है।वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में अर्थनीति के कारण रोजगार का संकट विद्यमान हो गया है।सामाजिक सुरक्षा योजना इंसान के पेट भरने की गारंटी नहीं है।भले ही हम दावा करते हों कि देश में कोई भूखा नहीं सोता है लेकिन दो जून की रोटी कई लोगों को नसीब नहीं हो पा रही है।अमीर और अधिक अमीर होता जा रहा है ,गरीब और अधिक गरीब।इस गहरी होती खाई को मिटाया नहीं गया तो पुनः सम्पूर्ण विश्व में रक्तपूर्ण क्रांति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

विगत वर्षों में मजदूर दिवस पर हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वामपंथियों पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा था कि राजनीतिक स्वार्थ में दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ का नारा देने वाले हाशिये पर चले गए हैं।यह एक सच्चाई भी है कि वामपंथी दल अपनी विचारधारा और कार्यक्रम की दृष्टि से कमजोर साबित होते जा रहे हैं, उनके पास श्रमिकों के कल्याण की कोई ठोस योजना और उपाय भी नहीं है जिससे वे मजदूर और किसान वर्ग में फिर अपनी जगह बना सके।

किसी भी समाज में मेहनतकशों का अपना अलग विशिष्ट स्थान है।समाज ,राष्ट्र,संस्था और औद्योगिक इकाईयों की श्रमिकों और कामगारों के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती।किसी भी उद्योग ,व्यवसाय,कृषि क्षेत्र की सफलता के लिए उसके स्वामी,श्रमिक और शासन-प्रशासन की अहम भूमिका होती है, बिना कामगारों के औद्योगिक ढ़ाँचा खड़ा नहीं हो सकता।यहाँ स्पष्ट कर देना भी मुनासिब होगा कि मजदूर का अर्थ उस इकाई से है जो हरेक सफलता का अनिवार्य एवं अभिन्न अंग है फिर चाहे वह धूल-मिट्टी,सीमेंट-तेल से सना हुआ इंसान हो या फिर दफ्तरों की फाइलों के बोझ तले दबा हुआ इंसान हो।आज हमें इस नजरिये से देखना होगा।मजदूर वर्ग को विस्तृत रूप से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।मजदूर वर्ग में वे सभी लोग शामिल हैं जो किसी संस्था,संगठन या व्यक्ति के लिए कार्य करते हैं और बदले में मेहनताना पाते हैं।शारीरिक और मानसिक रूप से श्रम करने वाला हर इंसान मजदूर है।इन्हीं मजदूरों को सम्मान देने के लिए मजदूर दिवस मनाया जाता है।

अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को अन्तर्राष्ट्रीय कर्मचारी दिवस या मई दिवस भी कहते हैं।मजदूर दिवस पूरी दुनिया में ही पहली मई को मनाया जाता है सर्वप्रथम 01मई 1886 में सभी मजदूर संघों ने मिलकर निश्चय किया कि वे आठ घंटे से अधिक काम नहीं करेंगे,इसके लिए उन्होंने हड़ताल की।आंदोलन में हिंसा हुई,मजदूरों की जान माल की हानि हुई।तात्कालिक लाभ नहीं हुआ लेकिन बाद में कुछ अनुकूल परिणाम आये और कई देशों में कार्य के आठ घंटे तय हुए।इसके बाद से ही पहली मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाना प्रारम्भ किया गया।हमारे देश में वर्ष 1923 में मई दिवस मनाना प्रारम्भ किया गया।इसकी शुरूआत भारतीय मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने की थी।मजदूर दिवस वर्षों से भारत सहित विश्व के अस्सी से अधिक देशों में बड़े ही जोर शोर से मनाया जाता है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में श्रमिक वर्ग की स्थिति में सुधार हुआ है!निश्चित रूप से कुछ कल्याणकारी कार्यक्रम लागू हुए हैं लेकिन आज भी श्रमिक और किसान विपन्नता की स्थिति से गुजर रहे हैं।अमीर और अधिक अमीर होता जा रहा है, गरीब और अधिक गरीब।पूंजी संचय कुछ धनिकों के मध्य ही होता जा रहा है।श्रमिक,किसान और कर्मचारी मेहनतकश होने के बाद भी गरीब हैं।

महात्मा गांधी ने देश की तरक्की देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर होना माना था।आज मजदूरों के साथ किसान भी बदहाली का जीवन जीने को मजबूर हैं।बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम के घण्टे निश्चित नहीं है।व्यक्ति कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है।कार्मिक मानसिक तनाव की स्थिति में जीने को अभिशप्त हैंः।यह स्थिति निजी क्षेत्र के साथ सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों में भी पाई गई है। क्या इस दिशा में सुधार नहीं किया जाना चाहिए! मजदूर,कामगार और किसानों की तरक्की के लिए और आज के बदले माहौल में फ्रैंकलीन डी रूजवेल्ट के शब्दों में कहा जा सकता है कि-”किसी कारोबार को इस देश में जारी रहने का अधिकार नहीं है जो अपने श्रमिकों को जीवन निर्वाह मजदूरी से भी कम मजदूरी पर रखता हो।जीवन निर्वाह मजदूरी से तात्पर्य केवल निर्वाह स्तर से ज्यादा है, मतलब सम्माननीय निर्वाह की मजदूरी से है।”निश्चित ही मजदूर और किसान की दशा और दिशा में सुखकारी परिवर्तन की जरूरत है।उन्हें आर्थिक सुदृढ़ता के साथ कार्य का निर्धारित समय ,कार्य क्षेत्र में बेहतर वातावरण और समुचित सुविधाएँ उपलबध हों,इस पर सरकार की निगरानी भी जरूरी है।मजदूर दिवस की सार्थकता भी तभी होगी। परिवर्तित हालात में समाज, सरकार और पूंजीपतियों की संयुक्त जवाबदारी तो है ही,किसान-मजदूरों की जागरूकता भी आवश्यक है।क्या उम्मीद करें कि अपने हक की लड़ाई के लिए दुनिया भर के मजदूर-किसान एक होंगे!

डॉ. प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन, उपाध्याय नगर, मेंढ़की रोड़, देवास (म.प्र.)

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