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मुंबई विश्वविद्यालय का आदर्श रखकर न्यायालय भी काले कपडों का त्याग कर अंग्रेजों की दास्यत्व के प्रतीक उखाड फेंके

विजय न्यूज़ ब्यूरो
जिले का नाम – पदवीदान समारोह के समयपर अंग्रेजों की रीति के अनुसार विद्यार्थी परिधान कर रहे काले कोट और काली टोपी के स्थानपर भारतीय संस्कृति के अनुसार पोशाक लाने का निर्णय मुंबई विश्वविद्यालय ने लिया है । मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा लिया यह निर्णय निश्‍चित ही अभिनंदनीय है । मुंबई विश्वविद्यालय के इस निर्णय का आदर्श सामने रखकर देश के अन्य सभी विश्वविद्यालय और न्यायालय भी काला पोशाक और काले कोट का बहिष्कार करे, ऐसी हिन्दू जनजागृति समिति की मांग है ।

स्वयं का साम्राज्य अबाधित रखने के लिए अंग्रेजों ने भारत में न्यायव्यवस्था प्रारंभ की । इस समय इंग्लैंड स्थित ‘प्रीवी कौन्सिल’ के आधार पर भारतीय न्यायव्यवस्था में उसी पद्धति का पोशाक प्रस्थापित किया गया । वास्तविकता में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्‍चात अंग्रेजों की गुलामी के प्रतीक रहे रीति रिवाज बदलना आवश्यक था; मात्र ऐसा नहीं हुआ । न्यायव्यवस्था में न्यायाधीश और अधिवक्ता परिधान कर रहे काला पोशाक और काला कोट यह अंग्रेजों की गुलामी का ही प्रतीक है । मुंबई विश्वविद्यालय ने यह निर्णय लेते हुए उष्ण वातावरण के कारण काले वस्त्रों से पीडा होने का कारण सम्मुख रखा है; मात्र शारीरिक पीडा के साथ साथ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी यह कोट कष्टदायक है । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय ने वर्ष 2018 में ‘यूटीएस्’ (यूनिवर्सल थर्मो स्कॅनर) इस उपकरणद्वारा किए वैज्ञानिक परीक्षण में अन्य रंगों की तुलना में काले रंग में सर्वाधिक नकारात्मक स्पंदन निर्माण होने के कारण वह व्यक्ति को कष्टदायक होने का भी निष्कर्ष प्राप्त हुआ है । प्रत्येक देश का परिचय उस देश की संस्कृतिद्वारा वृद्धिंगत होता है । भारत के प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदीजी ने अंग्रेजों के काल से चले आ रहे और कालबाह्य हुए अनेक कानून रहित किए । इसी प्रकार अंग्रेजों की गुलामी के प्रतीक न्यायालयीन कोट और पोशाक बदलकर भारतीय संस्कृति के अनुसार न्यायव्यवस्था में योग्य पोशाक लानेपर सभी भारतवासियों को आनंद ही होगा । भाजपा सरकार और न्यायव्यवस्था इस विषय पर शीघ्र और सकारात्मक निर्णय ले, ऐसी अपेक्षा है ।

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