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मूवी रिव्यू : जंगली

कलाकार : विद्युत जामवाल,अतुल कुलकर्णी,अक्षय ओबेरॉय,आशा भट,पूजा सावंत
निर्देशक : चक रसेल
मूवी टाइप : ऐक्शन,अडवेंचर,थ्रिलर
अवधि : 1 घंटा 55 मिनट

इंसान चूंकि ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ कृति है, तो यह उसका फर्ज़ है कि वह संसार की दूसरी निरीह और लुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण करे, उन्हें प्रोटेक्ट करे। जानवरों को प्रेम दें और हाथियों का संरक्षण करें, मूल रूप से हॉलिवुड के निर्देशक चक रसेल की फिल्म यही संदेश देती है और साथ ही यह भी दर्शाती है कि यदि जानवरों को प्रेम और स्नेह दिया जाए तो वे इंसान के सबसे बड़े स्वामिभक्त और साथी साबित होते हैं। फिल्म में जानवरों के इमोशन और ऐक्शन को निर्देशक ने इतनी खूबसूरती से दर्शाया है कि फिल्म देखने के कुछ ही समय में आप हाथियों के नाम और किरदारों से जुड़कर उनके जज़्बातों को समझने लगते हैं । बॉलिवुड में जानवरों पर गिनी-चुनी फिल्में बनी हैं, मगर ‘जंगली’ न केवल आपको राजेश खन्ना की ‘हाथी मेरे साथी’ की याद दिलाएगी, बल्कि कुदरत के मनोरम दृश्यों के साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाले ऐक्शन और हाथियों के झुंड की मासूमियत और उनके क्रिया-कलाप आपका मन मोह लेंगे।

कहानी: फिल्म की कहानी बहुत ही सरल और सहज है। राज नायर ( विद्युत जामवाल) शहर में काम करने वाला जानवरों का डॉक्टर है। 10 साल के लंबे अरसे बाद वह अपनी मां की बरसी पर अपने घर उड़ीसा लौटता है तो उसे कई नई बातों से दो-चार होना पड़ता है। उड़ीसा में उसके पिता हाथियों को संरक्षण प्रदान करने वाली एक सेंचुरी चलाते हैं। उसका पीछा करती हुई पत्रकार मीरा (आशा भट्ट) भी उसके साथ हो लेती है । वह राज के पिता पर एक आर्टिकल करना चाहती है। राज के घर पर उसके पिता के साथ सेंचुरी को सपॉर्ट करने के लिए उसकी बचपन की साथी शंकरा ( पूजा सावंत) और फॉरेस्ट ऑफिसर देव भी है। घर लौटने के बाद राज अपने बचपन के साथी हाथियों में भोला और दीदी से मिलकर बहुत खुश होता है और पुराने दिनों को याद करता है, जब उसकी मां जीवित थी और वह अपने गुरु (मकरंद देशपांडे ) से कलारिपयट्टु का प्रशिक्षण ले रहा था।
हाथियों के साथ मौज-मस्ती करने वाले राज को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उनकी खुशहाल सेंचुरी और हाथियों पर शिकारी नज़र गड़ाए बैठा है। हाथी दांत के विदेशी तस्करों के लिए शिकार करनेवाला शिकारी (अतुल कुलकर्णी) सेंचुरी में आकर हाथी दांत हासिल करने के लिए सबकुछ तहस-नहस कर देता है। इतना ही नहीं वह हाथियों के सरदार भोला और राज के पिता की जान लेकर वहां से भाग निकलता है। क्या राज हाथियों को बचा पाएगा? क्या वह तस्करों और शिकारियों से अपने पिता और मारे गए हाथियों का बदला ले पाएगा। इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

रिव्यू: निर्देशक चक रसेल ‘जंगली’ से अपनी बॉलिवुड पारी की शुरुआत कर रहे हैं। हॉलिवुड में ‘मास्क’, ‘स्कॉर्पियन किंग’, ‘इरेजर’ जैसी बम्पर हिट फिल्में दे चुके चक रसेल ने बॉलिवुड की नब्ज को सही ढंग से पकड़ा है। उन्होंने किरदारों में भारतीय मूल्यों के साथ पुराण, मंत्रों और विघ्नहर्ता गणेश भगवान को भी जोड़ा है, साथ ही उन्होंने ऐक्शन और इमोशन में अपनी जादूगिरी बखूबी निभाई है।
सिनेमटॉग्रफर मार्क इरविन की सिनेमटॉग्रफी में उड़ीसा के मनोहारी जंगलों, नदियों और उनमें घर बसाए हुए हाथियों को देखना किसी विजुअल ट्रीट से कम नहीं। ऐक्शन दृश्य हर स्तर पर हैरअंगेज साबित हुए हैं, चाहे वह विद्युत द्वारा मुंबई के गुंडों से निपटने के फाइट सीक्वेंस हों या जंगल में तस्करों और शिकारियों के साथ के फाइट दृश्य हों, ऐक्शन डायरेक्टर चुंग ची ली ने काबिले तारीफ़ काम किया है। अभिनय की बात की जाए तो विद्युत अपने किरदार रचे-बसे मालूम होते हैं। उन्होंने कलरीपयट्टु योद्धा और हाथियों के साथी के रूप में गजब का काम किया है। ऐक्शन दृश्यों में उनकी चपलता और फ्लेक्सिबिलिटी आश्चर्यचकित कर देती है। जज्बाती दृश्यों को भी उन्होंने खूबसूरती से निभाया है। रोल के लिए की गई मेहनत पर्दे झलकती है और चरित्र को विश्वसनीय बनाती है। आशा भट्ट और पूजा सावंत ने फिल्म से डेब्यू किया है और दोनों अपने रोल में जमी हैं। आशा बहुत क्यूट लगी हैं और पूजा कॉन्फिडेंट। शिकारी और तस्करों का साथ देनेवाले खलनायक को अतुल कुलकर्णी ने अपने अलहदा अंदाज में निभाया है। अक्षय ओबेरॉय और मकरंद देशपांडे अपनी भूमिकाओं में याद रह जाते हैं। सहयोगी कास्ट फिल्म के अनुरूप है। समीर उद्दीन के संगीत में ‘गरजे गरजे’ गाना अच्छा बन पड़ा है। ‘फकीरा घर आजा’ और ‘साथी’ गाने भी विषय के मुताबिक़ हैं।

क्यों देखें: दिल धड़का देने वाले ऐक्शन सीक्वेंसेज, निरीह और मासूम हाथियों की गुटबंदी और उड़ीसा के मनोहारी दृश्यों की विजुअल ट्रीट के लिए फिल्म देखनी तो बनती है। आप अगर एनिमल लवर हैं, तो यह फिल्म आपके दिल में उतर जाएगी।

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