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मूवी रिव्यू : द जोया फैक्टर

जिंदगी में लक फैक्टर से इनकार नहीं किया जा सकता, मगर जब यह फैक्टर अंधविश्वास में बदल जाए तो फिर मेहनत और टैलंट की ऐसी-तैसी हो जाती है। यही निर्देशक अभिषेक शर्मा की ‘ द जोया फैक्टर’ का मूल है। इससे पहले अभिषेक शर्मा ‘तेरे बिन लादेन’ और ‘शौकीन’ जैसी हलकी-फुलकी फिल्में ला चुके हैं। उन्होंने न्यूक्लियर टेस्ट की सच्ची घटना पर आधारित ‘पोखरण’ का निर्देशन भी किया था। इस बार ‘द जोया फैक्टर’ के जरिए एक बार फिर से वह लाइट हर्टेड कॉमिडी के साथ प्रस्तुत हुए हैं।

कलाकार : सोनम कपूर, दुलकर सलमान, अंगद बेदी, संजय कपूर
निर्देशक : अभिषेक शर्मा
मूवी टाइप : रोमांस, कॉमेडी
अवधि : 2 घंटा 16 मिनट

कहानी: इंडिया के लिए ऐतिहासिक समझे जानेवाले 25 अगस्त 1983 को जन्मी जोया (सोनम कपूर) को उसका क्रिकेटप्रेमी परिवार लकी चार्म का खिताब दे देता है। उन्हें लगता है कि इंडिया के वर्ल्ड कप जीतने में जोया की पैदाइश का हाथ है। उसके बाद से गली का क्रिकेट हो या जोया की जॉब का मामला हर जगह जोया का लक फैक्टर ऐन वक्त पर उसकी डूबती नैया को पार लगा जाता है। पेशे से विज्ञापन जगत में जूनियर कॉपी राइटर का काम करनेवाली जोया को उसकी ऐड एजेंसी इंडियन क्रिकेट टीम का फोटोशूट करने भेजती है। वहां जोया और भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान निखिल खोडा (दुलकर सलमान) पहली नजर में एक-दूसरे के आकर्षण में बंध जाते हैं। अगले दिन नाश्ते की टेबल पर भारतीय क्रिकेट टीम के साथ नाश्ता करते हुए जब जोया सभी को यह बताती है कि उसके घरवाले क्रिकेट के लिए उसे लकी चार्म मानते हैं, तो टीम के कई खिलाड़ी इस बात से प्रभावित नजर आते हैं। उसी दिन जब इंडिया अविश्वसनीय तरीके से मैच जीत जाती है, तो टीम का यह भरोसा पक्का हो जाता है कि जोया क्रिकेट के मामले में लकी है। हालांकि निखिल को लक के बजाय खिलाड़ियों की मेहनत और प्रतिभा पर विश्वास है। जोया और निखिल का प्यार आगे बढ़ता है और उसी के साथ बढ़ती है, भारतीय क्रिकेट टीम का जोया पर क्रिकेट के लिए लकी चार्म होने का यकीन। वहां इंडियन क्रिकेट बोर्ड जोया को भारतीय क्रिकेट टीम का लकी मस्कट बनने का प्रस्ताव देता है, ताकि वे वर्ल्ड कप को हासिल कर सकें। जोया पहले तो इस प्रस्ताव को नकार देती है, मगर जब टीम का प्लेयर रोबिन (अंगद बेदी) उसके और निखिल के बीच गलतफहमियां पैदा कर देता हैं, तो वह निखिल के सामने अपने लक फैक्टर को साबित करने के लिए उस एक करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन कर देती है। अब वर्ल्ड कप में जोया का लकी चार्म काम आता है या निखिल का अपनी टीम पर यकीन? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

रिव्यू: अनुजा चौहान की किताब पर आधारित अपनी फिल्म को निर्देशक अभिषेक कपूर ने फर्स्ट हाफ में काफी लाइट रखा है। यह दर्शकों का मनोरंजन तो करती है, मगर टुकड़ों में। मध्यांतर से पहले फिल्म की गति काफी सुस्त है। सेकंड हाफ में जोया फैक्टर के ऑन होते ही फिल्म अपनी रफ्तार पकड़ती है, मगर जिस तरह से निर्देशक ने जोया के लक फैक्टर से इंडियन टीम को जिताते दिखाया है, वह बचकाना लगता है। कमेंट्रेटरों की कमेंट्री हंसाती तो है, मगर आप सोच में पड़ जाते हैं कि इस क्या इस तरह की कमेंट्री क्रिकेट में संभव है। निर्देशक ने मनोरंजन की डोर को थामे रखने के लिए क्रिकेट के इर्द-गिर्द बुनी गयी इस फिल्म में काफी सिनेमैटिक लिबर्टी ली है। भोली और बेवकूफ जोया के रूप में सोनम ने अपनी भूमिका को ईमानदारी से अंजाम दिया है। इस तरह की भूमिकाएं वह पहले भी कर चुकी हैं, मगर इस बार उनकी कॉमिक टाइमिंग संवरी हुई नजर आती है। फिल्म का मुख्य आकर्षण दुलकर सलमान साबित हुए हैं। ‘कारवां’ के बाद यह उनकी दूसरी फिल्म है और इसमें वह न केवल क्यूट और हैंडसम लगे हैं बल्कि उन्होंने अपनी भूमिका को पूरे कन्विक्शन के साथ जिया है। फिल्म में एक सीन के लिए आए अनिल कपूर हंसाने में कामयाब रहे हैं। जोया के पिता के रूप में संजय कपूर और भाई दिलावर के रूप में सिकंदर खेर ने अच्छा काम किया है। रॉबिन के रोल में अंगद बेदी ने इंटेंसिटी बनाए रखी है। शंकर-एहसान-लॉय के संगीत में ‘काश’ और ‘मेहरू’ जैसे गाने खूबसूरत बन पड़े हैं।

क्यों देखें: हलकी-फुलकी कॉमिडी के शौकीन यह फिल्म देख सकते हैं।

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