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यह जो अन्नदाता है,क्यों फांसी पर चढ़ जाता है?

हमारे देश में कृषक समाज अथवा किसानों के लिए तरह-तरह के विशेषण व उपमाएं इस्तेमाल की गई हैं। मिसाल के तौर पर यहां किसान को भगवान का दर्जा देते हुए उसे अन्नदाता भी कहा जाता है। ज़ाहिर है जो किसान धूप, गर्मी-सर्दी, बारिश, ओले-पत्थर, आंधी-तू$फान और अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना धरती से अन्न पैदा करे और उसका पैदा किया हुआ अन्न खाकर हम सब जीवित रह सकें तो निश्चिति रूप से यदि वह भगवान नहीं तो भगवान के एक सच्चे प्रतिनिधि का रूप तो है ही। हमारे ही देश में जय किसान और हरित क्रांति जैसे शब्दों का गौरवपूर्ण प्रयोग भी इस बात का प्रमाण है कि हम कृषक समाज की शक्ति को प्रणाम करते हैं। कहीं-कहीं यह कहावत भी हमारे ही देश में प्रचलित है कि ऊपर भगवान नीचे किसान। इसी कृषक समाज की बातें कर हमारे देश में न जाने कितने नेता स्वयं को किसान नेता के रूप में स्थापित कर पाने में सफल रहे और देश के सर्वोच्च पद अर्थात् प्रधानमंत्री की कुर्सी तक भी जा पहुंचे। सवाल यह है कि क्या किसानों के नाम के साथ इस्तेमाल की जा रही उपमाएं अथवा विशेषण वास्तव में उनके कल्याण,उनके मान-सम्मान,उनके व उनके परिवार के वास्तविक जीवन के अनुरूप हैं? क्या उनका वर्तमान जीवन स्तर या उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति ऐसी हैकि हम उनकेनामकेजयकारेलगा सकें,उन्हें अन्नदाता कह सकें?क्या स्वतंत्रता से लेकर अब तक देश को किसानों को संरक्षण देने वाला तथा कृषि के क्षेत्र में उनकी सहायता करने वाला $कानून बन सका है? किसानों के बड़े-बड़े नेता और स्वयंभू मसीहाओं ने किसानों के नाम पर सत्ता सुख भोगने व अपनी राजनैतिक दुकान चलाने के सिवा किया क्या है?
अब आईए ज़रा इसी ‘अन्नदाता’ से जुड़ी एक और ह$की$कत से रूबरू होते हैं। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कृषि व्यवसाय पर ही निर्भर करती है। परंतु दुर्भाग्यवश भारत ही दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा देश भी है जहां किसानों की आत्महत्या की दर प्रतिवर्ष तेज़ी से बढ़ती जा रही है। 2014 में राष्ट्रीय क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो ने 5659 किसानों की आत्महत्या की बात स्वीकार की थी। हमारे देश में कृषक समाज के हितों की पैरवी तथा रक्षा करने वाले तमाम नेता,स्वयंसेवी संगठन तथा किसान संगठन मौजूद हैं। इसके बावजूद न तो किसानों को पूरा संरक्षण मिल पा रहा है न ही उन्हें उनकी $फसल की पूरी $कीमत मिल रही है। उन्हें उन्नत खेती की तकनीक व साधन मिलने तो दूर वर्तमान तरी$के से की जाने वाली खेती के लिए उचित मूल्य पर खाद,बीज आदि तक मयस्सर नहीं हो पा रहे हैं। हमारे देश का किसान आज कहीं बाढ़ व सूखे से अपनी $फसल चौपट होने के कारण आत्महत्या कर लेता है तो कहीं भारी $कजऱ् के बोझ तले दबकर फांसी के फंदे पर लटक जाता है। कहीं किसान विरोधी सरकारी नीतियां उससे जीने के अधिकार छीन लेती हैं तो कहीं इन्हीं आर्थिक तंगियों के कारण परिवार में उपजी तरह-तरह की शादी-विवाह,पढ़ाई-लिखाई व $गरीबी जैसी समस्याओं से जूझता हुआ वही किसान फांसी के फंदे को चूम लेता है। यही वजह है कि हमारे देश के किसी न किसी राज्य अथवा क्षेत्र से किसान आंदोलनों के समाचार अक्सर आते रहते हैं।
किसानों की दुर्दशा केवल यहीं समाप्त नहीं होती बल्कि यही ‘अन्नदाता समाज’ जब कभी अपने अधिकारों की मांग करते हुए सडक़ों पर उतरता है या अपनी निर्वाचित सरकार से अपनी $फरियाद करने के लिए सामूहिक रूप से धरना-प्रदर्शन व जुलूस-रैली आदि निकालता है तो उसे सरकार की दमनकारी नीतियों का सामना करते हुए कभी लाठियां खानी पड़ती हैं तो कभी उसे गोलियों से छलनी कर दिया जाता है। कभी उसे जेल की सला$खों के पीछे डाल दिया जाता है तो कभी झूठे वादे व आश्ववासन के साथ उसके आंदोलन को समाप्त करा दिया जाता है। यहां तक कि सत्ता के खिलाड़ी राजनेता ज़रूरत पडऩे पर इन किसान संगठनों में फूट डालकर अन्नदाता को ही सत्ता तथा विपक्ष के समर्थक किसानों के रूप में दो धड़ों में बांटकर पूरे किसान आंदोलन को राजनैतिक रूप देकर उसे समाप्त करने की कोशिश भी करते हैं। देश के कई राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने किसानों के नाम पर कई ऐसे संगठन बना रखे हैं जो कभी किसानों के हित में आंदोलन करते दिखाई देते हैं तो कभी किसी दूसरे आंदोलनकारी संगठन के विरोध में खड़े होकर सत्ता की भाषा बोलते नज़र आते हैं। और शायद यही वजह है कि देश का किसान विभिन्न राजनैतिक संगठनों के बीच बंट जाने के कारण तथा कभी-कभी धर्म व जाति की रेखाओं से विभाजित हो जाने के कारण तो कभी क्षेत्र व भाषा के नाम पर एक-दूसरे से तालमेल न बिठा पाने की वजह से तो कभी अलग-अलग क्षेत्रों के किसानों की अलग-अलग तरह की मांगें होने की वजह से इनमें एक मंच के नीचे संगठित हो पाना संभव नहीं हो पाता। लिहाज़ा असंगठित व विभाजित होने के कारण इनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाता।
परंतु पिछले दिनों देश के किसान आंदोलन के इतिहास में पहली बार भारतवर्ष के 184 किसान संगठनों ने इकठ्ठे होकर दिल्ली के संसद मार्ग पर कई दिनों तक लगातार धरना-प्रदर्शन किया और दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद लगाई। इस दौरान अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति के नाम से एक सांझा मंच बनाया गया जो पूरे देश के किसानों की आवाज़ को सुनेगा तथा उनकी मांगों के लिए संघर्ष करेगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लगभग सभी राज्यों से शामिल हुए इन किसानों मेें तमिलनाडु के वह किसान एक बार फिर शामिल हुए जिन्होंने इसी वर्ष जुलाई माह में अपने अपने गले में अपने साथी उन 17 किसानों के कंकाल की मालाएं पहन रखी थीं जो आत्महत्या कर अपनी जान गंवा बैठे थे। देश के सत्ताधारियों ने भले ही उनकी मांगों पर अपने कान न धरे हों परंतु विश्व मीडिया का ध्यान इन ‘अन्नदाताओं’की ओर उस समय ज़रूर आकर्षित हुआ था जबकि यही किसान राजधानी में अपने ही मलमूत्र का सेवन कर अपनी बेबसी बयान कर रहे थे। हद तो यह है कि वे निर्वस्त्र भी हो गए थे। इनकी यह मजबूरियां देखकर क्या हमें अन्नदाता व जय किसान जैसे शब्द न्यायसंगत प्रतीत होते हैं?
देश के समक्ष यह आ$िखर कितना बड़ा सवाल है कि एक ओर देश का बड़े से बड़ा कारपोरेट घराना जोकि लाखों करोड़ का $कजऱ्दार हो और ऋण अदा न कर पाने की स्थिति में भी वही व्यक्ति न केवल वीवीआईपी भी बना रहे बल्कि सरकार उसे और अधिक ऋण देने के नए रास्ते तलाश करे और उसे ऋण मुहैया कराए? आज तक देश में किसी डि$फाल्टर पूंजीपति के विरुद्ध अ$खबारों में न तो कोई विज्ञापन प्रसारित होता है न उसे अपमानित करने वाले चित्र प्रकाशित किए जाते हैं। परंतु किसानों की $फोटो बैंकों के मुख्य द्वार पर लगाना,अ$खबारों में प्रकाशित करना उनके विरुद्ध कुर्की के आदेश जारी कर देना,डि$फाल्टर किसान को दोबारा ऋण $कतई न देना क्या यह सब नीतियां ‘ जय किसान’की नीतियों के अनुरूप हैं? क्या वजह है कि आज कृषि से जुड़े हुए अन्य सभी व्यवसाय अर्थात् आढ़ती,कृषि यंत्र उत्पादक,ट्रैक्टर कंपनियां, सबमरसिबल पंप उद्योग, खाद निर्माता, कृषि माल ढुलाई व पैकिंग से जुड़ा वर्ग,अन्न निर्यातक,दलाल,थोक व फुटकर अन्न विक्रेता यहां तक कि कृषि मंडियों में काम करने वाले मुनीम कर्मचारी तथा मज़दूर तक आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहे है व संपन्न होते जा रहे हैं परंतु ले-दे कर कृषि की पैदावार करने वाला किसान ही अपनी पैदावार की सही $कीमत सही व$क्त पर क्यों नहीं हासिल कर पाता? जब तक यह सवाल बर$करार रहेगा तब तक किसान आत्महत्याओं का सिलसिला भी जारी रहेगा और इन्हें अन्नदाता कहा जाना भी महज़ एक मज़ा$क नज़र आएगा।

निर्मल रानी

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