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लोकसभा चुनाव से पहले नहीं आ सकता अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली । सर्वोच्च न्यायालय की अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए गठित 5 सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति ललित की मौजूदगी पर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन के सवाल उठाने के बाद बहुप्रतीक्षित सुनवाई एक बार फिर टल गई है। इसके बाद न्यायमूर्ति ललित ने बेंच से खुद को अलग कर लिया है। अब नई संवैधानिक पीठ इसकी सुनवाई करेगी। लोकसभा चुनाव में इतना कम समय बचा है कि यह असंभव ही है कि चुनाव के पहले तक इस मसले में कोई निर्णय आ पाएगा।
इस मामले में अगली तारीख 29 जनवरी तय की गई है। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले इस मामले में फैसले की गुंजाइश काफी कम हो गई है। लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई में होने निर्धारित हैं। चूंकि संवैधानिक पीठ सप्ताह में सिर्फ 3 दिन बैठती है, लिहाजा आम चुनाव से पहले इस मामले की सुनवाई के लिए ज्यादा से ज्यादा 36 दिन मिलेंगे। हिंदुस्तान के इतिहास के इस सबसे जटिल मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए यह समय काफी कम होगा।
सितंबर 2010 के अपने फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवाद जमीन को निर्मोही अखड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर-बराबर 3 हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट में 88 गवाहों के बयान दर्ज हुए, जो 13,886 पेज के हैं। कार्रवाई के दौरान अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, फारसी, अरबी, उर्दू और गुरुमुखी में लिखे कुल 227 दस्तावेजों का परीक्षण किया गया। 8,533 पेज के फैसले में इन दस्तावेजों से तमाम बातों का भी जिक्र है।
मुस्लिम और हिंदू पक्ष के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को पिछले साल बताया था कि सभी दस्तावेजों का अनुवाद हो चुका है। हालांकि, गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई ने कहा अभी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि सभी दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद पूरा हो चुका है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के एक कमरे में अयोध्या मामले से जुड़े दस्तावेजों का ढेर लगा है। इन्हें लोहे के 15 बक्सों में सील करके रखा गया है।

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