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वर्तमान हालात लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं हैं

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को चुनना एक अनिवार्य प्रक्रिया है।चुनाव निष्पक्ष तरीक़े से सम्पन्न हो, यह लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए जरूरी है।संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत संवैधानिक संस्थाएँ अपने दायित्वों का बिना किसी दबाव, प्रभाव एवं पक्षपात के निर्वाह करें,यह स्वस्थ्य लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है लेकिन हाल ही के वर्षों में संवैधानिक संस्थाओं पर भी ऊंगली उठने लगी है और उनकी निष्पक्षता पर भी संदेह किया जाने लगा है।यह स्थिति किसी भी दशा में स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए कदापि उचित नहीं कही जा सकती है।संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्र प्रस्थिति के साथ उनकी निष्पक्षता भी उतनी ही आवश्यक है।यह भी तब जबकि आपातकाल का काला अध्याय हमारे लोकतंत्र के इतिहास का अंग बन चुका है और वर्तमान हालात भी चिंतनीय स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं।

हाल ही के वर्षों में हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुत ज्यादा विकृतियाँ घर कर गई हैं ,जहाँ लोकतान्त्रिक मूल्यों और परम्पराओं का ह्रास होता जा रहा है।लोकतंत्र को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दल अपने आदर्शों, मूल्यों,सिद्धांतों के साथ अपनी नीतियों और कार्यक्रम लेकर चुनाव मैदान में उतरें और जब इसी आधार पर कोई दल सत्ता प्राप्त करता है तो उसे उन्हीं नीतियों और कार्यक्रमों को लागू एवं क्रियान्वित करना चाहिए।लेकिन प्रायः ऐसा हो नहीं रहा है।राजनीतिक दलों के सिद्धांत, नीतियाँ और कार्यक्रम केवल घोषणा पत्र तक ही सीमित रह जाते हैं जबकि लोकलुभावन और भेदभाव पूर्ण कई नये कार्यक्रम लागू कर दिये जाते हैं।जिससे नागरिकों में असंतोष व्याप्त हो जाता है। यह स्थिति उचित नहीं कही जा सकती।

हमें इस मामले में ब्रिटेन से सीख लेना चाहिए।वहाँ यदि सत्ताधारी दल कोई नई नीति या कार्यक्रम लागू करना चाहता है तो उसपर जनता का मेन्डेट लेना अनिवार्य समझा जाता है।विपक्ष को भी विश्वास में लेकर कदम उठाए जाते हैं जबकि हमारे देश में सत्तापक्ष मनमाने और अड़ियल रूख के साथ काम करता है, दूसरी ओर विपक्ष सदैव अड़ंगे लगाने और विरोध करने के एकसूत्री फार्मूले पर काम करता है।हमें पश्चिमी देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।अमेरिका जैसे देश में चाहे रिपब्लिकन पार्टी हो या डेमोक्रेटिक पार्टी, अपनी नीतियों और कार्यक्रमों पर खुली बहस करती हैं और जनता की भी उतनी ही सहभागिता होती है।ऐसा नहीं है कि मीडिया की सहभागिता से प्रायोजित अनर्गल बहस और प्रलाप हों।हालांकि वहाँ इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में चुनाव प्रचार के अनैतिक एवं विकृत तरीक़े अपनाये जाने के आरोप भी लगे हैं और इसी बात पर अमेरिकी मीडिया और विश्व भर में राष्ट्रपति ट्रम्प की आलोचना भी हुई थी किन्तु बावजूद इसके लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था राजनीतिक दलों की नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर ही पुष्ट होती है।

विगत कुछ वर्षों में हमारे राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने अपने लोकतांत्रिक ढ़ाँचे को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।चाहे कोई भी राजनीतिक दल रहा हो,चाहे वह क्षेत्रीय दल हो या राष्ट्रीय, अपनी अस्थिर नीतियों और कार्यक्रमों के द्वारा देश के साथ ही लोकतान्त्रिक व्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है।राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है।किसी समय कैडर बेस्ड पार्टी भाजपा,जो कि दलगत अनुशासन के मामले में बेहतर थी, में भी अनुशासनहीनता और तानाशाही पूर्ण प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है।कांग्रेस में तो व्यक्ति पूजा का इतिहास ही रहा है।वर्तमान दौर में लगभग सभी राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतंत्र समाप्त सा हो गया है और यही कारण है कि दलीय अनुशासन भी नहीं रह गया है।पार्टी सदस्यों में पार्टी से लगाव सत्ता मोह तक सीमित हो गया है।जनसेवा की भावना के स्थान पर पद और प्रतिष्ठा प्राथमिकता में आ गए हैं। हाल ही के वर्षों में यह भी देखा गया है कि किसी भी राजनीतिक दल की कोई स्पष्ट विचारधारा, आदर्श, सिद्धांत या फिर कार्यक्रम नहीं है।उनका एकमात्र मूल ध्येय मतदाता को किसी तरह आकर्षित कर अपने पक्ष में वोट बैंक तैयार करना ही रह गया है।

सत्ता प्राप्ति के लिए विचारहीन तथा बेमेल गठबन्धन आम बात हो गई है जो कल तक कट्टर विरोधी थे, वे आज घनिष्ठ दोस्ताना सम्बन्धों के साथ चुनाव लड़ रहे हैं।ऐसे बेमेल गठबन्धन और महागठबन्धन चुनाव पूर्व बन रहे हैं।यहाँ तक कि सत्ता में भी साथ रहते हैं।यह आमजन भी समझ रहा है कि राजनीतिक दलों का एकमात्र लक्ष्य जनसेवा न होकर येनकेन प्रकारेण सत्ता की डोर थामना है। वर्ष 2014 के चुनाव जहाँ विकास के नारे के साथ कांग्रेस मुक्त भारत के नाम पर लड़े गये थे,वहीं वर्ष 2019 के चुनाव विपक्ष द्वारा मोदी मुक्त या कहें भाजपा मुक्त भारत के नाम पर लड़े जा रहे हैं।इसमें कहीं कोई छुपा हुआ एजेंडा नहीं दिखाई दे रहा है।सत्ताधारी दल भी अपनी कमजोरियों को छुपाते हुए राष्ट्रवाद के नाम पर मोर्चा सम्भाले हुए है।

बहरहाल, विगत चुनाव से ही चुनाव प्रचार घटिया स्तर तक जा पहुँचा है।नेताओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह आ खड़े हुए हैं।व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, छिछालेदारी और निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग इन चुनावों में हो रहा है।लोकतंत्र एक मजाक बनकर रह गया है।कोई भी दल अपनी जनहितकारी नीतियों और कार्यक्रमों के बलबूते मतदाता से वोट की अपील नहीं कर रहा है बल्कि एक दूसरे पर अनर्गल आरोप-प्रत्यारोप लगाकर ,एक दूसरे को नीचा दिखाकर वोट कबाड़ना चाह रहा है।रही सही कसर वोटर को तरह -तरह के प्रलोभन देकर पूरी कर रहे हैं।

पार्टी टिकट के लिए मारा-मारी,पार्टी प्रत्याशियों का अपना आपराधिक रेकार्ड तथा अकूत सम्पत्ति की स्थिति, चुनाव खर्च में बेतहाशा वृद्धि जिससे ईमानदार और अच्छे लोगों की राजनीतिक नेतृत्व में बढ़ती दूरी,यह सब बातें स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए हितकारी न होकर शुभ संकेत भी नहीं हैं।वर्तमान स्थिति देखते हुए लोकतंत्र के विकृत होते स्वरूप के कारण निराशा के भाव के साथ व्यवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं।इसका एकमात्र हल भी जनजागरूकता ही दिखाई देता है।

डॉ प्रदीप उपाध्याय,
16,अम्बिका भवन, बाबूजी की कोठी, उपाध्याय नगर, मेंढकी रोड़,देवास, म.प्र.
9425030009(m)

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