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विपक्ष ने फिर आलापा ईवीएम राग

देश में 17वीं लोकसभा के गठन को लेकर आम चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। प्रथम चरण के चुनाव में देश भर में विभिन्न राज्यों के 91 लोकसभा क्षेत्रों व आन्ध्रप्रदेश, ओडीसा, अरूणाचल प्रदेश व सिक्किम राज्यों में विधानसभा के लिये भी वोट डाले जा चुके हैं। प्रथम चरण के मतदान समाप्त होते ही भाजपा विरोधी दलो ने एक बार फिर से ईवीएम राग आलापना शुरू कर दिया है। सर्वप्रथम आन्ध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने ईवीएम मशीनो में गड़बड़ी की आशंका जाहिर कर 150 मतदान केन्द्रो पर फिर से मतदान करवाने की मांग की है। मौके की प्रतीक्षा कर रहे विपक्षी दलो के अन्य नेताओं ने भी उनके सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया।

यहां मजे की बात एक और है कि आन्ध्रप्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष व मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका जाहिर कर रहें हैं वहीं वहां चुनाव लड़ रही जगनमोहन रेड्डी की वाई एस आर कांग्रेस, भाजपा सहित अन्य पार्टियां खामोशी अख्तियार किये हुये हैं। चन्द्रबाबू नायडू के रवैये से लगता है कि उन्हे अपनी हार का अहसास हो गया है, इसीलिये वोट पड़ते ही उन्होने दिल्ली आकर ईवीएम पर अंगुली उठाना शुरू कर दिया है। चन्द्रबाबू नायडू चुनाव आयोग से मिलते वक्त जिस व्यक्ति को तकनीकी विशेषज्ञ बताकर अपने साथ लेकर गये थे वह पूर्व में ईवीएम चोरी का आरोपी निकला जिस कारण नायडू को चुनाव आयोग को सफाई देनी पड़ रही है।

दिल्ली में चन्द्रबाबू नायडू के साथ 21 विपक्षी दलो के नेताओं ने एक मिटिंग कर ईवीएम से चुनाव करवाने को सुप्रीम कोर्ट में फिर से चुनौति देने का फैसला किया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम मशीनो में गड़बड़ी होने की आशंको को लेकर दायर एक याचिका पर आठ अप्रेल को ही फैसला दिया था कि चुनाव आयोग हर विधानसभा क्षेत्र के एक बूथ पर एक वोटर मशीन के वोटो का वीवीपैट मशीन की पर्ची से मिलान कराने के निर्णय के स्थान पर हर विधानसभा क्षेत्र के पांच बूथों की ईवीएम मशीन के वोटो का वीवीपैट मशीनो की पर्चियों से मिलान करवाकर परिणाम घोषित करेगा। जबकि विपक्षी दलों ने गत पांच फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि सभी विधानसभा क्षेत्र के पचास प्रतिशत मतदान बूथों का वीवीपैट मशीनो की पर्चियों से मिलान करवाया जाये।

बीते दिसम्बर माह में पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव ईवीएम मशीनो से ही करवाये गये थे मगर उन चुनाव में राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा हार गयी थी व वहां कांग्रेस की सरकार बनी थी तब किसी भी दल ने ईवीएम मशीनो की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया था। उससे पहले कर्नाटक विधानसभा चुनावो में कांग्रेस ईवीएम मशीनो पर सवाल उठा रही थी मगर जनतादल सेक्यूलर से समझौता कर सरकार बना लेने के बाद कभी ईवीएम में गड़बड़ी की चर्चा नहीं की। 2017 में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के भारी बहुमत से जीतने पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने ईवीएम मशीनो में गड़बड़ी कर भाजपा पर चुनाव जीतने का आरोप लगाया था।

आप पार्टी के संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आज ईवीएम पर शक करने वालो में सबसे आगे है मगर 2015 में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतने पर उनको ईवीएम मशीनों पर पूरा विश्वास था। पंजाब विधानसभा चुनाव जीतने पर कांग्रेस ने ईवीएम पर कुछ नहीं बोला था। यानि जब विरोधी दल जीते तो ईवीएम सही है हारे तो गलत। रविवार को दिल्ली में 21 विपक्षी दलों के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर से लोकसभा चुनाव में वाटो की गणना करते वक्त ईवीएम वोटर मशीन व वीवीपैट मशीन की 50 प्रतिशत पर्चियों का मिलान कर ही मतगणना करवाने की मांग करते हुये एक नयी याचिका दायर करने का फैसला किया है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर की जाने वाली याचिका पर कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी के महासचिव सतीशचन्द्र मिश्रा, तूणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन, द्रुमक के अध्यक्ष एम के स्टालिन, सीपीएम के टीके रंगराजन, सीपीआई के एसएस रेड्डी, राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा, नेशनल कांफ्रेंस के संरक्षक फारूकअब्दुल्ला, जनता दल सेक्यूलर के दानिश अली, राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह, लोकतांत्रिक जनतादल के शरद यादव, हम के अध्यक्ष जीतनराम मांझी, एआईयूडीएफ के अध्यक्ष मोहम्म्द बदरूदीन अजमल, आप के अरविन्द केजरीवाल, तेलुगु देशम पार्टी के चन्द्रबाबू नायडू सहित अन्य कई दलो के नेताओ ने हस्ताक्षर किये हैं।

भारत में 2004 से लोकसभा चुनाव ईवीएम मशीनो द्वारा ही करवाये जा रहे हैं। देश में 2004 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार थी। कांग्रेस के कार्यकाल में ही ईवीएम मशीनो से चुनाव करवाने का फैसला लिया गया था। यदि ईवीएम मशीनो में गड़बड़ी की कहीं कोई गुंजायश थी तो कांग्रेस सरकार ने उसे ठीक क्यों नहीं करवाया। कांग्रेस सरकार में कानून मंत्री रहे एस वीरप्पा मोइली ने कहा था कि ईवीएम मशीन फूल प्रूफ है इसमें कोई गडबड़ी नही की जा सकती है। मोइली ने कहा था कि मेरे समय में इन मशीनो को लागू किया गया था। उस समय इन मशीनो को लेकर आयी शिकायतो की हमने जांच करवाई थी तब शिकायत में बतायी गयी बात गलत साबित हुयी थी।

ईवीएम मशीन से वोट डालने के लिये राजीव गांधी की सरकार ने जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में 1988 में संशोधन कर नई धरा 61 ए जोड़ी गयी थी जिससे चुनाव आयोग को मतदान में मशीन का उपयोग करने का अधिकार दिया गया था। भारत में कई बार करवायी गयी जांच में ईवीएम मशीन खरी उतरी है। चुनाव आयोग ने ईवीएम मशीन को और अधिक फूलप्रूफ बनाने के लिये इनके साथ वीवीपैट मशीन को जोड़ा है। देश में चल रहे लोकसभा चुनाव में सभी बूथ पर ईवीएम मशीन वीवीपैट से जुड़ी रहेगी जिसमें मतदान के बाद मशीन से जुड़े बक्से में एक पर्ची डलती जिस पर मतदाता ने जिस प्रत्याशी को वोट डाला है उसका नाम उस पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह दर्ज रहता है। चुनाव आयोग ने देश में अब तक लोकसभा के तीन बार आम चुनाव व कई राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव ईवीएम से करवा चुका है। ईवीएम मशीन इन्टरनेट से नहीं जुड़ सकती है जिससे इसको हैक नहीं किया जा सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में देश भर में करीबन 14 लाख ईवीएम मशीनो का उपयोग किया गया था।

देश में चल रही मोदी लहर को देखकर विपक्षी दलो के नेताओं को लगने लगा है कि आगामी चुनाव में एक बार फिर से एनडीए ही सत्ता में आने वाला है। इसलिये पहले से ही अपनी हार का ठीकरा ईवीएम मशीनो पर फोडऩे की भूमिका बांधने लगे हैं। जो विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हराने के सपने देख रहे थे। उन्होने अपने स्वार्थाे के चलते अपने-अपने प्रदेशो में तो एक दूसरे से समझौता किया नहीं। वहां तो एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। अब उन्ही दलों के नेता दिल्ली में ईवीएम के नाम पर एकजुटता दिखा रहे हैं। यदि इन 21 दलो के नेता पूरे देश में एक मोर्चा बनाकर आपस में सीटो का बटवारा कर चुनाव लड़ते तो इनको ईवीएम पर आरोप लगाने ही नहीं पड़ते।

सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह पूर्व ही ईवीएम पर अपना फैसला सुनाया है। अब सुप्रीम कोर्ट क्या दुबारा अपने दिये फैसले पर विचार करेगा या पूर्व में दिये गये अपने फैसले को ही बरकरार रखेगा। इस बात को लेकर सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के आगामी कदम पर रहेगी।

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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