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विश्व में शांति कैसे आएगी? – ब्रह्मज्ञान से! : श्री आशुतोष महाराज

‘मानव समुदाय के लिए अंतरिक्ष में शान्ति हो, पृथ्वी पर शान्ति हो…….सर्वत्र शान्ति हो|’ युगों पूर्व यही प्रार्थना हमारे वैदिक ऋषिगणों के उदार हृदयों से, समस्त विश्व के कल्याण के लिए प्रस्फुटित हुई थी। समय बीता, युग बदले, परन्तु शांति की यह अभिलाषा, एक अपरिवर्तनीय पुकार बन मानव-मन से सदा ही झंकृत होती रही। वर्तमान परिदृश्य में भय, वैमनस्य और आतंक के बादल सघन होते जा रहे हैं। हमारी हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ मानो विश्व में विध्वंसक तांडव को उत्तेजित कर रही हैं। समाचार पत्रों की रक्त रंजित सुर्खियाँ; युद्ध बिगुलों की गूंज में द्रवित मानवता का रुदन- इन सभी अमानवीय परिस्थितियों से जूझता मानव समाज, असहाय अवस्था में अन्य क्या गुहार कर सकता है? यही कि- ‘हमें शांति चाहिए! कहीं, कुछ तो ऐसा घटित हो जो इस विश्वव्यापी, भयानक दावानल में शीतल फुहारों के रूप में बरस उठे और अशांत विश्व शांत हो जाए।’
परन्तु इस सर्वव्यापी अशांति का मूल कारण क्या है? गहन एवं जीवन के दर्दनाक अनुभव हमें भली भांति यह समझा चुके हैं कि अशांति का मूल कारण बिखराव, टूटन एवं विषमता है। अतः यदि हम अपनी वसुधा पर शांति एवं सौहार्द के स्वप्न को साकार करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम हमें विश्व में एकत्व स्थापित करना होगा। बिखरी हुई मानव मणियों को एक सार्वभौमिक सूत्र में पिरोना होगा। एकता स्थापन के प्रयासों की श्रृंखला में एक कड़ी रही है- भौतिक व ज़मीनी स्तर पर, राष्ट्रों की सीमाओं को समाप्त कर देना। विश्व को एक ही राष्ट्र के रूप में परिणत कर देना। इस प्रयास के समर्थक लोगों की मनोवैज्ञानिक विचारधारा यह रही है कि यदि संपूर्ण विश्व एक ही राष्ट्र होगा तो फिर कौन किससे लड़ेगा? तब शांति स्वतः ही सुनिश्चित हो जाएगी। परन्तु यदि हम इतिहास की ओर दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि अनेकों बार विश्व के पृथक भागों को एकत्र करने की चेष्टा की गई। विध्वंसक युद्धों द्वारा ज़मीन पर खिंची रेखाओं को तो मिटा दिया गया लेकिन विस्तृत सीमाओं में जबरन एकत्र किए गए निवासी!! उनका क्‍या हुआ? उनके अन्तर्मन में खिंची विद्वेष, वैमनस्य की लकीरें, परतंत्रता का भाव अधिकाधिक गहराता चला गया।
इन कटु अनुभवों के उपरान्त यह तो स्पष्ट हो गया कि कम से कम ऐसे पार्थिव, यानी ज़मीनी स्तर पर किया गया विश्व एकीकरण कदापि विश्व शांति की स्थापना नहीं कर सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त अब प्रयास आरंभ हुए विश्व को संवैधानिक स्तर पर एक करने के। विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने मिलकर ‘संयुक्त राष्ट्र‌ संघ’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संगठन का आधार अथवा मूलमंत्र है कि सम्पूर्ण विश्व एक ‘Global Family’ (संयुक्त परिवार) है। परन्तु यह मंत्र भी संवैधानिक पत्रों में मात्र औपचारिक रूप से ही दर्ज़ हुआ नज़र आता है। संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलनों में सर्व सम्मति से लिए गए निर्णयों को ताक पर रखकर मनमानी करते हुए सदस्य राष्ट्र; सीमाओं पर गूँजते तोपों और मिसाइलों के कर्णभेदी विस्फोट- निःसंकोच इसका उपहास करते दिखाई देते हैं। नित नए रूप, नए क्षेत्र में फलती-फूलती आतंकवाद की विष-बेल; तनाव की कलम से बनता-बिगड़ता विश्व का विकृत स्वरूप- सभी इस अंतर्राष्ट्रीय नैतिक मुहावरे के खोखलेपन का साक्षात्‌ प्रमाण हैं।
विश्व-एकीकरण के स्वप्न को यथार्थभाव में स्थापित करने के लिए सामाजिक तथा आर्थिक स्तर पर भी प्रयत्न किए गए। इस प्रयास के प्रणेता थे कार्लमार्क्स। इन्होंने मानव समाज को ‘कम्यूनिज़्म’ अर्थात्‌ साम्यवाद का सिद्धान्त दिया। साम्यवाद का आधार भूत सूत्र है कि- ‘क्षमता अनुसार कार्य एवं आवश्यकतानुसार आय।’ साम्यवादी राष्ट्रों के नागरिकों का जीवन मात्र शासन के आदेशों व निर्देशों के दायरों में सिमट कर रह गया। निर्धारित आय के कारण उनके भीतर अपनी प्रतिभा, प्रवीणता को विकसित करने का जज़्बा ही जाता रहा। उनकी अंतर्निहित सृजनात्मकता एवं रचनात्मकता के संवर्धित होने के सभी द्वार बंद कर दिए गए। मूक-बधिर बनाने वाले ऐसे शासन के विरुद्ध नागरिकों की दमित भावनाओं ने अंततः विद्रोह कर दिया। अतः साम्यवाद में भी समता का अभाव रहा।
एकता प्रयासों के सूत्र में मानव को धर्म के धरातल पर एकत्व में पिरोने की चेष्टा भी की गई। इस कार्य का बीड़ा उठाने वाली थीं अनेकों धार्मिक संस्थाएँ। इनका मानना था कि ईश्वर के संबंध में हमारी विचारधाराओं, आंतरिक संवेदनाओं व आस्थाओं को समतल धरातल पर लाकर खड़ा करना चाहिए। इससे स्वतः ही हमारे अंतस् में अपने सहमानवों के प्रति भ्रातृत्व और मैत्री के भाव जागृत हो जाएँगे। इन विचारों को मूर्तरूप देने वाले ही स्वयमेव धर्म के वास्तविक व सार्वभौमिक स्वरूप से अनभिज्ञ थे। इसलिए उन्होंने अपनी मान्यताओं पर आधारित धर्म को सर्वोत्कृष्ट तथा अन्य धर्मों को निकृष्ट सिद्ध करने का प्रयत्न किया। इन तथाकथित धार्मिक संस्थाओं ने भिन्न-भिन्न देशों में जाकर, लोगों का धर्म परिवर्तन करके स्वधर्म में सम्मिलित करने का जबरन प्रयास किया। परन्तु एकत्व स्थापित करने के इन आधारहीन प्रयासों की कलई तभी खुल जाती है, जब एक ही धर्म को धारण किए हुए दो राष्ट्र समरांगण में परस्पर विरोधी शिविरों में खड़े नज़र आते हैं। धार्मिक विचारधाराएँ तो एक हो गईं पर अहं की दीवारें ध्वस्त नहीं हो पाई। स्पष्टतः उपरोक्त सभी सूत्र शांति को समग्रता से स्थापित करने में लगभग विफल ही सिद्ध हुए हैं। इन सभी सफल या अर्धसफल प्रयासों के बीच ‘विश्व शांति’ का लक्ष्य, आज भी इस आधुनिक युग को व्यंगपूर्ण चुनौती देता सा प्रतीत होता है। अभाव कहाँ रह गया? इस विश्वव्यापी समस्या का समाधान क्या है?
इस समस्या का अभेद्य निराकरण हमें मिलता है महापुरुषों द्वारा रचित शास्त्र ग्रंथों एवं सनातन अपौरुषेय वेदों में। शास्त्रानुसार एकीकरण का आधार बाह्य अथवा पार्थिव कदापि नहीं हो सकता। रंग-रूप, भाषा-भूषा, विचारों की भिन्नता के साये तले अभिन्नता की मात्र एक ही लौ विद्यमान है- ‘आत्मा’। यही वह सार्वभौमिक चेतना है जो सर्वभूत प्राणियों में समान रूप से प्रतिष्ठित है। जो इस सार्वभौमिक ब्रह्म सूत्र (आत्मा) का साक्षात्कार कर लेता है, उसी के लिए यह सम्पूर्ण जगत एक दिव्य माला और प्रत्येक जीव, माला में गूंथी एक मणि के स्वरूप हो जाता है।
अतः एकीकरण को बाहर से लाकर स्थापित व आरोपित करने की आवश्यकता नहीं। ज़रूरत है तो कण-कण में आदिकाल से समाविष्ट उस एकत्व का अनुभव करने की। तभी उपनिषद्‌ का आह्वान है ‘उठो, जागो, श्रेष्ठ महापुरुषों के सान्निध्य में पहुँचकर (उस एक) पारबह्म को जान (साक्षात्‌ दर्शन कर) लो|’ दर्शनोपरान्त- ‘पूर्ण एकत्व का अनुभव और एकत्व से विश्व शांति’- यही वैदिक सूत्र वर्तमान अधीर विश्व के रूपांतरण व एकीकरण का एकमात्र सटीक समाधान है।
और आज ऐसा ही आह्वान भारतभूमि से पुनः स्पंदित हुआ है। इसके दिव्य अजेय स्रोत हैं – दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक व संचालक गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी। इनके पावन सान्निध्य एवं अलौकिक मार्गदर्शन ने सहस्रों निष्काम आत्मज्ञानियों का निर्माण किया है जो विश्व के कोने-कोने में पहुँच, इस ब्रह्मज्ञान का प्रसार करने में निरंतर संलग्न हैं। विश्व को शांतिमय बनाने हेतु दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान का संकल्पित एक ही नारा है- विश्व में शांति कैसे आएगी? – ब्रह्मज्ञान से!

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