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वीडियो गेम वास्तविक दुनिया से दूर हो रहे टीनेजर्स

विजय न्यूज़ ब्यूरो
एक वक्त था जब बच्चे और टीनेजर्स खाली समय में वीडियो गेम का आनंद लिया करते थे, लेकिन आज के दौर में वीडियो गेम का एक नया ही स्तर देखने को मिल रहा है. ऑनलाइन और मल्टी प्लेयर ऑप्शन उपलब्ध होने के कारण यह टीनेजर्स के बीच इतना लोकप्रिय हो गया है कि यह उन्हें वास्तविक दुनिया से पूरी तरह से दूर कर रहा है.
बच्चों में वीडियो गेम की ऐसी लत देखने को मिल रही है, जिसके कारण वह पूरी तरह से गेमिंग की दुनिया में खो चुके हैं, एक ऐसी दुनिया जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है. इन बच्चों के आसपास क्या हो रहा है, किसी बात की कोई खबर नहीं रहती है. नई दिल्ली स्थित तुलसी हेल्थ केयर के मनोचिकित्सक डा. गौरव गुप्ता का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि वीडियो गेम की लत ही युवास्था में डिप्रेशन और गुस्सेले व्यवहार का मूल कारण बनती है. वीडियो गेम के इस दौर में बच्चे और टीनेजर्स आउटडोर गेम्स को पूरी तरह से भूलते जा रहे हैं.
टीनेज एक ऐसी उम्र है जिसमें बच्चों के दिमाग का विकास होता है. इस उम्र में उनके व्यवहार में सबसे ज्यादा परिवर्तन नजर आते हैं. इन बदलावों के कारण कोई भी नई चीज उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करती है. यही कारण है कि इस उम्र में उन्हें अच्छी चीजों की आदत भी पड़ सकती है और बुरी चीजों की लत भी हो सकती है. अधूरे ज्ञान की वजह से उनमें चिंता और डिप्रेशन के शुरुआती लक्षण नजर आ सकते हैं. वीडियो गेम की वर्चुअल दुनिया में अधिक वक्त बिताने से बच्चों को अकेलापन महसूस होने लगता है और वे खोए-खोए से रहने लगते हैं. यहां तक कि व्यस्त जीवनशैली के कारण कई बार माता-पिता भी अपने बच्चों के साथ वक्त नहीं बिता पाते हैं, जिससे उन्हें प्यार, स्नेह और ध्यान की चाह होती है. इस चाह में वे इस तरह की चीजों से आकर्षित हो जाते हैं.
मल्टीप्लेयर गेमिंग ने वीडियो गेम के स्तर को इस कदर बदल दिया है कि बच्चे खुद को इससे दूर रख ही नहीं पाते हैं. यह आभासी दुनिया बिना किसी रोक-टोक के उन्हें नई चीजों का अनुभव करने का मौका देती है. यह लत और वास्तविक दुनिया से दूरी के कारण बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाता है और वे खुद को सामाजिक जीवन से दूर रखने लगते हैं.
स्कूल और माता-पिता बच्चों को इन खेलों की लत से दूर रखने में एक अहम भूमिका निभाते हैं. यदि बच्चे किसी कारण से खोए से रहते हैं या अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं तो माता-पिता और स्कूल को तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए, जिससे वे बच्चों को वास्तविक दुनिया में शामिल कर उन्हें सामाजिक रूप से सक्रिय रख सकें. माता-पिता और स्कूल को उन बच्चों को अलग-अलग गतिविधियों में शामिल करना चाहिए, जिसमें वे हर पल कुछ नया सीख सकें और इस प्रकार उन्हें वर्चुअल दुनिया से दूर भी रखा जा सकता है.
डा. गौरव गुप्ता का कहना है कि माता-पिता को अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहिए और उनके हर रुटीन पर नजर रखनी चाहिए. वीडियो गेम की लत के कारण कई बार बच्चे रात-रात भर सोते नहीं हैं, जिससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है और वे अधिक थकान महसूस करते हैं. इस प्रकार की दिनचर्या से धीरी-धीरे बच्चों को अकेलेपन की आदत पडने लगती है , जिसके कारण वे अपने माता-पिता से हर बात छुपाने लगते हैं. माता-पिता जितना ज्यादा वक्त अपने बच्चों के साथ बिताएंगे, उनके लिए इस तरह के गेम्स, ड्रग्स और गलत गतिविधियों में शामिल होने की संभावनाए भी उतनी ही कम होती हैं.
माता-पिता होने के नाते यह समझना जरूरी है कि इस समस्या का मूल कारण वीडियो गेम नहीं है, बल्कि असल समस्या यह है कि ये गेम बच्चों के दिमाग को किस प्रकार बदल रहे हैं. इन गेम्स पर कम ध्यान देकर आउटडोर गतिविधियों (खेल, योगा, एक्सरसाइज आदि) पर अधिक ध्यान दिया जाए तो बच्चों को अकेलापन और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से दूर रखा जा सकता है.

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