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व्यंग्य : आओ , पिट्ठू बने तोतों की कुछ बातें कर लें

पुलिस-पुलिस कहकर तस्करों को अलर्ट करने वाला तोता तो आखिरकार पकड़ में आ ही गया ! कब तक बकरे की माँ खैर मनाती, एक न एक दिन तो पकड़ में आना ही था।मालिक के गलत कामों में आखिर कब तक सहभागी बने रहता।लेकिन फिर भी तोता है तो आज्ञाकारी, वह केवल अपने मालिक की ही सुनता है।पुलिस ने लाख कोशिश कर ली,किन्तु वह टस से मस नहीं हो रहा है।या तो वह चुपचाप रहता है या फिर चिल्लाने लगता है।पशु-पक्षी के डॉक्टर ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि तोता जाँच में सहयोग नहीं कर रहा है।
खैर, यह मामला तो ब्राजील का है जहाँ तस्करों की मदद करता था आज्ञाकारी तोता लेकिन संभव है कि आपको भी लगा हो कि नहीं कि यह घटना तो हमारे सामने बरसों से घटती चली आयी है।हमारे देश में भी तो आज्ञाकारी तोते पहले भी थे ,आज भी हैं।फर्क इतना ही है कि हमारे यहाँ तोता वर्तमान मालिक की आज्ञाओं का ही पालन करता है।यह बात मैं अपनी ओर से नहीं कह रहा हूँ बल्कि आये दिन इस तरह की बातें लोग कहते-सुनते आए हैं और बेचारा तोता अपनी वफादारी के बाद भी शर्मसार है।
उसका मानना हैं कि जिसका नमक खाओ, उसके वफादार बने रहो,उसकी हरेक आज्ञा का आँखे मूंदकर पालन करो,उसके पिट्ठू बने रहो।जैसा वे कहें,तोते की मानिंद रट लगाते रहो।लेकिन कुछ तोते पिंजरे में कैद होकर नहीं रहना चाहते, भले ही पिंजरा सोने का क्यों न हो।वे पंछी बनकर मस्त गगन में उड़ते रहते हैं।जबकि कुछ तोतों को खुली हवा खुशगवार नहीं लगती और वे सोने के पिंजरे और दाने-पानी की व्यवस्था में मस्त होकर मालिक के स्वर में स्वर मिला बैठते हैं।मालिक जब बदल जाते हैं तो पुराने मालिक भी चाहते हैं कि तोता पूर्व की ही भांति उनके स्वर में स्वर मिलाता रहे लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है! उसे तो यही लगता है कि जहाँ से दाना-पानी वही उसका मालिक भी।वैसे तोता इस बात को भूल जाता है कि उसका असल मालिक तो कोई और है।सोने के पिंजरे की चमक-दमक की पट्टी उसकी आँखों पर चढ़ बैठती है और शायद इसीलिए वह अपने पालक को ही अपना मालिक समझ आज्ञापालन शुरु कर देता है।वह पूरी तरह से अपने तथाकथित मालिक का पिट्ठू बन जाता है।पिट्ठू यानी पीछे-पीछे चलने वाला, अनुगामी, अनुयायी, पिछलग्गू, छिपकर सहायता करने वाला, सहायक, समर्थक, खुशामदी, कल्पित खेल का साथी,किसी पक्ष के खिलाड़ी का साथी।लेकिन तोते का पिट्ठू बन जाना किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है।उसे अपने मूल मालिक का पिट्ठू होना चाहिए वरना तो आये दिन कोई भी ऐरा-गेरा यह कहने को स्वतंत्र है कि ऐ पिट्ठू, सुन ले रे!

डॉ प्रदीप उपाध्याय, 16, अम्बिका भवन, बाबूजी की कोठी, उपाध्याय नगर, मेंढकी रोड़, देवास, म.प्र.

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