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समग्र ग्रामीण विकास और चुनोतियाँ

विभिन्न सरकारी विभाग अपने-अपने स्तर पर ग्रामीण विकास के विभिन्न पक्षों पर कार्यरत हैं। ये कार्य प्राय: लक्ष्य-निर्धारित होते हैं और यथासंभव प्रयास होते हैं कि घोषित लक्ष्य की प्राप्ति सरकारी फाइल में सफलता के रूप में दर्ज होती रहे। पर मौजूदा व्यवस्था में इस बारे में अधिक चर्चा नहीं है कि क्या कार्यक्रमों की दिशा सही है और क्या विभिन्न कार्यक्रम आपसी समन्वय में एक-दूसरे के पूरक हैं, एक-दूसरे के साथ मिल कर ग्रामीण विकास को समग्र रूप देते हैं।
अगर विकास का पैमाना भागती-दौड़ती जिंदगी हो, बहुमंजिले मकान हों और अच्छी-खासी चौड़ी सड़कों पर दौड़ते वाहन हों तो इस तरह बड़े से लेकर छोटे, मंझोले शहरों ने खूब तरक्की की है। पर यह विकास का एक अधूरा चेहरा है। यह हम सबका सपना नहीं हो सकता। आज विकास के जो सपने देखे जा रहे हैं, उनमें गांव कितना है, यह देखना जरूरी है। गांव क्यों बदहाल हो रहे हैं, वहां रोजगार की संभावनाएं पैदा क्यों नहीं हो पा रही हैं, लोग पारंपरिक रोजगार और खेती से विमुख क्यों हो रहे हैं, इन सबका भी आकलन होना चाहिए।

जब भी विकास की बात होती है तो गांव और शहर दोनों के विकास के दावे किए जाते हैं। पर हकीकत यह है कि विकास की दौड़ में गांव हमेशा पीछे ही रह जाते हैं और शहरों में सुविधाओं का जाल बिछ जाता है। गांव अपनी धीमी गति के साथ ऊंघ रहे होते हैं। चारों तरफ सन्नाटा-सा पसरा रहता है। शहरों में विकास की गतिविधियां चलती हैं, तो गांव धीरे-धीरे अपना पारंपरिक स्वरूप खोने लगते हैं।
ग्रामीण भारत में लगभग 83.3 करोड़ लोग रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के रूप में कृषि को छोड़ कर कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं है। कुटीर उद्योग के अभाव में लोगों की निर्भरता सिर्फ कृषि पर है, जिसके कारण कृषि क्षेत्र में छद्म रोजगार की स्थिति लगातार बनी हुई है।
रोजगार के अभाव में युवा दिग्भ्रमित होकर गलत रास्ता अख्तियार करते हैं या फिर कर्ज और भुखमरी की वजह से आत्महत्या करते हैं।
गांवों से पारंपरिक पेशे छोड़ कर लोग शहरों में आधुनिक तकनीक के साथ जुड़ने को ललक उठते हैं। गांवों में आज भी सघन अंधेरा है, जिससे उसे निकाल पाना बिजली के खंभों के बूते का तो बिल्कुल नहीं है। आज कथा-कहानी ही नहीं, फिल्मों में भी ग्रामीण जीवन के दृश्य पूरी तरह अनुपस्थित हो चुके हैं। नई पीढ़ी का गांव के प्रति आकर्षण खत्म हो चुका है। चमक-दमक और रंगीनी ही आधुनिकता और प्रगति का पर्याय बन चुकी है। ऐसे में गांव की तस्वीर एकदम बदरंग और दयनीय दिखाई पड़ती है । गांव अब सिर्फ खेतों के मध्य कुछ कच्चे और ज्यादा पक्के घरों की आबादी भर रह गए हैं जहां जीवन-रस पूरी तरह सूख-निचुड़ चुका है।
कुछ लोगों का तर्क होता है कि क्या होगा अगर कुछ गांव पलायन हो जाये या नष्ट हो जाये तो। लेकिन सिर्फ देहाती बस्ती का नष्ट हो जाना नहीं होता , बल्कि उस गांव का रहन-सहन, रीति-रिवाज, वहां का लोक जीवन, कथा-किस्से, खलिहान, अखाड़े, खान-पान, उनके लोक देवताओं के पूजा-थान, गोधूलि सब कुछ नष्ट हो जाता है, जिसकी भरपाई किसी तरह संभव नहीं

अतः अब हमें अपने विकास की संरचना में बुनियादी परिवर्तन करने की जरूरत महसूस होनी चाहिए जिसमें गांव के आसपास विकास के द्वीप भी जगमग हों। लोग गांवों की ओर चलें। रोजी-रोटी के आकर्षण में शहर की ओर भागना लोगों की मजबूरी होती है। पर जब गांव अपनी सामाजिक जिंदगी और स्वास्थ्य में बेहतर जीवन देंगे और उनके आसपास रोजगार होगा, तो कोई भी गांव से पलायन नहीं करेगा। इसलिए सबसे प्रमुख सहमति का विषय यह होना चाहिए कि राष्ट्रीय विकास के केंद्र में ग्रामीण विकास होगा, गांवों को अति महत्त्वपूर्ण भूमिका मिलेगी। विकास का अर्थ यह नहीं होगा कि अनिवार्य तौर पर गांव को पीछे हटा कर शहर ही आगे बढ़ेंगे, अपितु गांवों व खेती-किसानी के विकास को पूरे विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण व बुनियादी भूमिका दी जाएगी। जहां हमारा ग्रामीण विकास पूरी तरह हमारी जरूरतों के अनुकूल होना चाहिए । इस पर व्यापक सहमति है कि निर्धनता, विषमता व अन्याय दूर करना या न्यूनतम करना दुनिया व पूरे देश का उद्देश्य होना चाहिए, अत: जरूरी है कि ग्रामीण विकास भी इस व्यापक सहमति के उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए। इसी तरह की व्यापक सहमति इस बारे में है कि विकास टिकाऊ व सतत होना चाहिए, जो पर्यावरण रक्षा पर समुचित ध्यान देने से ही संभव है।
दीर्घकालीन दृष्टि से देखें तो गांवों में जल-संरक्षण और हरियाली का बना रहना, यह दो सबसे बड़ी जरूरतें हैं। पानी तो विकास का ही नहीं, अस्तित्व का आधार है। सभी प्राकृतिक जल-स्रोतों की रक्षा होनी चाहिए। भू-जल का उपयोग सुरक्षित सीमा तक ही होना चाहिए। सभी मनुष्यों व पशु-पक्षियों के लिए पर्याप्त जल होना चाहिए।
खेती की तकनीक ऐसी होनी चाहिए जो पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल हो, टिकाऊ हो, बहुत सस्ती हो, गांव के स्थानीय संसाधनों पर आधारित हो और बाहरी निर्भरता को न्यूनतम करे। पशुपालन को बढ़ावा दिया जाए। सबसे निर्धन गांववासियों को ग्रामीण विकास के प्रयासों में उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए और उनकी टिकाऊ आजीविका सुनिश्चित करने, संसाधन आधार बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।

ग्रामीण विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे जरूरी है पंचायतों को मजबूत करना। इसके लिए पंचायतों को अधिक संसाधन मिलने चाहिए। यह ठीक है कि महिला सशक्तिकरण के मामले में भारत की स्थिति कई मायनों में बेहद अनूठी है। यहां ग्राम पंचायतों में एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। विधानसभाओं और संसद में भी यही व्यवस्था करने की तैयारी है। फिर भी यह राजनीतिक सशक्तिकरण सामान्य तौर पर ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में पर्याप्त बदलाव नहीं ला पाया है । गांवों में अक्सर प्रचलित सरपंच पति की अवधारणा को भी बदलने की महती आवश्यकता है । देश में जहां एक तरफ महिला सशक्तिकरण की बातें होती है वहीं सिक्के का दूसरा पहलू विडम्बना को दर्शाता है कि जहां सरपंच बनने के बाद महिलाओं को अपने वित्तीय व राजनीतिक अधिकारों की जानकारी नहीं होती, जिसके कारण उनके परिवार के पुरुष अनावश्यक हस्तक्षेप करके, उनकी शक्तियों का उपभोग करते हैं। चूंकि महिलाओं का सत्तासीन होना आज भी पुरुष सत्तात्मक समाज को सहज स्वीकार नहीं है, यही कारण है कि येन-केन-प्रकारेण उनके कार्यों में हस्तक्षेप करने की चेष्टा की जाती है। पर ज्यों-ज्यों महिला सरपंचों को अपने अधिकारों का ज्ञान हो रहा है वे अवांछित हस्तक्षेपों का विरोध कर रही हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं कि उनके कार्यों को देश में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। उदाहरण के तौर पर सन 2000 में ही मेरी नानी पंचायत सदस्य बनी थी जहां से गांव में महिलाओं की भागीदारी की शुरुआत हुई थी।

आज महिलाओं की भागीदारी के बिना ग्रामीण विकास की कल्पना अधूरी है। महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में आगे आने के भरपूर अवसर देने की जरूरत है और उन्हें इसके लिए पूर्ण सुरक्षा की स्थिति मुहैया करानी होगी। महिला-विरोधी हिंसा और यौन हिंसा को समाप्त करने या न्यूनतम करने को उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए। महिला किसानों को किसान के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। पति-पत्नी का मिल कर भूमि स्वामित्व होना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि अगर महिला किसानों को कृषि कार्य में समान अधिकार हासिल होगा, तो उत्पादन में चालीस फीसद तक की बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही, वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनेंगी और समाज को भी आगे ले जा सकेंगी।

इसलिए आज आवश्यकता इस बात है कि तकनीकी संजाल के साथ गांव-शहर की दूरी को खत्म करते हुए विकास को ग्रामीण संरचना में लेकर चलने की जरूरत है।
हालांकि आज देश में कई गांव आत्मनिर्भर होते जा रहे है जहां लोगों के द्वारा ही सड़क से लेकर प्याऊ व स्कूल भवनों का निर्माण करवाया जाता है । मिसाल के तौर पर राजस्थान में नागौर का जालसू गांव । यहां हर घर में फौजी है तथा यह संभवत: देश का पहला रेलवे स्टेशन है, जहां कोई रेलवे अधिकारी या कर्मचारी नहीं है। फिर भी यहां 10 से ज्यादा ट्रेनें रुकती हैं। ग्रामीण टिकट काटते हैं और चंदा जुटाकर हर माह करीब 1500 टिकट खरीदते हैं ताकि ट्रेन रुक सके। इसके अलावा भी अन्य कई उदाहरण है जो अन्य गांवों को विकास की नई राह दिखाते हुए नजर आते है।

गांव, हमारे सामाजिक और नैतिक जीवन की धुरी हैं। गांव के किनारे से सभ्यता और संस्कृति का पाठ हम सदियों से पढ़ते आ रहे हैं। बस विचार की दिशा को मोड़ने की जरूरत है। गांव की ओर रोजगार हो, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। कृषि आधारित सपने देखने की जरूरत है। जो पीढ़ी आ रही है उसे कैसे अपने सामाजिक केंद्र गांव की ओर मोड़ा जाए, उन सुविधाओं पर ध्यान देने की जरूरत है।
आज शिक्षा की गुणवत्ता ग्रामीण विकास की महत्त्वपूर्ण धुरी है। शिक्षा में नैतिक शिक्षा का समावेश करने, अच्छी शिक्षा सब तक पहुंचाने व सरकारी स्कूलों को बहुत बेहतर करने के प्रयासों को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए व इसमें सब का सहयोग प्राप्त होना चाहिए। इसके अलावा पंचायत स्तर पर ही सभी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज की क्षमता वाला स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए। बीमारियों व स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम के प्रयासों को इसे विशेष महत्त्व देना चाहिए। गर्भवती महिलाओं की जांच-सुरक्षा व बच्चों के सुरक्षित जन्म की उत्तम व्यवस्था इन स्वास्थ्य केंद्रों में रहनी चाहिए। इनके संबंध बड़े अस्पतालों में होने चाहिए व इनके पास एंबुलेंस सुविधा भी होनी चाहिए। शाश्वत ऊर्जा स्रोतों की प्रगति का पूर्ण प्रयास होना चाहिए, यदि इस तरह की समग्र ग्रामीण सोच पर व्यापक सहमति प्राप्त कर इसे पूर्ण प्रोत्साहन मिले तो मात्र एक दशक में ही हमारे गांवों की सूरत बदल सकती है। जिसके लिए आज विकास की संरचना पर नए सिरे से विचार होना चाहिए। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय आदि सभी पक्षों का एक-दूसरे से समन्वय रखने वाला, एक-दूसरे का पूरक समावेश इस समग्र कार्यक्रम में मिलना चाहिए।
साथ ही उद्योग-धंधे केवल महानगरों तक सीमित न हों। उन्हें दूर-दराज के इलाकों में स्थापित किया जाए, ताकि उन इलाकों तक अच्छी सड़कें पहुंच सकें, शिक्षा की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो सके, स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए दूर-दूर शहरों में न भागना पड़े ।

रीतेन्द्र कंवर शेखावत 

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