National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

साइक्लोनिक हिंदू : विवेकानंद

शिकांगों स्पीच की वर्षगांठ पर

वैश्विक जगत में शायद ही कोई ऐसा शख्स हो, जिसने स्वामी विवेकानंद का नाम न सुना हो। देश के सबसे सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरुओं में शामिल स्वामी विवेकानंद जिन्हें भारत के नेपोलियन बोनापार्ट के रूप मे भी जानते हैं। 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता के एक कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र नाथदत्त ) के पिता कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील थे। कुशाग्रबुद्धि विवेकानंद के बारे में कहा जाता है कि दादा, पिता और मां के धार्मिक, तर्कसंगत और प्रगतिशील स्वभाव का असर उन पर बचपन से ही था, और वे विलक्षण याददाश्त के धनी दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य आदि विषयों में खासी रुचि रखते थे, तथा उन्होंने वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त हिन्दू शास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया था। वे भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे, और नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम व खेलों में भी भाग लिया करते थे।
बचपन से ही आध्यात्मिकता की ओर झुकाव रखने वाले स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से बेहद प्रभावित थे, और उन्होंने उन्हीं से सभी जीवों को परमात्मा का अवतार मानते हुए सभी की सेवा करना सीखा और उसी को परमात्मा की सेवा करना माना। गुरु के देहांत के बाद स्वामी विवेकानंद ने भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में कई यात्राएं कीं, और फिर 1893 में विश्व धर्म संसद में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए ऐतिहासिक भाषण में समूचे मानव समाज को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की शिक्षा दी।
25 वर्ष की आयु में गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने वाले स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे देश की यात्रा भी की थी। ऐतिहासिक शिकागो भाषण के बाद वे तीन वर्ष तक अमेरिका में ही रहे थे, और उनकी वक्तव्य-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए स्थानीय मीडिया ने उन्हें ‘साइक्लोनिक हिन्दू’ का नाम दिया था। मात्र 39 वर्ष की आयु में ही संसार को त्याग गए स्वामी विवेकानंद का मानना था कि अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना सारी दुनिया अनाथ होकर रह जाएगी, सो, इसी विचार के प्रसार के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं अमेरिका में भी स्थापित कीं, जहां बहुत-से अमेरिकी नागरिक भी उनके शिष्य बने। आज विवेकानंद भारत की ही नहीं संपूर्ण विश्व जगत की धरोहर है।
आज भी 11 सितंबर 1893 का शिकागो भाषण,आज के भौतिक परिवेश और अतिवादिता के युग में प्रासंगिकता रखता है
ये वो ही एतिहासिक भाषण है जिसकी जडों के पोषण मे खेतडी महाराज अजित सिंह जी का अभिन्न योगदान है, जिन्होंने विवेकानंद को अमेरिका तक जानें के लिए हरसंभव मदद की। आज भी स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की खास बातें ही इनको साइक्लोनिक विवेकानंद बनातीं है। यथा_
विवेकानंद ने अपने भाषण में कहा कि अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा ह्रदय भावविभोर हो गया है। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं।सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। इस मंच पर बोलने वाले उन वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह माना कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है। आज मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों के सत को स्वीकार करते हैं। गर्व है कि मैं भारत भूमि की पावन धरा से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। गर्व है कि हमने अपने दिल में इस्राइल की वो पवित्र यादें भी संजोई हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है। मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं। ”जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है। ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं। आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक है आज का सम्मेलन ,और अपने आप में गीता में कहे गए उपदेश इसका प्रमाण है: ”जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं। ” हम सभी अलग-अलग मत मतांतर के बावजूद भी एक ही परम सत्य के लिए एकत्रित हुए हैं। सांप्रदायिक कट्टरता के खूनी वंशजों की हठधर्मिता ने खूबसूरत धरा को जकड़ लिया है, हिंसा से भर दिया है, आज धरती खून से लाल हो चुकी है। विराट सभ्यताएं भी तबाह हो गई और आज इसका कारण हमारी अतिव्यापकता की भावना है। विवेकानंद ने शिकागो भाषण मे सभ्यता के विकास में सांप्रदायिक हिंसा को बाधक बताया और आज भी माबलिंचिंग जैसै ख़ौफ़नाक राक्षसके रूप में विधमान है अगर ये रोग नहीं होते तो मानव समाज ज्यादा सभ्य होता। विवेकानंद ने आशा व्यक्त की कि शिकागो का धर्म सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा। चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से।
और बात सही भी है कि मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा जाए तो समाज मे विद्वेष ही न हो। मूल्य परिवेश की शिक्षा भारत की बुनियादी शिक्षा है। अगर विश्व को संरचनात्मक मानवीय मूल्यों का विकास करना है तो भारतीय संस्कृति की परिवेश पूर्ण आधारभूत मूल्यपरक शिक्षा का संस्थापन करना चाहिए।
आज भारत के आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदांत दर्शन को सारी दुनिया के समकक्ष पहुचाने वाले विवेकानंद के देश भारत में पुनः शिकागो सम्मेलन के स्मरण की आवश्यकता है। आज पाश्चात्य सभ्यता की अतिवादिता ने मूल्य परक शिक्षा की जड़ें खौखली कर दी है। आज हम स्वतंत्र है पर जानी अनजानी बेड़ियों के साथ। आज आवश्यकता है कि हम विवेकानंद की शिक्षा को साकार करे।

युवाओं के नाम विवेकानंद का संदेश
आज के परिप्रेक्ष्य में युवाओं मे घोर निराशा आ गई है, सहनशीलता, धैर्य, कार्य के लिए जज्बा, दया प्रेम ये भावनाएँ जाने कहाँ विलुप्त हो गई और युवाओं मे नैराश्य भावना ने जड़ जमा ली। ऐसे मे विवेकानंद की शिक्षा ही एक नई राह का निर्माण करती है। विवेकानंद जी कहते हैं कि आज युवा यह जान ले, और समझ ले कि हर बात के पीछे एक मतलब होता है.. *उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये*। सच्चाई के लिए कुछ भी छोड़ देना चाहिए, पर किसी के लिए भी सच्चाई नहीं छोड़ना चाहिए। जब तक तुम खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक तुम भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते। दिलो-दिमाग में भी दिल की सुनो। दूसरों की तुलना में कभी भी स्वयं को कमजोर और छोटा मत समझो। राह मे संकट हो तो ईश्वर पर विश्वास करो क्योंकि ईश्वर सिर्फ उन लोगों की मदद करते हैं जो लोग अपनी मदद खुद करते हैं। निडर होकर कर किया गया काम ही परम आनंद की अनुभूति है। काम करते समय आत्म रूप से समाहित हो जाओऔर बाकी सब भूल जाओ,सफलता अवश्य मिलेगी। सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना,स्वयं पर विश्वास करो और जो तुम्हे कमजोर बनाएं, उन सब को छोड़ दो। दुनिया संघर्ष कीएक व्यायामशाला है जहां खुद को मजबूत करने के लिए खड़े हो जाओ, खुद में हिम्मत लाओ और सारी जिम्मेदारियों के लिए खुद जिम्मेदार बनो तो खुद आप अपने भाग्य के रचयिता बन सकते हो। सत्य ही शाश्वत है, हमारी आत्मा मे अगर सच्चाई का प्रकाश है तो हमे कभी भी कोई नहीं झूका सकता है, इसलिए खुद पर विश्वास करो, आगे बढो, सफलता अवश्य मिलेगी।

डॉ भावना शर्मा
मोदियो की जाव
झुंझुनूं राजस्थान
7877385350
[email protected]

Print Friendly, PDF & Email
Translate »