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हड्डियों की टीबी सहीं समय पर सहीं जांच और उपचार जरूरी

भारत में हर वर्ष टीबी के 20 लाख से ज्यादा केस सामने आते हैंं. लेकिन टीबी यानी क्षयरोग न सिर्फ केवल हमारे फेफड़ों को क्षतिग्रस्त करता है,बल्कि हड्डियों पर भी टीबी का असर होता है. हड्डियों में होने वाली टीबी को बोन टीबी या अस्थि क्षयरोग कहा जाता है. भारत में टीबी के कुल मरीजों में से 5 से 10 प्रतिशत मरीज बोन टीबी से पीडि़त होते हैं. अमूमन रीढ़ की हड्डी, हाथ, कलाइयों और कुहनियों के जोड़ों पर इसका असर ज्यादा होता है.इसकी सही समय पर पहचान और इलाज कराया जाए तो यह रोग पूरी तरह से साध्य है.

कौन अधिक खतरे में?
सामान्य टीबी शुरूआत में फेफड़ों को ही प्रभावित करती है, लेकिन धीरे-धीरे यह रक्त प्रवाह के जरिए शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती हैं. यह रोग हर उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है लेकिन इस बीमारी का खतरा 5 से 15 साल तक के बच्चो और 35 से 50 साल के लोगों को अधिक होता है.

डा.संजय अग्रवालाहेडआर्थोपेडिक्सपी.डी.हिंदुजा नेशनल अस्पताल, मुबंई

इन लक्षणों पर रखें नजर
बुखार, थकान, रात में पसीना आना और बेवजह वजन कम होना आदि बोन टीबी के लक्षण हैं. हड्डी के किसी एक बिदु पर असहनीय दर्द होता है. धीरे-धीरे मरीज का बॉडी पॉश्चर और चलने का तरीका बिगडऩे लगता है. कंधे झुकाकर चलना, आगे की ओर झुक कर चलना और कई बार हड्डियों में सूजन भी आ जाती है. दर्द का प्रकार भी क्षयरोग के सटीक स्थान पर निर्भर करता है. समलन, स्पाइन टीबी के सामले में पीठ के निचले हिस्से में असहनीय दर्द होता है. बोन टीबी से पीडि़त लगभग आधे मरीजों के फेफड़े भी संक्रमित हो जाते हैं. कई बार बोन टीबी से पीडि़त मरीजों को कफ न निकलने से यह पता नहीं चल पाता कि वे टीबी से पीडि़त हैं. इसके शुरूआती लक्षण स्पष्ट होने में वर्षो लग जाते हैं. वजन कम होना, मूवमेंट में परेशानी, बुखार और गंभीर मामलों में हाथ व पैर में कमजोरी के तौर पर इसके लक्षण देखने को मिलते हैं. मरीज को रात में ज्यादा दर्द होता है.

रीढ की हड् डी पर ज्यादा खतरा
रीढ़ की हड् डी के टीबी को अगर सही समय पर न पहचाना जाए तो यह गंभीर लकवे का कारण भी बन सकती है. सही इलाज की कमी के कारण यह रीढ़ की हड्डी में एक से दूसरी हड्डी तक फैल सकता है, जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और इनके बीच कुशन का काम करने वाले डिस्क क्षतिग्रस्त हो जाती है. गंभीर मामलों में रीढ़ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो सकती है और मेरूदंड संकुचित हो सकता है, जो शरीर के निचले हिस्से में लकवे का कारण बन सकता है. रीढ़ की हड्डी बाहर निकलर कूबड़ का भी रूप ले सकती है.

जांच
हड्डी की टीबी की जांच के लिए एक्स-रे, एम आर आई, रेडियो न्यूक्लाइड बोन स्कैन की मदद ली जाती है. अंमित फैसला प्रभावित टिश्यू के माइक्रोबायोलॉजिकल एग जामिनेशन (एएफबी स्टेनिंग, एफ बी कल्चर/सेंसिटिविटी व पीसीआर) के बाद ही लिया जाता है. बच्चों व बूढ़ों में यह ज्यादा होती है. एचआईवी व डाइबिटीज पीडि़तों में भी इसके होने की आंशका अधिक जाती है.

बोन टीबी कैसे पहचानें
बोन टीबी का पता लगाने के लिए एक्स-रे और प्रभावित जोड़ वाले हिस्से से बहते तरह पदार्थ की जांच जरूरी है. ब्लड टेस्ट, ईएसआर टेस्ट, एक्स-रे से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है. रीढ़ और स्केलेटल टीबी के मामले में सीटी स्कैन एमआरआई रिपोर्ट के आधार पर इलाज की प्रक्रिया शुरू की जाती है. बोन टीबी को शुरूआती चरण में अर्थराइटिस समझने की भूल हो जाती है. लेकिन अर्थराइटिस के मरीजों को रात में सोते समय दर्द में राहत महसूस होती है, लेकिन टीबी में मरीजों को सोते समय बैक्टीरिया की गतिविधि बढऩे के कारण अधिक दर्द होता है.

क्या सावधानी बरतें
फेफड़ो के टीबी के विपरीत बोन एवं स्पाइन टीबी के इलाज में संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए थोड़ा ज्यादा वक्त लगता है. सामान्य हड्डी के टीबी के इलाज में एक साल लग जाता है जब कि स्पाइन टीबी के मामाले में लकवे का इलाज और रिकवरी की अवधि भी शामिल है. टीबी के मरीजों के लिए दवाइयों का कोर्स पूरा करना अत्यंत आवश्यक है. इसे बीच में कभी नहीं छोडऩा चाहिए. बोन टीबी में बेड रेस्ट, अच्छा खान-पान, नियमित व्यायाम, दवाइयां और फिजियोथेरैपी सामान्य जिंदगी की ओर लौटने में मददगार होती हैं.

डा.संजय अग्रवाला
हेड
आर्थोपेडिक्स
पी.डी.हिंदुजा नेशनल अस्पताल, मुबंई

प्रस्तुति : उमेश कुमार सिंह

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