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Category: काव्य-संसार

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तुम

 अधूरा हूं तुम बिन पर उम्मीद है तुम एक दिन आओगी कहीं से अचानक आकर मुझसे टकराओगी। जानोगी मेरा हाल और मुझे देख मुस्कुराओगी शायद उस दिन तुम न चाहते

औरत और उसकी बिंदी

औरत अपनी बिंदी चिपका देती है यहां वहां… शौचालय के दरवाजे पर पलंग के सिरहाने पर होटल के शीशे को भी सजा देती है। इसमें कोई खास फलसफा नहीं है

कविता : आओ अबकी होली में

आओ अबकी होली में रंगों की रंगोली में साथ सभी के टोली में। प्यार का रंग बरसातें हैं प्रिये आओ अबकी होली में। फागुन का खूब चढ़े खुमार रस घोल

कविता : हवा हवाई

हवा हवाई वो हँसती-हँसाती खिलखिलाती अपनी अदाओं का जादू बिखेरती सिनेमा के नील नभ में छितराई चाँदनी असंख्य चाहकों को संतप्त कर खो गई हवाओं की सनसनाहट में “हवा हवाई”

हर्षिका गंगवार की 2 कविताएं…

1.प्रेम मुझमें शेष है… प्रेम खूंटी पर टंगा है, किसी माला में पिरोया हुआ जिसके फूल बेजान हो चुके हैं। प्रेम मेरी डायरी में सूख गया है, उस फूल के

लव कुमार ‘प्रणय’ की *गज़ल*

करूँ क्या मैं उसे अब याद करके वो खुश तो है मुझे बरबाद करके सुना है हो गई बहरी अदालत मिलेगा क्या भला फरियाद करके दुआयें लाख देगा कैद पक्षी

मेरे अधूरे शेर …

१.उसका दिल, दिल नहीं, रेत का मैदान निकला। कई बार लिखा नाम अपना,हर बार मिटा देती हैं॥ २.मुझें तैरना नहीं आता और उसे डूबना…। मोहब्बत में इरादो का, मगर मिलना

नववर्ष पर नेता जी के चुनावी घोषणा पत्र

दीजिये वोट सरकार हम बनायेंगे मिल बांट)2 फिफ्टी-फिफ्टी दोनो जन खायेंगे दीजिये वोट सरकार हम बनायेंगे… घर-घर घुम प्रचार हम करेगे उनसे बढ़िया हम काम करेगे युवाओं के खातिर रोजगार

कविता : नव सृजन

नव सृजन ****** उठो जागो अब वहुत हो चुका विश्राम समय खिसक रहा नही रहा अभिराम। सबको जागृत कर दग्ध हृदय में नयी स्फूर्ति उत्साह का निज धाम समरसता सौहार्द

लाल बिहारी लाल के तीन मुक्तक

लाल बिहारी लाल के तीन मुक्तक मुक्तक-१ जनता के जज्बातों से खेलना मेरा काम देखो सीना छप्पन से अच्छा हो परिणाम दुनिया चाहे कुछ भी कहे लाल की चले दुकान

कविता : ‘एक चिड़िया’

‘एक चिड़िया’ ……………………………………….. संस्कारों के ढहते  किलों के नीचे दब गई है /एक चिड़िया/ उसकी चहक वहशी दरिंदों की शिकार/ सुनहले सपनों के सूरज की किरण न देख सकी ना

कविता : वो भी एक बच्ची है

वो भी एक बच्ची है चौराहे पर गुब्बारे को बेचती एक बच्ची धूल में नहाये कुछ सपने खरीदने हैं उसे गाड़ियों की रफ़्तार से अनभिज्ञ खड़ी हो जाती इंतजार में

कविता : गांव की पगडंडी

गांव की पगडंडी गांव की वो धुँधली पगडंडी रह रह कर याद आती है हरे भरे खेतों के बीच भीनी सी खुशबू समेटे बलखाती इतराती मेरे गाँव की पगडंडी जो

बेवफा को बेवफा कौन कहेगा

तेरी दिल्लगी को मुहब्बत कह दूँ तो बेवफा को बेवफा कौन कहेगा गम-ए-जुदाई है इश्क़ में सबसे बड़ी सजा साथ दफना दोगे तो सजा को सजा कौन कहेगा उसे रूठ

कविता : ईद मिलाद-उन-नबी (2 दिसम्बर) पर विशेष

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम… रहमतों की बारिश… मेरे मौला ! रहमतों की बारिश कर हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर जब तक कायनात रौशन

ग़ज़ल : तेरे मिलने से हम को खुशी मिल गई

तेरे मिलने से हम को खुशी मिल गई यूँ लगा इक नई ज़िंदगी मिल गई आप के दम से है ज़िंदगी ज़िंदगी आप क्या मिल ज़िंदगी मिल गई हम तो

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