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Category: काव्य-संसार

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ग़ज़ल : अब अपना दीवान नहीं है

अब अपना दीवान नहीं है पहले जैसी शान नहीं है जिसकी बातें झूठी झूठी उसका कोई मान नहीं है दीन दुखी का कष्ट न समझे वो अच्छा इंसान नहीं है

ग़ज़ल : आपको देख कर मुस्कुराते रहे

आपको देख कर मुस्कुराते रहे गीत ग़ज़लें सभी गुनगुनाते रहे * प्रेम से वास्ता इस कदर हो गया दुश्मनी को भी’ दिल से भुलाते रहे * छोड़ कर हर बुरा

कविता : तेरी बंसी कान्हा

बंसी तेरी मधुर है कान्हा पर जानें छेड़े कौन सी तान? बजती जब जब मुरली प्यारी तन से निकल जात हैं प्राण। गैया तेरी नांचे छमछम मेघ उमड़ घुमड़ कर

कविता : मौन व्रत की जगह नहीं हैं, कवियों के संस्कारों में

क्या लिख दूँ ऐ भारत मैं, तस्वीर तेरी अल्फाजों में भूखे नंगे लोग मिलेगें हर कोने गलियारों में सारी दुनिया मौन रहे पर हमकों तो कहना होगा मौन व्रत की

कविता : मेरे अनुज

लाड़,दुलार, मनुहार और फिर कभी-कभी तकरार के बीच समय ठण्ड की गुनगुनी धूप सा यादों की सुराही में सिमट गया अब तो समझदारी के ताने-बाने बुनते हुए कभी उलझते हैं

कविता : “मैं वही आकाश हूँ”

आह्वान हूँ मैं कर्म का, मैं धर्म का आगाज हूँ हैं अनन्त ऊचाँई जिसकी, मैं वही आकाश हूँ। घोट दी आवाज मेरी, दौर वो कोई ओर था। आजमाने मैं चली

कविता : लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

जंग नहीं हम लगने देगे, भारत की तलवारो को लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को जो देखेगा स्वप्न यहाँ वो अपनी जिम्मेदारी पर मौन बना इल्जाम

“यादों का काफ़िला”

दिन और साल, बितते चले गए, उम्रों के पड़ाव भी, छूटते चले गए, पर तुम्हारी यादों का काफ़िला “दर्शन”, पल भर के लिए भी, रुक नहीं पाया है। हमारी आखरी

कविता : पद्मावती

पद्मावती जौहर से जो अमरत्व पा गई पद्मिनी एक राजपूतानी थी। चलो सुनाते हैं तुमको उनकी कैसी अविरल कहानी थी।। सुंदरता का अभिमान थी चितौड़ की महारानी थी। चतुराई भी

कविता : खून हो गया देखो आज

खून हो गया देखो आज मानव के जीवन का लाख धर्म निभाया मैंने प्रकृति के नियम का धरा काँपी जब पाप बढ़ा कत्ल हुआ हर रिश्तों का नातों की कोई

कविता : प्यार पले

प्यार पले ——— देह जले दिल जले रूह जले गुलमोहर की सिंदूरी छांव तले तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार पले मन की बगिया में फूल खिले रेगिस्तान की रेत में

कविता : “आओ दिवाली मनायें”

“आओ दिवाली मनायें” आओ दिवाली मनायें, किसी अँधेरे घर में करें उजियारा, बुझते दीपक को फिर रोशनायें बांटलें गम किसी दुखिए के, मिल खुशियों के दीप जलायें। करें दूर अंतर्विकारों

कविता : तू जलाना एक दीया

तू जलाना एक दीया प्रिये जलाना तू एक दीया उनके नाम आये हैं जो वतन के काम। कफन बांधकर माथे पे जो न्योछावर कर गए अपने प्राण। प्रिये जलाना तू

**गीतिका** 

**गीतिका** गाया सदा ही’ मैंने ,माँ नाम बस तुम्हारा देती हो आसरा तुम जब भी तुम्हे पुकारा ये जिंदगी समर्पित करता हूँ’ आपको मैं आशीष मिल रहा है ,मुझको सदा

कविता : रावण की आग

जलता रावण पूछ रहा है मानुष नाम के मूर्खों से । क्यों बनाकर खुद जलाते हो तुम लड़ते हो क्यों मुर्दों से।। कहता रावण हस-हस के तुमसे तो मैं लाख

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