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Category: व्यंग्य

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व्यंग्य : बजट का आगमन

महंगाई की मारी और भ्रष्टाचार की बीमारी से त्रस्त जनता को बजट का बेसब्री से इंतजार है। कुपोषण के शिकार और इलाज को लाचार चूसे आम की तरह गुठलियों के

व्यंग्य : राष्ट्रीय त्योहार ..चुनाव जयंती

यद्यपि भारत की पवित्र भूमि पर प्रत्येक वर्ष विभिन्न त्योहार व उत्सव मनाए जाते हैं । जिनमें सामाजिक पर्व , सांस्कृतिक पर्व व राष्ट्रीय पर्व सम्मिलित हैं । जिनका संबंध

व्यंग्य : तीखी मिर्ची का DNA टेस्ट….

अरे ! शर्मा जी ज़रा रुकिए । कैसे हैं , काफी दिनों बाद दिखाई दिए ? चाय तो पीते जाइये । मैंने पीछे से आवाज़ लगाई । हम आवाज लगाते

व्यंग्य : एक प्याज की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू !

भाईसाहब ! वड़ापाव वाले से जैसे ही हमने एक्स्ट्रा प्याज मांगे उसने हमको ऐसे देखा जैसे हमने उसकी एक किडनी मांग ली हो। यहां तक दूसरे दिन उसने अपने ठेले

व्यंग्य : गब्बर का चुनाव जीतना

गब्बर ने कालिया से सवाल करते हुए पूछा – अरे ! कालिया, तनिक बता तो खरा हमारे देश में चुनाव के क्या मायने हैं ? कालिया ने कहा – सरदार

राजनीतिक व्यंग : लोकतंत्र में गधे और हम

सुबह सो कर उठा तो मेरी नज़र अचानक टी टेबल पर पड़े अख़बार के ताजे अंक पर जा टिकी । जिस पर मोटे – मोटे अक्षरों में लिखा था ”

व्यंग्य : नौकरी तू इतनी हसीन क्यों है ?

लोग बड़ा भाव खाते हैं ? माना कि जो लोग भूखे हैं और जिनके पास कुछ भी खाने को नहीं हैं अगर वे भाव खाते हैं तो कोई ताज्जुब की

व्यंग्य : सर्दी का सितम

सर्दी का प्रकोप दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। दिन भी ठंडा है और रात भी ठंडी है। इस ठिठुरन से लोकतंत्र ठिठुर रहा है। नेता ठिठुर रहे है, जनता

व्यंग्य : डेंगू का डंक

भगवान भले ही मरीज बनाएं पर डेंगू का मरीज किसे को ना बनाएं ! डेंगू के इलाज में जिंदगी की सारी जमापूंजी निकल जाती है। यहां तक की देह से

व्यंग्य : पत्रकारिता में आये परिवर्तन

भारत की पत्रकारिता में इन दिनों द्रुतगामी परिवर्तन आये है। आजादी से पहले पत्रकार सच छापते थे, आजादी के बाद खबरें छापने लग गये। और आजकल पत्रकार दोनों से इत्तर

व्यंग्य : माता – पिता बना रहें हैं . …….मिक्स वेज

आज विद्यालय में प्रत्येक विदयार्थियों के माता – पिता को आमंत्रित किया गया था । मैं भी येन-केन प्रकारेण काम-काज निपटा कर विद्यालय जा पहुँची और मुझे देख कर ऐसा

व्यंग्य : सेल्फी विद प्रदूषण

देश की राजधानी में इन दिनों फोग चल रहा है। दिल्ली ठंड के साथ प्रदूषण के कारण भी कांप रही है। प्रदूषण काल बनकर दिल्ली की सड़कों पर नंगा नाच

व्यंग्य: इंटरनेट का जमाना!

आज सोनू ने आकर कहा,”भैया क्या करें! आजकल इंटरनेट का जमाना है मैं इतनी सी बात में भला सन्न रह गया। मुझे एकाएक लगा जैसे सोनू के सामने पहाड़ खड़ा

व्यंग्य : खिचड़ी में हिंग का तड़का ….

एक बार सागर में दो घड़े तैर रहे थे । एक मिट्टी का घड़ा और दूसरा पीतल का था । दोनों तैर तो रहे पर पानी में , पर दोनों

व्यंग्य : वंदेमातरम सुनाएं वो असली नेता होए

भारतीयों को देशभक्ति साल में दो ही दिन याद आती है। एक छब्बीस जनवरी और दूसरी पन्द्रह अगस्त को। बाकि के दिनों में देशभक्ति को गहरी नींद में थपकियां देकर

व्यंग्य : राजनीति के खेल में जनता की चोटी

वैसे तो भारत देश में अनेक खेल समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं लेकिन इसमें “राजनीति का खेल” सबसे अलग हैं। इस खेल को एकाग्रचित होकर पुरे पाँच वर्ष तक

व्यंग्य : विटामिन एम की सबको जरूरत

गरीब, अमीर, दलित, वंचित, शोषित, पीड़ित, अंधा, काना, बैरा, गूंगा, लंगडा, लूला, स्त्रीलिंग, पुल्लिंग, नपुंसकलिंग, बच्चे, बूढे, जवान सबको विटामिन एम की जरूरत है। इस विटामिन के बगैर सारे विटामिनों

व्यंग्य: राजनीति के खेल में जनता की चोटी

वैसे तो भारत देश में अनेक खेल समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं लेकिन इसमें “राजनीति का खेल” सबसे अलग हैं। इस खेल को एकाग्रचित होकर पुरे पाँच वर्ष तक

व्यंग्य : एक झुनझुना कश्मीर के नाम पे …

खुशी की बात है दिनेश्वर शर्मा को मोदी सरकार ने कश्मीर मुद्दे के राजनीतिक हल को तलाशने के लिए अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया । वतन मेरा , लोग मेरे ,

व्यंग्य : नाम में बहुत कुछ रखा है

वैसे तो विलियम शेक्सपीयर ने कहा है – नाम में क्या रखा है। लेकिन अपनी जब आंखे खुली तो जाना कि नाम में बहुत कुछ रखा है। इसलिए भी कि

व्यंग्य : बाबाजी की मखमली रजाई

भारत एक बाबा प्रधान देश हैं। इनमें तरह-तरह के बाबा पाये जाते हैं। यह बाबा अंतर्यामी के साथ-साथ सर्वत्र विद्यमान भी हैं। हर गांव शहरों की नुक्कड़ पर दर्शन हो

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