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Category: देवेन्द्रराज सुथार

Total 76 Posts

बेतुके बोल, खोलते नेताओं की पोल !

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आने लगता है, वैसे-वैसे नेताओं की भाषा का व्याकरण बिगड़ने लग जाता हैं। बेतुके बोल और अर्मादित भाषा का प्रयोग चुनावी रैलियों में कोई नई बात नहीं

व्यंग्य : गब्बर का चुनाव जीतना

गब्बर ने कालिया से सवाल करते हुए पूछा – अरे ! कालिया, तनिक बता तो खरा हमारे देश में चुनाव के क्या मायने हैं ? कालिया ने कहा – सरदार

क्या राहुल गांधी लायेंगे कांग्रेस के अच्छे दिन ?

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का पार्टी का अध्यक्ष निर्विरोध चुना जाना तय है। क्योंकि नामांकन के लिए अब तक कोई आवेदन दाखिल नहीं हुआ है। गौरतलब है कि वे अपनी

व्यंग्य : नौकरी तू इतनी हसीन क्यों है ?

लोग बड़ा भाव खाते हैं ? माना कि जो लोग भूखे हैं और जिनके पास कुछ भी खाने को नहीं हैं अगर वे भाव खाते हैं तो कोई ताज्जुब की

कहानी : मुखौटा

माया और प्रेम दोनों एक ही कॉलेज से बीटेक की पढ़ाई कर रह थे। माया प्रारंभ से ही प्रेम से प्रेम कर बैठी थी। लेकिन, प्रेम माया को देखता तक

व्यंग्य : सर्दी का सितम

सर्दी का प्रकोप दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। दिन भी ठंडा है और रात भी ठंडी है। इस ठिठुरन से लोकतंत्र ठिठुर रहा है। नेता ठिठुर रहे है, जनता

जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो सका है। सरकारी अस्पतालों का तो भगवान ही मालिक है ! ऐसे

व्यंग्य : डेंगू का डंक

भगवान भले ही मरीज बनाएं पर डेंगू का मरीज किसे को ना बनाएं ! डेंगू के इलाज में जिंदगी की सारी जमापूंजी निकल जाती है। यहां तक की देह से

अतीत से ज्यादा वर्तमान पर लड़ना हितकर

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती पर आमजन का आक्रोश दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। गुजरात से गुवाहाटी और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फिल्म को लेकर चर्चा का बाजार

योग प्रशिक्षिका राफिया पर फतवा क्यों ?

कहने को तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। लेकिन, यहां हमेशा धर्म के नाम पर वोट बटोरने, सत्ता हासिल करने और एक तबके को दूसरे तबके के खिलाफ लड़वाकर अपनी

व्यंग्य : पत्रकारिता में आये परिवर्तन

भारत की पत्रकारिता में इन दिनों द्रुतगामी परिवर्तन आये है। आजादी से पहले पत्रकार सच छापते थे, आजादी के बाद खबरें छापने लग गये। और आजकल पत्रकार दोनों से इत्तर

प्रश्नों के घेरे में पत्रकारिता

भारत के संदर्भ पत्रकारिता कोई एक-आध दिन की बात नहीं है, बल्कि इसका एक दीर्घकालिक इतिहास रहा है। जहां प्रेस के अविष्कार को पुर्नजागरण एवं नवजागरण के लिए एक सशक्त

विशेष 14 नवंबर : देश के ‘बाल‘ का हाल

भारत में हम प्रत्येक वर्ष 14 नवंबर को पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाते है। लेकिन आज भी देश के करोड़ों बच्चे दो

इतिहास का मजाक न बनाएं

संचार क्रांति के इस युग में यह कहने में कोई संदेह नहीं कि सिनेमा, समाज का दर्पण है। उदहारण के लिए अभी हाल ही में रिलीज हुई दंगल, सुल्तान में

कहानी : पागल औरत !

गांव के नुक्कड़ पर बैठी औरत जिसके बाल खुले हुए और कपड़े अस्त-व्यस्त है। उसकी ये दुर्दशा देखकर लगता है कई दिनों से वह भूखी है। उसके चेहरे पर गम

व्यंग्य : सेल्फी विद प्रदूषण

देश की राजधानी में इन दिनों फोग चल रहा है। दिल्ली ठंड के साथ प्रदूषण के कारण भी कांप रही है। प्रदूषण काल बनकर दिल्ली की सड़कों पर नंगा नाच

मध्यप्रदेश सरकार का शर्मनाक नजरिया

हाल में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से घर लौटती एक छात्रा के साथ कुछ असामाजिक तत्वों ने गैंगरेप किया। गैंगरेप के बाद जब छात्रा ने मां-बाप के साथ

क्या 2022 तक भारत गरीबी मुक्त हो पायेगा ?

हाल ही में नीति आयोग ने 2022 तक भारत के गरीबी मुक्त होने का दावा किया है। खैर ! यह अनुमान सच होगा भी कि नहीं ये तो भविष्य ही

व्यंग्य : वंदेमातरम सुनाएं वो असली नेता होए

भारतीयों को देशभक्ति साल में दो ही दिन याद आती है। एक छब्बीस जनवरी और दूसरी पन्द्रह अगस्त को। बाकि के दिनों में देशभक्ति को गहरी नींद में थपकियां देकर

व्यंग्य : खिचड़ी को लेकर मजाक नहीं चलेगा

देखिए ! आप शिकायत करते थे ना कि अच्छे दिन कब आयेंगे ? देखो ! वे अच्छे दिन आ गये। खिचड़ी के रूप में आये है। खिचड़ी को सोशल मीडिया

गुरु नानक देव जयंती : सच्चे संत थे गुरु नानक देव

भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक गुरु को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यहां तक कि हमारी वैदिक संस्कृति के कई मंत्रों में गुरु परमब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नमः यानि गुरु को

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