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Category: महेश तिवारी

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युवाओं को युवाओं के मुद्दों की समझ, फ़िर राजनीति में उनकी हिस्सेदारी सीमित क्यों

मध्य प्रदेश के लगभग 15 ज़िलों के 25 महाविद्यालयों में 162 आदिवासी छात्र प्रतिनिधियों ने जीत का परचम लहराया। जिसमें मीडिया की ख़बरों के मुताबिक पचास फ़ीसद स्थान लड़कियों ने

राजनीति के बिगड़ते बोल और स्तर का जिम्मेदार कौन

लोकतंत्र की छांव में फ़िर चुनावी धुन बज चुकी है। इस चुनावी फ़ेरी में अंतर है, तो वह राज्य का। इस बार राज्य है सरदार पटेल की भूमि। जिन्होंने देश

महिलाओं को सामाजिक न्याय दिलाना है, तो संसद तक बढ़े पहुँच

भारत महिला और पुरुष के बीच भेदभाव को मिटाने के मामले में चीन और बांग्लादेश जैसे अपने पड़ोसी मुल्कों से काफ़ी पीछे छूट गया है। जो बदलते भारत और उन्नतशीलता

उपेक्षित समाज, चुनाव और मीडिया

आज के दौर की सामाजिक स्थिति को देखकर लगता है। क्या आज़ादी बाद चुनाव मात्र सिंहासन बदलने भर की रवायत बनकर रह गया है, क्योंकि जो असन्तुलन की खाई समाज

कब सुधरेगा पुरूष प्रधान समाज?

आंकड़े सिर्फ आहट की दस्तक़ नहीं देते, बल्कि सच्चाई से रूबरू कराते हैं। देश में लिंग-अनुपात के लगातार कम होने के जो आंकड़े हमारे सामने आ रहे हैं, वे न

अगर पर्यावरण के लिहाज से सही नतीजे हो फ़िर कोई समस्या नहीं ?

दीपावली पर आतिशबाजी हमारी परंपरा रही है, लेकिन समाज और देशहित में अगर कोई पहल हो। तो उसपर सामाजिक और धार्मिक स्तर पर मतभेद उत्पन्न होना सही नहीं। दीपावली के

जातिवादी चक्की में कब तक पिसेगा, देश

सभ्य समाज में व्यक्ति का महत्व होना चाहिए, उसके जाति का नहीं। हमारी युवा पीढ़ी को यह बात अपने ह्रदय में उतारनी होगी। भेदभाव और सामाजिक वैमनस्यता का दुष्परिणाम समाज

आज की स्थिति में तो रामराज्य की कल्पना करना अतिश्योक्ति

दशहरा असत्य पर सत्य की विजय। दुष्ट पर सज्जन की विजय का पर्व। सामाजिक दृष्टि से किसान जब फ़सल को काटकर घर लाते हैं, तो उसे भगवान की देन मानकर

पूजिए नहीं, पहले दानवी समाज से सहेजिये

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। हम विकाशशील से विकसित अवस्था में पहुँच रहें हैं। तो इस बदलाव के दौर में कहीं बेटियों का कत्ल , तो कहीं वंश को आगे

जातिगत नहीं, आर्थिक आधार पर आरक्षण, समय की मांग

कर्जमाफी के नाम पर हुआ बहुत अब तलक का खेल किसान दर- दर भटक रहा, मौज कर रही सरकार कब तलक ये तमाशा चलेगा, नहीं पता है शायद किसी को,

विकसित युवा, विकसित भारत के पांच लाइन पर देश को बढ़ना होगा

युवाओं की भागीदारी जीवन में तीन पड़ाव अहम होते हैं। बचपन, जवानी और बुढापा। देश की वर्तमान स्थिति में परेशानी तीनों को है। बचपन देश में सुरक्षित नहीं, तो नौजवान

जरा सोचो किसान को मार डालोगे, तो रोटी कहाँ से लाओगे

लोग कहते हैं बेटी को मार डालोगे,तो बहू कहाँ से पाओगे? जरा सोचो किसान को मार डालोगे, तो रोटी कहाँ से लाओगे? फ़िर भी किसान मर रहें हैं, तो आज

फटेहाल में देश का ग़रीब, किसान और माननीय को अपने झोली की फ़िक्र

राम धारी सिंह दिनकर की ये चंद पंक्तियां आज की राजनीतिक व्यवस्था के लिए ही शायद कही गई थी। सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज

खून की प्यासी देश की सड़कें क्यों ?

सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। इस उक्ति का कोई अर्थ नहीं रहा। सड़क पर सरपट दौड़ती गाड़ियांए और उससे भी तेज़ सरपट भागती मौत। यह कहानी हमारी सड़कें रच रहीं

इससे और भी नंगेपन पर क्या उतर सकता है, समाज

हम ऐसे देश में रहते हैं। जिसकी आत्मा संस्कृति और सभ्यता में निवास करती है। वर्तमान अवस्था में हमनें उस संस्कृति और सभ्यता को चुल्लू भर पानी में डुबो दिया

बाबाओं के आगे कब तल्ख़ घुटने टेकने पर मजबूर देश

संविधान में मीडिया को लोकतंत्र को चौथा स्तम्भ माना जाता है। इस लिहाज से मीडिया का समाज के प्रति उत्तरदायित्व और जिम्मदरियाँ बढ़ जाती हैं। मगर क्या वर्तमान वैश्विक दौर

शाइनिंग इंडिया का ग़रीब भारत

राजनीति और जनता का प्रत्यक्ष मिलन अब मात्र चुनावी हल-चल के वक़्त दिखता है, जब उसके प्रत्याशी जनता रूपी मत को अपना भगवान और उसके साथ तमाम वे रिश्ते- नाते

लोगों को रहने के लिए छत मयस्सर नहीं, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या?

भारत की दो तिहाई आबादी अगर जेल से भी कम जगह में रह रही है। तो ऐसे में निजता के मौलिक अधिकार बन जाने के बावजूद छोटे होते मकान और

” एक देश , एक कानून पर अमल हो “

देश में आज के दौर में कोई सबसे बड़ा बदलाव दिख रहा है। तो वह 1400 वर्षों बाद देश में मुस्लिम महिलाओं की सुदृढ़ होती सामाजिक स्थिति की ओर बढ़ता

प्रकृति रही पुकार, बंद हो उसके खिलाफ मानवीय बेरुखी

संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आई एक रिपोर्ट में विस्थापन को लेकर खुलासा हुआ हैं, वह देश की व्यवस्था और लोगों की सोच में बदलाव की तरफ़ इशारा करती है

” छोटी मछलियों को पकड़कर कब तल्ख़ जिम्मेदारी से भागेगा रेलवे “

 प्रभु तेरी कैसी माया? आज के वक़्त में रेलवे सुगम यात्रा करवाने का नहीं बशर्तें देश की आवाम की जान के लिए खतरा बन गई  है। देश को भाजपा नीति

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