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कविता : वो भी एक बच्ची है

वो भी एक बच्ची है

चौराहे पर गुब्बारे को

बेचती एक बच्ची

धूल में नहाये

कुछ सपने खरीदने हैं उसे

गाड़ियों की रफ़्तार से अनभिज्ञ

खड़ी हो जाती

इंतजार में लालबत्ती होने का

न तो उसे पता है

क्या होता दुकानदार है

नही ग्राहक का

मुस्कुराते हुए चाहती है बेचना

उस गुब्बारे को

जिसे उसकी बीमार माँ ने

बड़ी मुश्किल से फुलाया

एक आखँ में माँ की पीड़ा

दूसरी आँख में अब तक

गुब्बारे न बिकने की फिक्र

चौराहेपे गाड़ियों के इंतजार में

जो कभी रुकती है तो कभी निकल जाती हैं

कभी तो पुरे पैसे कभी अधूरे पैसो के साथ

कभी मिलती उसे ख़ुशी तो कभी उदासी

कभी प्यार तो कभी दुत्कार

पर मुस्कुराती जरूर है

उसकी जिंदगी सिमित हो चली है

लाल हरी पीली बत्तियों के

बीच उलझकर

टूटे सपनों की वह

स्वम्साक्षी है

दूसरे समझे या ने

समझे ?

डॉ. मनोज कुमार

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