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कविता : चोर

चोर

बड़ी भीड़ थी वहां
कुछ शोर भी मच रहा था।
जो देखा आगे जाकर
इंसानियत का अंतिम संस्कार हो रहा था।
बड़ा घृणित मंजर था वह
एक महापाप हो रहा था।
वह्शी बनें खड़े थे कुछ लोग
एक मासूम मृत सा वहीं पड़ा था।
उसके हाथों में एक खाने की थैली थी
चेहरे पर लाचारी का थप्पड़ जड़ा था।
भूख की अनल से जल चुका था देह
और सहमी आखों में बस दर्द भरा था।
पूछा मैंने-क्या हुआ है यहां
पता चला वह चोरी कर भाग रहा था।
पर नन्हें पावों में इतनी गति नहीं थी
और सियारों ने नोंच लिया था।
भला हुआ जग छोड़ गया
आखिर भूखे पेट वह कहां जीया था।

मुकेश सिंह
सिलापथार,असम।
09706838045

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