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अनुभवों की खान होते है बुजुर्ग

कहते है बुजुर्ग अनुभवों की खान होते है। बुजुर्ग वटवृक्ष के सामान होते हैं जिनकी शीतल छाया में बच्चे सुरक्षित रहते है मगर आज अपने ही वृक्ष को काटने पर उतारु हो गए हैं।बुजुर्ग परिवार का स्तम्भ होते हैं।मगर आज के आध्ुनिक समाज में अधिकांश वृद्ध आश्रमों की शरण ले रहे हैं क्योकि जब यह लोग दुखी हो जाते हैं तो वृद्ध आश्रम ही आखिरी विकल्प सूझता हैं। आज बहुत से वृद्ध एकाकी जीवन जी रहे हैं। बेटों के पास आज समय नहीं हैं कि अपनों का सहारा बने घर में अपने बुजुर्गों की दिन-रात सेवा करनी चाहिए क्योकिं बुजुर्गों की सेवा से बड़ा कोई तीर्थ नहीं हैं। देश में आज लाखों वृद्ध लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं तथा दुसरों पर मोहताज हैं।बुजुर्गो ने पाई-पाई जोड़कर जिन बच्चों को मंहगी व उच्च तालिम देकर पैरांे पर खडा़ किया आज उन्ही के सामने दो जून की रोटी के लिए गिड़गडा रहे हेै।मां-बाप का कर्ज आज तक कोई नहीं चुका पाया है। बुजुर्गों ने अपनी खुशियों का गला घोंटकर अपने बच्चों को हर खुशी प्रदान की मगर आज वही चिराग माता -पिता के दुश्मन बन गए हैं आज बुजुर्गो को स्टोर रुम में रखा जाता है मगर एक दिन स्टोर रुम तुम्हारा भी इंतजार कर रहा है जब तुम्हे भी ऐसा ही नसीब होगा।क्योकि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे। बेशक प्रत्येक वर्ष एक अक्तूबर को विश्व वृद्ध दिवस मनाया जाता है मगर ऐसे आयोजन औपचारिकता भर रह गए हैं। केवल मात्र एक दिन बड़ी धूमधाम से कार्यक्रम किए जातें हैं बाकि 364 दिन इन वृद्धों को कोई याद तक नहीं करता वृद्धों कें नाम पर चलाई जा रही योजनाएं कागजों में ही क्रियान्वित होती हैं।आज देश में बुजुर्ग लोग तिरस्कृत जीवन जीने को मजबूर हैं। बुजुर्ग किसी दूसरे द्वारा नहीं बल्कि अपने ही बेटों के कारण उपेक्षित हैं शायद यह उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन बच्चों के लिए अपना पेट काटकर व भूखे रहकर उनका पालन पोषण किया आज वही बेटे उन्हे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।हैं। आज देश में बुजुर्गों की जो हालत हो रही है उसके मामले समय-समय पर उजागर होते रहते है।आधुनिक युग की तथाकथित बहुएं व कलयुगी बेटे बुजुर्गों से बुरा व्यवहार कर रहे हैं।लेकिन एक दिन उन्हे भी बुढापा आयेगा तब उन्हें भी अपनी करनी का फल अवश्य आज स्थिति यह है कि वृद्ध लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं।विडम्बना देखिए कि आज मां-बाप का बंटबारा किया जा रहा है उन्हे महिनों में बांटा गया है कि इस माह किस बेटे के पास खाना खाना है तथा अगले महिने दूेेसरे बेटे के घर खाना है।जिन मां बाप ने अपने बेटों में कभी भेदभाव तक नहीं किया आंच तक नहीं आने दी कांटा तक चुभने नहीं दिया आज वही बच्चे उनका बंटवारा कर रहे हैं।ऐसी परिस्थिितियों के कारण कई लोग असमय ही मौत को गले लगा रहे हैं।बुजुर्गों के साथ बंेटो द्वारा मारपीट की घटनाएं भी होती रहती हैं।मारपीट के कारण कई मारे जा चुके हैं। ऐसी औलादें समाज पर कलंक है जो अपने ही जन्मदाताओं को नरक की जिन्दगी दे रहे है।लेकिन कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। समय बहुत बलवान होता है एक दिन सजा जरुर मिलेगी।गरीब लोग तो माता -पिता व बुजुर्गो की अच्छी सेवा करते है मगर साधन संपन्न लोगो द्वारा आज बुजुर्गो को ओल्ड ऐज होम तथा सरकार द्वारा बनाए गए वृद्ध आश्रमों में धकेला जा रहा है। आज वृद्धो को पुराना सामान समझ कर निकाला जा रहा हैं। लेकिन दुनिया में सब कुछ मिल जाता है मगर मां-बाप नहीं मिलते। बेचारे बुजुर्ग जिन पोते पोतियों को कंधों पर बिठाकर स्कूल से लाते थे और छोडते थे आज वही उनकी पिटाई तक करते हैं तथा उनका मजाक उडाते हैं।कुछ बुजुर्ग तो घर में ही कैद होकर रह गए हैं वे गुमनामी के अन्धरे में जीने को मजबूर हैं। वृद्ध आज दयनीय स्थिति में जीवनयापन कर रहे हैं।सरकारों ने बुजुर्गों को पैशन की सुविधा दी है पर वह भी नाकाफी साबित हो रही है केन्द्र सरकार द्वारा वृद्धों के भरण-पोणण के लिए कानून बनाए हैं मगर वे फाईलो की धूल चाट रहे हैं नजीजन लोग कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।सरकार को सख्ती से कानून लागू करने चाहिए ताकि वृद्धों को उनका हक मिल सके।सरकार व प्रशासन को ऐसे लोगों के विरुद्ध ठोस कारवाई करनी चाहिए तथा बुजुर्गों का अनादर करने वालो को दंडित किया जाए। जब तक बुजुर्गो को उनका सम्मान नहीं मिलेगा ऐसे वृद्ध दिवसों की कोई सार्थकता नहीं होगी।

नरेन्द्र भारती, वरिष्ठ पत्रकार -9459047744

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