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व्यंग्य : राष्ट्रीय त्योहार ..चुनाव जयंती

यद्यपि भारत की पवित्र भूमि पर प्रत्येक वर्ष विभिन्न त्योहार व उत्सव मनाए जाते हैं । जिनमें सामाजिक पर्व , सांस्कृतिक पर्व व राष्ट्रीय पर्व सम्मिलित हैं । जिनका संबंध सारे राष्ट्र तथा वहाँ रहने वाले लोगों से होता है ।

इन त्योहारों में एक नया त्योहार जुड़कर राजनीतिक माहौल को खुशनुमा बना देते हैं । यह त्योहार पूरे भारतवर्ष में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चुनावी त्योहार मनाया जाता है । चुनाव जयंती वे सभी वर्ग के लोग मनाते जिनकी आयु 18 वर्ष से अधिक है । अलग – अलग क्षेत्रों में इस त्योहार को मनाने का अलग नियम है । चुनाव देवता इस त्योहार के प्रमुख देवता माने जाते हैं । चुनाव देवता अपने प्रचार – प्रसार के लिए छोटे – मोटे देवताओं का आह्वान करते हैँ । जो इनके कहने पर विभिन्न क्रियाकलापों के माध्यम से जनता का मन लुभाने का काम करते हैं । चुनाव देवता इंद्र सिंहासन प्राप्त करने के लिए साम , दाम , दंड , भेद की नीति अपनाने से नहीं चूकते हैं ।

यह त्योहार हर ऋतु में मनाया जाता है । चुनाव जयंती के आगमन पर हर व्यक्ति झूम – झूम कर गाता है । लाउडस्पीकर गली – गली बजने लगता है । जगह – जगह सभाएँ आयोजित होती हैं । हर दीवार पर चुनाव देवताओं के पोस्टर चिपकाएँ जाते हैं । जुलूस निकला जाता है । शोभा यात्रा का प्रदर्शन होता है । इस यात्रा में युवा वर्ग के सभी जनता भाग लेते हैं । सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं । इस आयोजन में चुनावी देवता अपना जी – जान लगाकर जनता को पूरा गुमराह करते हैं । चुनाव देवता भोले – भाले जनता को कई वरदान देते हैं । झूठे वादे करते हैं और दानवीर कर्ण के रूप में जाने माने हस्ती बनाने का प्रयास करते हैं ।

इस त्योहार में भाग लेने वालों का निश्चित चिह्न होता है , निश्चित रंग के कपड़े होते हैं एवं निश्चित रंग के पताकों के साथ वे हर गली – कूचों में दिखाई पड़ते हैं । इस त्योहार में कहीं गुंडागर्दी तो कहीं कानून का उल्लंघन होता नज़र आयेगा ।

इस त्योहार में फिल्मी सितारे भी बढ़ – चढ़ कर हिस्सा लेती है । फिल्मी डायलॉग और नृत्य प्रदर्शन कर लोगों को लुभावने वायदे करते हैं और खुद मोटी रकम डकार जाते हैं । भीड़ बढ़ाने के लिए फिल्मी हस्तियाँ जोरदार कार्यक्रम करती है । ये मदारी की डुगडुगी का काम करती है । धन – बल से चुनावी जयंती की खुशी दुगुना हो जाता है ।

चुनावी जयंती का मुख्य आकर्षण केंद्र पुरस्कारों का वितरण होता है । यह पुरस्कार दिन के उजाले में नहीं अपितु रात के अंधेरे में चोरी छुपे दी जाती है । पुरस्कार क्यों दिया जाता है यह बात गोपनीय बनी रहती है । मुद्दे की बात है पुरस्कार वितरण करने वाले चुनाव देवता के पास मुद्रा कहाँ से आता है और कैसे वितरित करता है यह बात त्योहार के चकाचौंध में गुम हो जाता है ।

चुनाव जंयती मनाने के लिए कई बार तोड़ – फोड़ की जाती है । दंगे – फसाद , अस्त्र – शस्त्रों से खूनी खेल भी किया जाता है । दुकानें बंद करा दी जाती है । पूरे मीडिया चैनलों में एक ही जश्न दिखाया जाता है । सभी समाचार को दरकिनार कर इसी त्योहार की तैयारी व पल – पल की खबर टीवी पर भी दिखाया जाता है ।

इसी तरह चुनावी देवता को पुकारा जाता है और अपने – अपने मुरादों को झोली फैला कर माँगा जाता है । कभी फरिसता बनकर चुनाव देवता माँगे पूरी कर देता और कभी आश ही बनाये रखता ।

छोटे बच्चों को चुनाव जयंती से कोई लेना – देना नहीं होता है । उनकी जिंदगी इन त्योहारों से दूर ही भली लगती है । गर ये और बात है कि इस पर्व के बाद देवताओं के नाम उन्हें पुस्तक में पढ़कर याद करना होता है । हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में इस पर्व से जुड़ा होता है । इस पर्व को मनाने के लिए सारे धर्म – जाति के लोग इकट्ठे होते है । सभी अपना काम – धाम छोड़कर एक नये काम में जुट जाते हैं । सभी बेरोजगार अपने अपने बिल से निकलकर सड़कों पर दिखाई देते हैं । वे सभी अपने – अपने चुनाव देवताओं के लिए दुआ माँगने के लिए सड़कों पर साथ निकल पड़ते हैं । चक्का जाम , दुकानें बंद जैसी घटनाओं का होना तो आम बात है लेकिन मुख्य बात यह है कि सभी साथ मिल कर इस त्योहार को मनाते हैं ।

यह चुनाव जयंती भारत के धर्मनिरपेक्ष , समानता व विधि – संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक होने का प्रतीक है । हम सभी इस पर्व को खुशी व सौहार्द से मनाने का शपथ लेकर इसे अक्षुण्य व सर्व हितकारी बनाए रखते हैं । चुनावी देवताओं से भारत में रहने वाला हर व्यक्ति यह दुआ माँगता है कि वह खुशहाल जिंदगी जी सके और हर वर्ष यह पर्व नयी ताजगी व नयी स्फूर्ति लेकर आये । हर चुनावी देवताओं के वरदहस्त हम सभी पर बना रहे । हम सभी इस पर्व का गान दोहराते हैं – जय हो , मंगल मय हो , चुनाव जयंती ।

लेखिका
मल्लिका रुद्रा ” मलय – तापस “
बरतुंगा , चिरमिरी ( छत्तीसगढ़ )

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