ब्रेकिंग न्यूज़

आलू के बहाने बाजार व्यवस्था की खुलती पोल

नए आलू के आते ही हमारी बाजार व्यवस्था ने एक बार फिर पोल खोल कर रख दी है। नए आलू आने के बाद आलू की लागत भी नहीं निकलने के चलते यूपी-पंजाब के किसान आलू सडकों पर फेंकने की राह पर आ रहे है। मण्डियों में आलू के भाव लागत जितने भी नहीं मिल रहे हैं। मोहल्ले में फेरी लगाने वाला या गली कूचे में दुकान खोल कर बैठा सब्जी बेचने वाला उसी आलू को आठ से दस रूपए किलो बेच रहा है। बडे-बडे मॉल वाले सस्ती दर पर सब्जी के विज्ञापन देकर इस तरह से दिखा रहे हैं, जैसे वे खुद घाटा खाकर हमें सस्ते में आलू या सब्जियां बेच रहे हंै। नए आलू आने से कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू को निकालने की आवश्यकता हो रही है वहीें आलू के भावों में तेजी से कमी आई है। कारण यह कि गोदामों में आलू का रखरखाब महंगा पड़ रहा है मालिक आलू ले जाने को तैयार नहीं है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कई प्रदेशों में यही आलू कई गुणा अधिक दाम पर आम आदमी को मिल रहा है। पर कोल्ड स्टोरेज के आलू का बहां तक पहुंचाना भी महंगा होने से यह परिणाम सामने आ रहा है। यह भी साफ है कि इससे हमारी व्यवस्था का दोहरापन सामने आ रहा है। इस व्यवस्था से उत्पादक किसान दुखी है तो दूसरी तरफ आम नागरिक को भी लाभ नहीं मिल रहा हैँ। किसान को लागत ही नहीं निकलने के कारण उत्पाद को सडक पर फेंकने तक की नौबत आ जाती है तो आम उपभोक्ता को तो मण्डी से कई गुणा अधिक दर पर वहीं आलू खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है। फायदे में है तो बिचैलिए।
किसानों की मेहनत का परिणाम कहें या कृषि वैज्ञानिक के अनुसंधान का फल की देश में कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो रही है। प्रकृति की मेहरबानी से आलू का उत्पादन अच्छा हो रहा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में लगभग 280 लाख टन आलू का उत्पादन संभावित है। देश में भण्डारण की क्षमता लगभग 180 लाख टन की है। मोटे अनुमान के अनुसार काश्तकार को आलू की फसल के लिए लगभग 250 से 300 रूपए तक खर्च करने पड़ते है। इसके साथ ही बारदाना, बाजार या मण्डी तक लेजाने का खर्चा होता है, मण्डी टेक्स चुकाना होता है। फिर भी परेशानी तब होती है जब उसे लागत का पैसा भी नहीं मिल पाता।
यह केवल आलू की ही बात नहीं है। टमाटर के दिनों में जब भाव गिरते हैं तो जयपुर के आसपास दिल्ली व आगरा रोड़ पर सडकों के किनारे टमाटरों का ढेर बिखरा देखा जा सकता है। यही हाल महाराष्ट्र् व देश के अन्य उत्पादक इलाकों में आम है। यही हाल अन्य फसलों का भी देखने को मिलता है। कभी प्याज के खरीददार नहीं मिलते तो छोटी सी कम उत्पादन या खराबे की खबर मात्र से प्याज के भाव आसमान को छूने लगते हैं। दो साल पहले चने की दाल निर्यात करनी पडी पर जब चने की फसल बाजार में आई तो चने को सरकार को समर्थन मूल्य पर खरीदने को मजबूर होना पड़ा। गन्ने को जलाने की घटनाएं पिछले दिनों समाचार पत्रों की सुर्खियां बन चुकी है। गिरते भावों के चलते गन्ना उत्पादक वैकल्पिक उपाय खोजने लगे हैं।
असलियत में देखा जाए तो यह आज की समस्या नहीं है। ठीक है आज आलू सड़क पर फेंकना पड़ रहा है, कल टमाटर का ढ़ेर सडक किनारे बिखरे दिखाई दंेगे। परसों फसल आते ही सरसों, चना, गेहूं या दूसरी फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की व्यवस्था करनी होगी। आखिर ऐसा क्यों ? इन परिस्थितियों से उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को ही नुकसान हो रहा है। सरकार की हेठी हो रही है वह अलग। फायदा उठा रहा है बिचैलियां। इस समस्या का एक समाधान व्यापक स्तर पर भण्डारण क्षमता विकसित कर की जा सकती है। आलू के ही मामलें में ले तो 180 लाख टन भण्डारण क्षमता ही है। अनाज के भण्डारण की भी प्रर्याप्त व्यवस्था नहीं है। हालांकि सरकार ने गोदाम निर्माण का कार्य व्यापक स्तर पर लिया है। आवश्यकता के अनुसार कोल्ड स्टोरेज चैन विकसित करनी होंगी। निजी सहभागिता से इस कार्य को आगे बढ़ाया जा सकता है ताकि ओसतन 28 हजार करोड़ की तो सब्जियों की बर्बादी को ही रोका जा सके। खुले में रखे अनाज को बचाया जा सके। इसके साथ ही वितरण व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। दक्षिणी राज्यों तक आलू पहुंचाने में लगभग 300-350 रू क्ंिवटल का खर्चा आता है, किसान इसे वहन नहीं कर सकता, सरकार को आगे आना चाहिए ताकि पूरे देश में मांग व आपूर्ति बनी रहे, किसानों को पूरा पैसा मिल सके, आमनागरिक को उचित मूल्य पर वस्तुएं प्राप्त हो सके। इसके लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जा सकता है। पीपीपी मॉडल पर काम हो सकता है। सरकारी ऐजेन्सी बनाई जा सकती है। कम से कम भावों पर नियंत्रण होने के साथ ही काश्तकारों के हितों की रक्षा व अनाज-सब्जियों की बर्बादी को रोका जा सकता है। सबसे अधिक खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहित करने, कोल्ड स्टोरेज चैन विकसित करने, कोल्ड सुविधायुक्त कंटेनरों की चैन बने ताकि आलू हो या टमाटर या अन्य कोई बागवानी फसल, उसका सुरक्षित स्टोरेज हो सक, मूल्य संवर्द्धन हो सके और किसानों व आमनागरिकों को उचित मूल्य पर यह वस्तुएं उपलब्ध हो सके। लाखों करोड़ों रुपए के खराबें को रोकने के लिए सरकार को युद्धस्तर पर निर्णय कर आगे आना होगा।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Reply

Translate »
Skip to toolbar