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भारतीय साहित्यिक विकास मंच और अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सभा द्वारा काव्य संध्या का आयोजन

संजय कुमार गिरि
नई दिल्ली। भारतीय साहित्यिक विकास मंच और अखिल हिन्दी साहित्य सभा- दिल्ली शाखा के संयुक्त तत्वाधान में रविवार 24 दिसंबर को दिल्ली के श्रीनिवासपुरी में आयोजित गोष्ठी/निशिस्त का आयोजन किया गया। समारोह की अध्यक्षता बेहतरीन शायर आदरणीय मनोज बेताब जी ने की और संचालन ग़ाज़ियाबाद की कवयित्री श्रीमती ममता लड़ीवाल जी ने की।

जाने माने शायरों और कवियों की उपस्थिति ने समारोह को भव्यता प्रदान की, लखनऊ से भुपेन्द्र सिंह जी, सिरसा से गोबिन्द चांदना जी और सुरेन्द्र इंसान जी तशरीफ़ लाए तो ग़ाज़ियाबाद से जगदीश मीणा जी, दीपक भारतवासी जी, प्रभा शर्मा जी, ममता लड़ीवाल जी ने समारोह को गौरान्वित किया। फ़रीदाबाद से जाने माने शायर संजय तन्हा जी, अजय अक्स जी, अनहद गुँजन जी और नॉएडा से सूक्ष्मलता महाजन जी की शानदार उपस्थिति दर्ज़ हुई।

कार्यक्रम के आयोजक के तौर पर आदरणीय विजय स्वर्णकार जी, गुरचरन मेहता ‘रजत’ जी, फैज़ बदायूनी, माधुरी स्वर्णकार जी और ममता लड़ीवाल जी का योगदान सराहनीय रहा।

दिल्ली से जनाब समर बुगारस्वी जी, संजय गिरी जी,गौरव त्रिवेदी, वीरेंद्र बत्रा जी, राजेश मयंक जी, भुपेन्द्र राघव जी, चैतन्य चन्दन जी, मजाज़ अमरोही साहब, महबूब आमीन जी, श्रीकांत सक्सेना जी, प्रेम बरेलवी जी, यशपाल कपूर जी, रेणुजा सारस्वत जी, दिनेश उपाध्याय जी, क़मर बदरपुरी साहब, ख़ुमार देहलवी साहब, सुन्दर सिंह जी, सूफ़ी गुलफ़ाम शाहजहाँपुरी साहब, इमरान धामपुरी जी, अख़्तर गोरखपुरी जी, विनय सक्सेना जी ने कार्यक्रम को नई ऊँचाइयाँ दी।

क़मर बदरपुरी साहब ने अर्ज़ किया ‘ हरेक मिसरा लहू से सींचते हैं, ग़ज़ल कहना कोई आसान है क्या’ संजय तन्हा का ये शेर बहुत सराहा गया ‘मंज़र ऐसा देख के दिल को मिला सुकून, एक हिन्दू को चढ़ रहा एक मुस्लिम का खून’  ममता लड़ीवाल ने पढ़ा ‘उसने छिपा ली हँसते हुए पेट की मरोड़, पर चीथड़ों से झाँक रहा मुफ़लिसी का रोग’ अनहद गुँजन ने ‘जान कैसे न जाती फिर गुँजन, तीर सीने के पार था गुँजन’ पढ़ा। समर साहब ने ‘बात नरमी से कीजिये साहब, ये ही लहज़ा अगर मेरा हो तो’ सुना कर दाद बटोरी।

मजाज़ अमरोही साहब ने ‘जान मेरी जाए या तुम्हारी..जान है आखिर जान, ऐसे भी नुकसान है..वैसे भी नुकसान’ पढ़ा तो तालियों से हॉल गूँज गया। फैज़ बदायूनीं साहब ने जब पढ़ा ‘फैज़ मरना है तो मर जाओ वतन की ख़ातिर, बाद मरने के शहीदों का कफ़न महकेगा’ तो महफ़िल की रौनक कई गुना बढ़ गई और विजय स्वर्णकार जी का ये शेर भी बहुत पसंद किया गया ‘बरसा मगर ये देख के पानी बिफर गया, तालाब मेरे गांव का मिटटी से भर गया। संजय गिरि का शेर कलम रहती है सदा संजय चलूंगी साथ तेरा ही, रहेगा जे लिखूंगी वो नहीं मंजूर बिकने को और जगदीश मीरा का गीत भोर की बन किरण अब चले आये, मेरे जीवन में फैला तिमिर है घना बहुत सराहा गया ।

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