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कृषि संकट के बीच उम्मीद की नई कोपलें

नए वर्ष की तरफ बढ़ते हुए कुछ ऐसे कदमों से शुरुआत करते हैं, जो कृषि के क्षेत्र में छोटी ही सही, लेकिन उम्मीद बंध्ााते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि वह किसानों को मुफ्त में कृषि आदान जैसे बीज और फर्टिलाइजर वगैरह देगी ताकि लागत कम हो सके। मध्य प्रदेश में भावांतर योजना आरंभ हुई ताकि किसानों को समर्थन मूल्य व उनके विक्रय मूल्य के अंतर की राशि सीध्ो दी जा सके। भावांतर का मकसद किसानों को नुकसान से बचाना है। तेलंगाना ने भी कहा है कि हम किसानों को हर वर्ष 8 हजार रुपए की सहायता राशि देंगे। ऐसे कई कदम अन्य प्रदेशों में भी उठाए गए हैं। ये सभी ऐसे कदम हैं जिनका लक्ष्य किसानों की मदद है। मगर इन छोटी-छोटी उम्मीदों के बावजूद कृषि में जो असल सुध्ाार होने चाहिए, उनकी तरफ हम नहीं जा रहे। इन सभी कदमों में ऐसा भी दिखाई और सुनाई देता है कि राज्य सरकारें किसानों पर मेहरबानी कर रही हैं। इन योजनाओं में हम पाते हैं कि इनका फायदा किसानों के बजाय और किसी को ही हो रहा है। महाराष्ट्र में जो कृषि आदान देने की योजना है, उसका असल फायदा तो बीज और खाद बेचने वाली कंपनियों को हो रहा है कि उनकी बिक्री बढ़ रही है। किसान कल जिस संकट में खड़ा था, आज भी वहीं खड़ा है। कुछ समय पहले तेलंगाना में एक योजना शुरू हुई थी कि वहां किसानों को 10-10 बकरियां दी गई थीं। कुछ ही समय में इसमें से आध्ाी से ज्यादा बकरियां मर गईं। सरकार ने योजना बनाकर ढिंढोरा पीटा, बकरियां बेचने वालों को फायदा हुआ लेकिन किसान आज भी वहीं का वहीं खड़ा है। महत्वाकांक्षी योजनाओं वाले तेलंगाना में 3 हजार किसानों ने आत्महत्या की है, जो कि बेचैन करने वाला आंकड़ा है। इसका मतलब है कि समस्या अध्ािक गहरी है और हम तात्कालिक राहत पाने के उपाय कर रहे हैं। इनसे कृषि के मर्ज का उपचार नहीं होगा। अभी पैसा भी खर्च हो रहा है और कृषि का संकट बरकरार है।

किसानों की कर्जमाफी भी 2017 में चर्चा में रही। देखिए कि पिछले कई दशकों से हम किसानों को जानबूझकर उनकी फसल का पूरा मूल्य नहीं दे रहे हैं। इसे ‘फार्मथेफ्ट” कहना चाहिए। जब किसान की आय नहीं होगी तो वह कर्ज लेगा ही। समर्थन मूल्य केवल लागत की ही भरपाई करता है। किसान के बाकी खर्चों की पूर्ति कैसे होगी? क्या समर्थन मूल्य पर किसान अपने बच्चों को पाल सकता है? उसके बच्चे पढ़ेंगे कैसे, उनकी शादी कैसे होगी? इन प्रश्नों के बारे में भी हमें सोचने की जरूरत है। किसान कर्ज के नीचे दबा हुआ है। एक कर्ज से उबरने के लिए वह दूसरा कर्ज लेता है, दूसरा कर्ज मिटाने के लिए तीसरा। इस तरह कर्ज का दुष्चक्र चलता ही रहता है।

अब समय आ गया है कि हम पूरा कर्जा साफ करके किसानों की मदद करें। क्यों न हम एक बार किसान का पूरा कर्जा माफ कर दें? फिर हम ऐसी नीतियां लाएं, जिनसे कर्ज न चढ़े। अभी तो हम आंशिक रूप से ही कर्ज का इलाज ढूंढ रहे हैं। किसानों की आय बढ़ाने के बारे में हम गंभीरता से नहीं सोच रहे हैं। अगर किसान की आय बढ़ती है तो आर्थिक सुध्ाार फेल हो जाएंगे। यही वजह है कि नीति-निर्ध्ाारक किसानों की समस्या के ठोस हल की तरफ नहीं देखते हैं। पंजाब में 98 प्रतिशत ग्रामीण किसान परिवार कर्जे में है। इनमें 94 प्रतिशत परिवारों का खर्च आमदनी से ज्यादा है। यही कृषकों और कृषि का संकट है। आमदनी नहीं है तो खर्च चलाने के लिए कर्ज तो लेना ही होगा। इस कर्ज के चक्र को तोड़ना ही होगा। तो क्यों न बार-बार के बजाय एक ही बार में इस दुष्चक्र से निकलने का प्रयास किया जाए?

फसलों के दाम का गिरना भी 2017 में चर्चा में रहा। किसानों ने आलू-प्याज सड़क पर फेंके। आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि इसके लिए किसानों को बाजार से जोड़ा जाना जरूरी है। इससे किसानों की फसलों के दाम गिरने की समस्या का हल निकल आएगा। मगर इस पर गौर कीजिए कि अभी देशभर के सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों को ही समर्थन मूल्य मिलता है। 94 प्रतिशत किसान तो पहले से ही बाजार के भरोसे हैं। आजादी के 70 साल बाद भी किसान आत्महत्या कर रहा है तो वजह यही है कि बाजार से उसे कोई लाभ नहीं मिला है। बाजार में किसान लगातार नुकसान में है। कृषि समस्या के मूल में राजनीतिज्ञों की सोच नहीं बल्कि आर्थिक सलाहकारों की समझाइश है। जब बाजार असफल हो चुके हैं तो कोशिश यह हो कि किसानों को बाजार से कैसे निकाला जाए। सारे सलाहकार किसान को बाजार में ध्ाकेलने की बात करते हैं। ऐसे में कैसे किसान का हित होगा?

हालांकि देश के कई क्षेत्रों में किसान अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन समग्रता में असर पैदा नहीं हो रहा है। हमारे देश में एक-दो उद्योगों को छोड़कर हर उद्योग सब्सिडी पर है, मगर उनकी सब्सिडी पर बात नहीं होती है, बात हमेशा कृषि सब्सिडी की होती है। कॉरपोरेट का एनपीए खत्म करना आर्थिक तरक्की कहा जाता है और किसानों का कर्ज खत्म करना वित्तीय अनुशासन भंग करना। अगर हमने हमारा ढांचा इस तरह बनाया है तो यह हमारे आर्थिक ढांचे का दोष है।

अब तक हम विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की शर्तों को मानते गए और कृषि की अनदेखी करते गए। विश्व व्यापार संगठन कहता है कि हम अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए जो अनाज खरीदते हैं, वह विश्व व्यापार संगठन से खरीदें। इसका सीध्ाा मतलब है कि समर्थन मूल्य पर मार पड़ेगी। इसका सामना भी हमें आने वाले वर्षों में करना है और हमारी कोई तैयारी नहीं है।

हम कृषि में उम्मीद की ही तलाश कर रहे हैं तो जैविक कृषि के प्रयोगों को देखना होगा। हमारे प्रध्ाानमंत्री उत्तर-पूर्व, हिमाचल या अन्य पहाड़ी क्षेत्रों पर उर्वरकों के इस्तेमाल की मनाही और जैविक कृषि पर जोर देने की बात कहते हैं। वे बिलकुल ठीक कहते हैं, लेकिन वे बहुत ही छोटे क्षेत्रों के लिए जैविक कृषि अपनाने की बात करते हैं। संभव है कि आर्थिक सुध्ाारक उन्हें डराते हों कि उर्वरकों का इस्तेमाल रोक देने से उत्पादन गिर जाएगा। मगर हर क्षेत्र में हम अपनी ताकत को कम करके देखते आए हैं। हमारे देश में 30 करोड़ गौ वंश है। हमारे पास गाय की 39 नस्लें हैं। मैं हमेशा सोचता था कि भारतीय गायें कम दूध्ा क्यों देती हैं। मैंने विशेषज्ञों से पूछा तो उन्होंने कहा कि भारतीय गाय के बारे में बात भी मत करो क्योंकि हमें विदेशों से उन्न्त नस्ल मंगवाकर उसका भारतीय गाय के साथ क्रॉस करवाकर बेहतर किस्म की गाय पैदा करना पड़ी। मगर मेरी आंखें तब खुलीं जब मैंने देखा कि ब्राजील भारतीय गायें बुलवाता रहा। वहां हमारी गिर नस्ल की गाय 73 लीटर दूध्ा देती है। आज हम ब्राजील से ही उन्न्त किस्म के लिए सीमन आयात कर रहे हैं। हमने अपनी ही ताकत की उपेक्षा की। यही हम खेती में कर रहे हैं। आंध्ा्रप्रदेश में एक अच्छा कार्यक्रम कम्युनिटी मैनेज्ड सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएमएसए) शुरू हुआ। इसके तहत यहां 36 लाख एकड़ में ऐसी खेती होती है जहां किसी रसायन का उपयोग नहीं होता। आंध्ा्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु चाहते हैं कि सीएमएसए में प्रशिक्षित किसान राज्य के 56 लाख किसानों को 3 साल में रसायनों के उपयोग से दूर कर दें। इस कार्यक्रम के तहत कीटनाशकों का उपयोग खत्म हो गया तो पैदावार भी बढ़ी है। कीटों के हमले भी बहुत कम हो गए, जमीन की उर्वरता भी लौट आई। जैविक कृषि से स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी कम हो गया। जब आंध्ा्र प्रदेश ऐसा कर सकता है, तो देश के दूसरे प्रदेश भी कर ही सकते हैं। हमें ऐसी कई और मिसालों की जरूरत है।

देविंदर शर्मा
लेखक कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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