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फिल्मों, विज्ञापनों से आहत भावनाएं

बड़ी फिल्मों की रिलीज से पहले इस या उस बहाने हल्ला मचाकर उसकी स्क्रीनिंग रुकवाने की कोशिश करना भारत के लिए नया नहीं है। हाल में पद्मावती के फिल्मकार भंसाली और उसमें नायिका का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को कट्टरपंथी गुटों द्वारा जातिविशेष स्वाभिमान प्रतीकों के खराब चित्रण का अपराधी बताया गया। बात नारेबाजी से शुरू हुई और सीधे आक्रामक दस्तों द्वारा फिल्म के सेट की तोड़फोड़ तक बढ़ती गई। पहले एक राजपूत नेता ने आग उगली और फिर राजस्थान की पढ़ी-लिखी, जाने-माने राजकुल से जुड़ी महिला मुख्यमंत्री ने तोड़फोड़, हुल्लड़बाजी पर रोक लगाने की बजाय फिल्म पर ही राज्य में प्रतिबंध लगा दिया। फिर कथित रूप से आहत जाति विशेष की इज्जतबहाली के नाम पर सरेआम ‘अपराधियों (?) के अंगभंग के लिए लाखों के इनाम घोषित होने लगे। अब आधी सदी से परिवार नियोजन की पुरजोर वकालत करने के बाद सरकार ने अचानक गर्भनिरोध के लोकप्रिय, निरापद साधन कंडोम के विज्ञापनों को ‘जनहित में रात दस से सुबह छह बजे तक ही दिखाने की घोषणा की है। तर्क है कि ये विज्ञापन देखकर बच्चे काफी शर्मनाक सवाल पूछते हैं। पर घरों, स्कूलों में संस्कारी माता-पिता के साथ यौन संबंधों और संतानोत्पत्ति की बाबत खुली चर्चा कैसे हो सकती है? इससे बच्चों के दिमाग न बिगड़ जाएंगे? जहां आबादी की बेलगाम बढ़त देश की सबसे बड़ी समस्याओं में हो, जहां (विश्व बैंक की शोध रपट के अनुसार)50 फीसदी गर्भाधान अवांछित हों और हर तीसरे भ्रूण का प्राय: गैरकानूनी तरीकों से ऐसे चोरी छुपे गर्भपात कराया जा रहा हो कि उनसे लाखों युवा माताओं की हर साल मौत हो जाती हो, वहां हमको फिल्म से इल्म तक अनेक विषयों पर आहत भावनाओं के हवाले से अचानक चिपकाए जा रहे श्लील-अश्लील लेबलों पर गंभीरता से सोचना ही चाहिए। कोणार्क, खजुराहो, कालिदास या मध्यकालीन वैष्णव ग्रंथों के चितेरों के लिए जो उदार मानदंड हैं, वही भंसाली या हुसेन या तस्लीमा के लिए क्यों नहीं?

सवाल और भी हैं। कला की उत्कृष्टता का स्पर्श पाने के बाद तो कुछ भी अश्लील नहीं रहता। अन्यथा कालिदास (कुमारसंभवम्) और जयदेव (गीतगोविंदम्) में अपने-अपने आराध्य देव के उन्मत्त प्रणय के क्षणों का अनिर्बाध चित्रण कैसे कर सके? गुलेर के चितेरे मनाकु ने जयदेव के गीतगोविंद के आधार पर राधा-कृष्ण के अंतरंग क्षणों को उकेरना क्यों तय किया? योगी भर्तृहरि श्रंगार शतक किस तरह लिख गए? मानस का राजहंस के यशस्वी लेखक ने उतनी ही तन्मयता से ये कोठेवालियां तथा नाच्यो बहुत गोपाल भी कैसे लिख डाला? जाहिर है कि श्लील-अश्लील की बात हमें राजनीति या दार्शनिक दायरों से हटाकर जमीनी संदर्भों में देखनी चाहिए। कलासृजन से मर्यादा न टूटे, साहित्य समाज का दर्पण है, कला सदैव मंगल कामना से प्रेरित होती है, विद्या वही है जो विमुक्त करे, या छोटा परिवार सुख का आधार… इस तरह की अमूर्त उक्तियों को लेकर हमारे यहां इस बाबत विवाद नहीं हुआ, वजह यह कि दार्शनिक और अमूर्त सूक्तियों को हर धड़े द्वारा अपनी-अपनी इच्छानुसार परंपरासम्मत या परंपरा-विरोधी साबित किया जा सकता है। असली दिक्कत तब शुरू होती है, जब लगातार अपनी मूल लोक जड़ों से कट रहे मध्यवर्गीय शहरियों के बीच यही मान्यताएं किसी तरह की मूर्त कलाकृति का रूप लेकर आती हैं। जब अपनी कलाकृति द्वारा लिंबाले, हुसेन या भंसाली सरीखा कोई दिखाता है कि आज के वक्त में हमारे अमुक मिथक और सुंदरता का एक नए तरह का चेहरा यह भी तो बन सकता है, खुद को शिष्ट मानने वाले समाज के भीतर भी कई स्तरों पर परंपरा को लेकर किस-किस स्तर पर किस तरह का सोच बन रहा है, तब हमारे यहां उस पर संजीदगी से विचार करने और अपने ज्ञान में नया जोड़ने की जगह जनभावनाएं आहत होने का हल्ला मचाते हुए थिराये ज्ञान को चुनौती दे रही कला पर ही ताला जड़ दिया जाता है।

श्लील या अश्लील का सवाल हर परंपरा में सीधे सुरुचि और संस्कृति से जाेड कर परखा जाता रहा है। अत: ऐसे विवादों का अंतिम फैसला तो जनता की अदालत में उस कला की पेशी से ही होना है। सरकारी कानूनों या जबरन लगवाए प्रतिबंध से नहीं। तभी जानकार लोग कह रहे हैं कि फिल्म उड़ता पंजाब की ही तरह बतंगड़ के बाद जैसे ही भंसाली की फिल्म रिलीज हुई, हिट हो जाएगी। और रिलीज से पूर्व ही नई-नवेली कुलवधुएं अपने लिए दीपिका पादुकोण वाला लुक और पोशाकें छांटने भी लगी हैं। कंडोम के विवादित विज्ञापन को टीवी पर दिखाए जाने से भी अंतत: सुश्री सनी लियोन के कॅरियर को फायदा ही हुआ है। यानी कुल मिलाकर जिसे पिया चाहे, वही सुहागिन! अश्लील शब्द के अंग्रेजी पर्याय वल्गर शब्द का मूल (लातिन) शब्द है ‘वल्गस, जिसका मतलब है आमफहम यानी जनता छाप। उधर संस्कृत में अश्लील पर शब्दकोष की व्याख्या है, ‘यो श्रियं न लाति, यानी अश्लील का मतलब है वह, जिसमें कांति नहीं। अस्तु!

सौ बात की एक बात यह कि हर संस्कृति व उसके प्रमाण माने जाने वाले धर्मग्रंथों में स्त्री-पुरुष के बीच यौन संबंध पृथ्वी पर जीवन के सृजन और निरंतरता की इकलौती गारंटी और पाशविकता तथा मानवीयता के बीच सबसे बड़ी विभाजक रेखा बनाने वाले माने गए हैं। जभी हमको मिथुनों के शिल्पाकार पुराने मंदिरों के बाहर दिखते हैं और लिंगपूजन को हम सब श्रद्धा से ग्रहण करते हैं वर्जनीय नहीं मानते। हमारे देश के एक अल्पचर्चित, किंतु मर्मी चिंतक विजयदेव नारायण साही एकदम सही लिखते हैं, हमारे यहां एक खास तरह का दिमाग हर कलाकृति को इस कसौटी पर कसना चाहता है कि क्या इसे बहू-बेटियों के हाथों में दिया जा सकेगा? क्या गुरुजन इसे अपने शिशुवत छात्रों को पढ़ा-दिखा सकते हैं? इसका आशय तो यह निकला कि साहित्य या कला का सृजन बहू-बेटियों तथा शिशुवत दिमाग वालों के लिए ही किया जाना चाहिए। कहना न होगा कि इस कसौटी पर कालिदास से लेकर रवींद्रनाथ तथा प्रेमचंद सभी का साहित्य खेत रहेगा। और कई कलाकृतियां और शास्त्रीय तथा लोक-संगीत की अनगिनत दुर्लभ बंदिशें जनविरोधी तथा अमान्य करार देकर आग में झोंकने योग्य बता दी जाएंगी।

स्मरणीय है कि पारंपरिक भारतीय कला या दर्शन की तहत सेक्स वर्जित या अमंगलकारी नहीं, सहज जीवन का एक सुंदर स्फुरण है। इस बाबत टीवी देखकर मन में आए सवाल पूछने पर बच्चों को सिटपिटाहटभरे गुस्से की बजाय साफ-सुथरे वैज्ञानिक उत्तर मिलें, यही उचित है। शरीरों के उन्मुक्त चित्रण और यौन जीवन को लेकर सहज बालसुलभ उत्सुकता जीवन का आदिस्रोत पहचानने व जीवन को भरपूर जीने की मानवीय ललक का ही सहज फल है। कई बार जितनी सहजता व संवेदनशीलता से एक कला इन सवालों का जवाब दे सकती है, वह कई सौ सरकारी बाबू, नेता या मनोचिकित्सक नहीं कर पाएंगे।

मृणाल पांडे
(लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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