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आखिर खत्म हुआ चिकित्सकों का हड़ताली हठयोग

राजस्थान में विगत 12 दिनों से चल रही चिकित्सकों की हड़ताल आखिरकार बुधवार को विभिन्न मांगों की सहमति के बाद समाप्त हो गई। तकबरीन पचास मरीजों की जिंदगियां लीलने के बाद खत्म हुई चिकित्सकों की हड़ताल में मरीजों सहित उनके परिजनों ने बहुत कुछ खोया। लंबे समय तक राज्य की सरकार का चिकित्सकों की मांग को लेकर ना-नुकर वाला रवैया आखिरकार हां में बदल ही गया। जिससे चिकित्सकों में खुशी की लहर नजर आने लगी। वहीं, गुरुवार को चिकित्सकों का अपनी ड्यूटी पर लौटने से मरीजों के चेहरे पर भी खुशी की झलक देखने को मिलीं। आपको बातते चले कि चिकित्सकों के इस हड़ताली हठयोग को तोड़ने में परिवहन मंत्री यूनुस खान और सहकारिता मंत्री अजय सिंह किलक की महत्चपूर्ण भूमिका रही। जिन्होंने चिकित्सकों और सरकार के बीच वार्ता का सेतु बनाने का अंतिम समय तक प्रयास किया। और आखिरकार बुधवार रात आठ बजे भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी की मौजूदगी में चली मैराथन बैठक में समझौता पत्र में सभी मांगों पर दोनों पक्षों की सहमति बनने के बाद हड़ताल तोडने की घोषणा हुई। समझौता पत्र के तहत चिकित्सकों की सामूहिक अवकाश की अवधि को उपार्जित अवकाश में समायोजन करने, रेस्मा के तहत दर्ज प्रकरणों में वर्ष 2011 के उपरांत राज्य सरकार के अनुरूप अपनाई गई प्रक्रिया के अनुरूप सभी प्रकरण वापस लिये जाने व प्रशासनिक विभागीय कार्रवाई समाप्त करने, 12 नवम्बर को हुए समझौते को शत प्रतिशत लागू किया जाने व बिंदू संख्या 6 के अनुसार अतिरिक्त निदेशक के पद पर चिकित्सक पदस्थापित करने सहित कई मांगों पर सहमति बनी। साथ ही निर्णय लिया गया कि डीएसीपी के आदेश पर विरोधाभास पाए जाने पर परीक्षण मंत्रिमंडलीय उपसमिति द्वारा किया जाएगा। हड़ताल की प्रमुख वजह चिकित्सक नेताओं के तबादला बने थे जिसमें सेवारत चिकित्सक संघ के अध्यक्ष अजय चैधरी का करौली में स्थानांतरण किया गया था। वार्ता व समझौते पर सहमति के बाद डॉ. अजय चैधरी का करौली हुआ तबादला तुरंत प्रभाव से निरस्त कर उन्हें सीएमएचओ सीकर लगाया गया। ऐसे में सवाल यह है कि जब प्रदेश सरकार को चिकित्सकों की सभी मांगे माननी ही थी तो इतने दिनों तक मरीजों की जान के साथ क्यों खेलती रही ? अगर मांगे जायज थी तो सरकार को पहले नहीं मान लेनी चाहिए थी ? आखिरकार चिकित्सकों और सरकार के बीच चले इस घमासान में यदि मारे गये तो वे पचास मरीज जिनकी जिंदगी समय रहते बचायी जा सकती थी। सवाल तो यह भी है कि आखिर कोई चिकित्सक मरीज का इलाज करने से कैसे मना कर सकता है ? भगवान का दर्जा दिए जाने वाले चिकित्सकों का अपनी मांगे मनवाने के लिए हड़ताल का तरीका तो किसी भी हाल में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। गौरतलब है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एमबीबीएस छात्रों से 5 सालों में औसतन 14 हजार फीस लेने के बाद हर विद्यार्थी पर सरकार 64 लाख रूपए का खर्चा करती है। सरकारी सेवाओं में जाने के बाद 60 हजार रूपए प्रति माह का वेतन देती है। उसके बाद भी उनका इस तरह हठ करना कहां तक न्याय संगत है ? मानवता के प्रति चिकित्सक इतने उदासीन कैसे हो सकते है ? ऐसे में यह कहना भी गलत नहीं है कि एक तरफ तो सरकार सरकारी चिकित्सकों को रहने के लिए सरकारी घर, भत्ता, धोबी आदि का खर्चा मुफ्त दे रही है वह भी मोटे वेतन के साथ। उसके बाद भी इस तरह की हरकतें शर्मनाक है। जरूरत है कि आगे इस तरह की स्थिति से बचा जाएं। सरकार चिकित्सकों को हड़ताल करने की नौबत ही ना आने दे तथा चिकित्सक भी हड़ताल जैसे तरीके से इंतहा करे। चलते-चलते, अफसोस इस बात का नहीं है कि मौत बेरहम है। अफसोस तो इस बात का है कि अस्पताल बेरहम क्यों है ?

देवेंद्रराज सुथार
स्थानीय पता – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025
मोबाइल – 8107177196

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