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कानूनी जद में तीन तलाक

आज से करीब चार माह पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एतिहासिक निर्णय में तीन तलाक को अमान्य व असंवैधानिक करार देकर, इस मसले को कानूनी जद में लाने का रास्ता साफ कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय को हथियार बनाकर केंद्र की मोदी सरकार ने बुधवार को संसद में तीन तलाक पर बनें बिल को पास कर दिया है। बिल के पास होने पर खासकर मुस्लिम महिलाओं ने ईद के जश्न की तरह स्वागत कर आपस में मिठाईयां बांटकर खुशियां मनाई। बिल के अमल में आने पर मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक, 2017 नामक इस बिल के प्रावधान के मुताबिक इस्लाम धर्म में कोई भी शख्स यदि अपनी पत्नी को फौरन तीन तलाक किसी भी माध्यम से देगा तो उसे तत्काल तीन वर्ष तक की कैद हो सकती है। इसके साथ जुर्माने का भी प्रावधान तय किया जाऐगा। लेकिन दुख इस बात का है िकइस नजीर फैसले पर भी लोग बेजा विरोध दर्ज करा रहे हैं।
संसद में बुधवार को जब तीन तलाक पर चर्चा शुरू हुई तो पूरी दुनिया की नजर इस मुद्दे पर थी। खासकर इस्लामिक देशों की। दरअसल दूसरे इस्लामिक मुल्क इसे अपने धर्म में बेवजह का दखल मान रहे हैं। वह कतई नहीं चाहते थे कि तीन तलाक पर कानून बनें। देश के मुल्ले-मौलवियों की ससंद में पेश होने वाले बिल पर टिकटिकी लगी थीे। दरअसल रूढीबादी सोच के लोग चहाते ही नहीं थे कि तीन तलाक कानूनी जद में आए। सदियों से चली आ रही उनकी मनमानी पर ब्रेक न लगे। बिल पेश किए जाने के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है। कई सियासी लोग और धार्मिक नेता इसका विरोध कर रहे हैं। इनके अलावा तीन तलाक के खिलाफ लोकसभा में बिल पास होते ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने ऐलान किया है कि वह इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करेंगे। मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की लीगल एक्सपर्ट्स की टीम ने इस कानून की समीक्षा की है जिसमें उसे खामियां नजर आई हैं। उनकी माने तो इस कानून के कुछ प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ हैं।
संसद में जब बिल पेश किया गया तो सत्तापक्ष और विपक्षी दलों में खासी नोकझोक हुई। तीन तलाक संबंधी विधेयक पर लोकसभा में चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर और एआईएमआईएम के नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी के बीच काफी देर तक तीखी नोकझोंक होती रही। मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक, 2017 पर चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए एमजे अकबर ने शाह बानो प्रकरण का हवाला दिया तो ओवैसी ने उनरो उसी दौरान उनको टोका और कहा कि उस वक्त आपने उस कानून (राजीव गांधी के समय) को पारित कराया था। इस पर अकबर ने कहा कि मेरे दोस्त को शायद यह पता नहीं है कि वह 1989 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। उनके इस कथन पर सत्तापक्ष के सदस्यों ने स्वागत में मेज थपथपाई। सर्वविधित है कि शाह बानो प्रकरण 1985 का है, जिसमें शाह बानो को उसके पति ने तलाक दे दिया था और उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में पीड़िता के लिए मासिक गुजारा भत्ते का आदेश दिया। इस आदेश के विरोध में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ मुस्लिम संगठनों ने आंदोलन किया, जिसके बाद राजीव गांधी की सरकार इसके खिलाफ कानून लेकर आई।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई अन्य संगठनों को इस बात पर आपत्ति है कि बिल लाने से पहले सरकार ने संबंधित पक्षों से राय-मशविरा नहीं किया। लेकिन विपक्षी राजनीतिक दल बिल की जरूरत को स्वीकार करते हुए बिल के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति कर रहे हैं। कांग्रेस ने एक बार में तीन तलाक का दावा साबित करने का जिम्मा पीड़ित महिला के बजाय पति पर डालने का सुझाव दिया है। उसकी एक बड़ी आपत्ति सजा वाले प्रावधान पर भी है। तीन तलाक पर बनें कानून पर कुछ बुनियादी सवाल जबाव मांग रहे हैं। कहीं इसका दुरूपयोग न होने लगे। झूठे केसों की आड़ में इसका गलत इस्तेमाल न होने लगे। तलाक देने की कार्रवाई पर जब पति के जेल चला जाएगा तो उसके बाद पत्नी और बच्चों के भरणपोषण कैसे होगा। ऐसी कुछ आशंकाएं हैं जिससे मुस्लिम महिलाएं ऐसे मामलों में सामने आने से बचेंगी।
मौजूदा कानून में अभी एक बात साफ नहीं की गई है। कार्रवाई के बाद मुस्लिम महिला अपने पति की संपत्ति से गुजारा भत्ता ले सकती है या नहीं, इस बारे में प्रस्तावित कानून में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। इस मामले में तलाक अधिकार संरक्षण कानून, 1986 भी लागू नहीं होगा, क्योंकि वह तलाक के बाद की स्थिति में गुजारा भत्ते के लिए बनाया गया था। हां, महिला सीआरपीसी की धारा-125 के तहत भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है, लेकिन पति अगर जेल में होगा और उसकी आमदनी ही रुकी होगी तो वह गुजारा भत्ता कैसे देगा, दूसरी तरफ यह बुनियादी सवाल है ही कि सजा के खौफ के बिना फौरन तीन तलाक का सिलसिला रुकेगा कैसे? मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पक्षों पर विचार होना चाहिए।
फैसला निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। भविष्य में नजीर साबित होगा। लेकिन इसमें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड जो आशंकाएं जाहिर कर रहे हैं। उनकी भी बात सुननी चाहिए। इसलिए केंद्र सरकार को जल्दबाजी की जरूरत नहीं है। तलाक पीड़ित तबके को राहत देने की उसकी कोशिश सराहनीय है, लेकिन बदलाव थोपा हुआ नहीं लगना चाहिए। थोड़ी देर और सही, पर एक कारगर व्यवस्था सामने आनी चाहिए ताकि मुस्लिम महिलाओं को वास्तव में न्याय मिल सके। अभी इस बिल को विचार-विमर्श के लिए संसदीय समिति को सौंपकर समाज में भी इस पर बहस तेज की जानी चाहिए। क्योंकि कोई भी कानून जब संसद पटल पर आता है और उसके अमलीजामा पहनाया जाता है। उसमें कई खामियां होती हैं जिसे बाद में संसोधित किया जाता है। अगर तीन तलाक कानून में कुछ विसंगतियां हैं तो उसे सुधारा जाना चाहिए। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड कोर्ट जाने की बात कर रहा है उससे पहले उनकी बात सुननी चाहिए। हो सकता है उनका मसला बातचीत से ही हल हो जाए। लेकिन कुछ भी हो फैसले से तकरीबन मुस्लिम महिलाएं खुश हैं। उनकी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं है जो तलाक का दंश झेल चुकी हैं।

रमेश ठाकुर

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