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कम उम्र में एकाकी जीवन की राह पर महिलाएं

कम उम्र में तन्हाई की जिंदगी जीने वाली महिलाआंे की तादाद मंे बढ़ोतरी बेेहद चिंता का विषय है। देश में सात करोड़ से अधिक महिलाओं का अकेली रहना कहीं ना कहीं हमारे सामाजिक ताने-बाने पर प्रश्नचिन्ह उभारने के लिए काफी है। 2011 के आंकड़ों का ही विश्लेषण करे तो पाएंगे कि देश में 7 करोड़ 11 लाख महिलाएं एकाकी जीवन जी रही है। सबसे चिंतनीय बात यह भी है कि इनमंे से 25 से 29 वर्ष आयुवर्ग की महिलाएं अधिक है। 20 से 24 आयु वर्ग की भी एक करोड़ से अधिक महिलाएं अकेली रह रही है। एक करोड़ से अधिक अकेली रहने वाली महिलाओं के साथ जहां उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है तो महाराष्ट्र् में भी 62 लाख से ज्यादा महिलाएं एकाकी जीवन बिता रही है। मजे की बात यह है कि यह सब तब है जब देश में शादी की औसत आयु 19 से बढकर 21 वर्ष हो गई है। यानी कि अब अधिक परिपक्व अवस्था मंे शादियां हो रही हैं। शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है, रोजगार के अवसर बढ़े हैं। यह भी सही है कि पिछले वर्षों में महिला आत्म निर्भरता का स्तर बढ़ा है। इसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि सब कुछ के बाद भी समाज मेें खासतौर से शहरीकरण से महिलाओं के प्रति असहिष्णुता या यों कहें कि महिला उत्पीड़न के आंकड़ों में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
अकेली रहने वाली महिलाओं की संख्या में बढोतरी कहीं ना कहीं हमारे बदलते पारिवारिक रिश्तों की दास्तान कहती है। इससे यह भी लगने लगा है कि देश में सामाजिक पारिवारीक व्यवथा तेजी से छिन्न भिन्न होने लगी है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार लेता जा रहा है। न्यूक्लियर फैमेली के कारण अलग तरह की समस्याएं उभर रही हैं। दादा-दादी या नाना-नानी का साथ अब बीते जमाने की बात होती जा रही है। कहने को केवल कुछ प्रतिशत ही हो पर नौकरीपेशा दंपतियों के बच्चों का तो अभिभावकों का साथ कुछ लम्हों का ही होने लगा है। पति-पत्नी दोनोें के नौकरी पेशा होने और बच्चों को क्रेच या बाईयों के भरोसेे छो़ड़ने से बच्चों में पारिवारीक रिश्तों का महत्व खोता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा और पैसा इस कदर हमारी व्यवस्था पर हाबी होता जा रहा है कि रिश्तों की परिभाषाएं बदलती जा रही है। संस्थागत पारिवारीक व्यवस्था प्रश्नों के घेरे में आती जा रही है। अधिक पैकेज के चलते घर छूटते जा रहे हैं। अब तो कार्य स्थल पर ही एक तरह के समझौते के तहत लिव इन रिलेशनशिप बढ़ती जा रही है। प्रतिस्पर्धा, काम का अत्यधिक दवाब, अधिक से अधिक प्राप्त करने की लालसा में जिन्दगी के मायने बदलते जा रहे हैं। संवेदनशीलता और सहिष्णुता बीते जमाने की बात होती जा रही है। इसका परिणाम पारिवारीक जीवन मंें बिखराब के रुप में सामने आ रहा है। यही कारण है कि विवाह विच्छेद अब अधिक होने लगे हैं। अब एक झटके में अकेले रहने का निर्णय हो जाता है। काम के बोझ और प्रतिस्पर्धा का दबाव इस कदर हाबी होने लगा है कि भागम भाग में दो मीठे बोल को भी सप्ताहांत तक के लिए तरश जाते हैं। इसे तीन तलाक के संदर्भ में भी देखा जाना आवश्यक हो जाता है कि यह समस्या अब मुस्लिम महिलाओं तक ही सीमित नहीं होकर सभी वर्गो में समान रुप से होने लगी है।
पिछले एक दशक में महिलाओं के अकेले रहने की प्रवृति बढ़ी है। 2001 में करीब 5 लाख महिलाएं एकाकी जीवन व्यतित करती थी। एक दशक में ही करीब 39 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। चैकानें वाले या यों कहें कि चेताने वाले आंकड़े यह है कि कम उम्र में एकाकी जीवन बढ़ा है। इनमें अविवाहित, विधवा एवं परित्यक्ता सभी तरह की महिलाएं शामिल है। आधी दुनिया में अकेले रहने की बढ़ती प्रवृति के पीछे मूलतः महिलाओं के प्रति हिंसा खासतौर से घरेलू हिंसा प्रमुख कारण है। इसके अलावा अब महिलाएं आर्थिक दृष्टि से आत्म निर्भर होने में अधिक विश्वास रखती है। घरेलू हिंसा के मायने भी बदल गए है। यह अब पति-पत्नी या सास बहू की ही नहीं घर में लडकियों के साथ हिंसा बढ़ी है। देखा जाए तो लाख उपायों के बावजूद कार्य स्थल पर भी महिला उत्पीडन बढ़ा है। सरकार ने घरेलू हिंसा और कार्यस्थल सहित महिलाओें के प्रति हिंसा पर रोक लगाने के कारगर प्रयास किए हैं। पर इसके परिणाम अधिक सार्थक नहीं मिल पाएं हैं। निर्भया के बाद भी देश में कोई बदलाव नहीं आया है अपितु महिला उत्पीडन के मामलों में लगातार बढ़ोतरी ही देखने को मिल रही हैं। आंकड़े की तो यही जुवानी है। कहीं ना कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था भी दुषित हुई है। क्योंकि शिक्षा से जहां परिपक्वता, संवेदनशीलता, सहनशीलता, परिस्थितियांे से संघर्ष करना जैसे नैसर्गिक गुण आने चाहिए, उसकी जगह अब प्रतिस्पर्धा, कुंठा, लालसा, ऐन-केन प्रकारेण अधिक से अधिक प्राप्त करना आदि इस तरह की भावनाएं लेती जा रही है जिससे कुछ हद तक स्वतंत्रता की जगह स्वछंदता हो गई है। युवाआंे में टाॅलरेंस पावर कम हो रही है। एक दूसरे की सुनने की आदत कम हो रही है। ऐेसे में समाज को सोचना होगा कि आधी दुनिया परिवार से अलग एकाकी जीवन की और क्यों बढ़ रही है? क्या कारण है कि अकेले रहने की मानंिसकता बढ़ती जा रही है? कहीं ना कहीं घरेलू हिंसा सहित महिलाओं के प्रति हिंसा के कारणों को खोजना व उनके निराकरण के उपाय करने होंगे। आर्थिक आत्म निर्भरता के कारण भी महिलाएं अकेली रहने में संकोच नहीं करती है। पर अकेले रहने के कारणों और एकाकी महिलाओं की समस्याओं को भी समझना होगा। अकेले आर्थिक निर्भरता को इसका कारण नहीं माना जा सकता। जो घर परिवार कभी संरक्षण का केन्द्र माना जाता था उसकी जगह आज की महिलाओं द्वारा एकाकी जीवन अपनाना कहीं ना कहीं हमारी व्यवस्था में बिखराव, सामाजिक मूल्यों का ह्रास दिखा रही है। समाज विज्ञानियों के लिए यह अपने आप मेें गंभीर चिंतन का विषय है।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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