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जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना है नई सरकार के लिए बड़ी चुनौती

हिमाचल प्रदेश में परम्परागत रूप इस बार भाजपानीत सरकार का गठन हुआ है. भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हार जाने के बाद धूमल विरोधी धड़ा सक्रिय हो गया था. हालांकि धूमल ने चुनाव हारने के तुरंत बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए खुद को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर बताते हुए फैसला हाईकमान पर छोड़ दिया था. चुनाव परिणाम के दिन ही धूमल विरोधी गुट (जिसकी अगुवाई शांता कुमार और जे पी नडडा करते हैं) सक्रिय हो गया था और पहले दिन से ही जयराम ठाकुर का नाम चलाया गया और अंतत: पांच दिन की कशमकश के बाद जयराम ठाकुर के नाम पर मोहर लग गई. जयराम ठाकुर के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो चुका है लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद मंत्रिमंडल से हमीरपुर, बिलासपुर, चम्बा, सिरमौर आदि जिलों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है और कांगड़ा तथा मंडी जिलों को सर्वाधिक तरजीह दी गई है. नए मंत्रिमंडल में संतुलन साधने की बजाय शांता कुमार और नडडा की राय को तरजीह दी गई है. नई सरकार के गठन से ऐसा लगता है कि भाजपा आलाकमान और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने आरएसएस और शांता कुमार और नडडा के दबाव में कई चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया है और पूर्व मुख्यमंत्री धूमल के कहने पर एकाध मंत्री को अंतिम समय में मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है जो इस बात का संकेत है कि पार्टी में अंदरखाने चिंगारी सुलग रही है जो 2019 के लोकसभा चुनावों में सुलगती दिखाई देगा. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी भलीभांति जानते हैं कि प्रदेश 50 हजार करोड़ का कर्ज में दबा है. 10 लाख से ज्यादा बेरोजगार नौकरी की तलाश में हैं. इसके अलावा राज्य सरकार के आय-व्यय में भारी अंतर है. राज्य सरकार की कमाई से दुगना उसका खर्चा है. अभी सरकार का गठन किये हुए दो सप्ताह हुए हैं और सरकार के कामकाज को समझने में समय लगेगा लेकिन मुख्यमंत्री के बयान से लगता है कि राज्य को कर्जमुक्त करने का उनके पास कोई समाधान नहीं है और इसके लिए उन्हें केन्द्र सरकार से बेल-आऊट पैकेज का जरूरत है, जिसकी जरूरत और मंशा वह जता चुके हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य और केन्द्र में एक ही पार्टी की सरकार होने का लाभ प्रदेश को मिलेगा. रोजगार के मोर्चे पर अभी सरकार की कोई योजना सामने नहीं आई है और इसके लिए बजट सत्र तक इंतजार करना होगा. सामाजिक सुरक्षा के तहत वृद्धावस्था पेंशन की आयु 80 वर्ष से घटाकर 70 करने का ऐलान कर चुकी है लेकिन क्या इसे पूर्ववर्ती सरकार की तरह बिना किसी भेदभाव तथा आयु सीमा के दिया जायेगा, इसमें अभी संदेह है लेकिन कर्मचारियों का मंहगाई भत्ता बढ़ाने और पेंशन की आयु कम करने से खजाने पर बोझ पड़ेगा लेकिन सरकार को इसकी व्यवस्था अपनी आय से करनी चाहिए.
मतदाताओं ने इस बार उन नेताओं का चुनाव किया है जो सीधे तौर पर जनता से जुड़े रहे हैं. नव गठित सरकार से प्रदेश की जनता की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं. जयराम के नेतृत्व में सरकार का गठन होने के बाद कुछ लोक लुभावन फसलों के बाद बादलों का दौर शुरू हो गया है. मुख्यमंत्री कार्यालय में हुई ताजा नियुक्तियों में आरएसएस की छाप साफ दिखाई दे रही है और अब यह माना जा रहा है कि नई सरकार में संघ से जुड़े एजेंडे पर जोर दिया जाएगा. अभी सरकार के मंत्री स्वागत-समारोहों और जश्न में व्यस्त हैं. नई सरकार को तमाम चुनौतियों से निपटते हुए प्रदेश की जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए ईमानदारी से प्रयास करना होगा. भाई-भतीजावाद से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मंहगाई को दूर करने के लिए सार्थक कदम उठाने होंगे. प्रदेश को कर्जमुक्त करने और निवेश बढ़ाने के उपाय करने होंगे. पर्यटन और कृषि क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों को भुनाने के लिए प्रदेश की भूगौलिक संरचना के आधार पर योजनाओं को कार्यान्वित करना होगा. प्रदेश के करीब 10 लाख से ज्यादा युवा बेरोजगारों को नई सरकार से उम्मीद है कि वह रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी ताकि अधिक से अधिक युवाओं को प्रदेश में ही रोजगार या स्वरोजगार का अवसर मिल सके. सबसे बड़ी चुनौती सरकार पर बढ़ते कर्ज के बोझ को कम करना है और इसके लिए सरकारी खर्चों में कटौती तथा राजस्व प्राप्ति के नए विकल्पों की तलाश करनी होगी. सरकार पर आज 45 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज है. सरकार को इस कर्ज का 62 प्रतिशत करीब 28 हजार करोड़ अगले 7 वर्षों में चुकाना है, जिससे पार पाना सरकार के लिए बेहद मुश्किल है. आज हर हिमाचली पर पैदा होते ही करीब 58 हजार का कर्ज चढ़ जाता है. आर्थिक दृष्टि से प्रदेश की माली हालत खराब है. नई सरकार के लिए प्रदेश को कर्ज के जाल से बाहर निकालना, बेरोजगारी का हल खोजना, कानून-व्यवस्था चुस्त-दुरूस्त करना और प्रदेश में बढ़ रहे ड्रग माफिया का सफाया करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि जनता का खोया हुआ विश्वास बहाल हो सके.
पिछले दो वर्षों से पर्यावरणीय जटिलताओं के चलते लटके केन्द्र सरकार के पास अटके लगभग 200 मिनी व माइक्रो हाइडल प्रोजेक्टों को गति देने से प्रदेश का विकास सुनिश्चित होगा. टूरिज्म की 9 बड़ी परियोजनाओं के लिए कड़ी शर्तों के चलते पिछले 10 साल से निवेशक नहीं मिल पा रहे हैं. बिजली महादेव, नयनादेवी, शाहतलाई, न्यूगल रोप वे प्रोजेक्ट सिर्फ कागजों तक सीमित हैं. कड़ी शर्तों के कारण करीब 40 हाइड्रो प्रोजेक्ट पिछले 5 वर्षों से भी ज्यादा समय से लटके पड़े हैं. पर्यटन से संबंधित 9 बड़ी परियोजनाओं के लिए 2004 से अब तक पांच बार टेंडर निकाले जा चुके हैं लेकिन इनके लिए निवेशक ही नहीं मिल रहे हैं. पर्यटन विभाग जमीन उपलब्ध करा रहा है लेकिन एनओसी के लिए निर्धारित कड़ी शर्तें और करोड़ों की धरोहर राशि के कारण निवेशक इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं. इसमें फोसिल पार्क, गोल्फ कोर्स, हैल्थ टूरिज्म, साहसिक पर्यटन, वाटर स्पोर्ट्स व होटल से लेकर अर्बन हार्ट जैसी योजनाएं शामिल हैं. प्रदेश में पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है लेकिन ढांचागत सुविधाओं और संसाधनों की बेहद कमी है. पर्यटकों की भारी भीड़ मुख्यतः शिमला, कुल्लू-मनाली और धर्मशाला तक सिमटी है जिसके कारण इन शहरों में ट्रैफिक का दबाव और पार्किंग जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी है. पर्यटन की दृष्टि से नए स्थानों को चिन्हित करके उनका विकास करने तथा विशेष प्रोत्साहन योजनाएं चलाने से पर्यटन उद्योग के रूप में विकसित हो सकेगा. रेल और हवाई सेवाएं सीमित होने के कारण सड़कों के विकास और रखरखाव पर अधिक बल देना होगा. रेल लाइनों के विस्तार के साथ ही नए पर्यटन स्थलों को विकसित करने की जरूरत है ताकि पर्यटकों की भीड़ सिर्फ शिमला, कुल्लू-मनाली और धर्मशाला तक सीमित न रहे. पिछली सरकार ने हिमाचल दर्शन के लिए हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने की घोषणा की थी, कई हेलीपैडों का निर्माण भी करवाया लेकिन योजना आगे नहीं बढ़ सकी. इनका निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से शुरू किया गया है. नई सरकार को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर इसे आगे बढ़ाना चाहिए. पर्यटन विकास की दृष्टि से धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास पर ध्यान देने की जरूरत है. अधिकतर बड़े धार्मिक स्थलों का सरकार द्वारा अधिग्रहण करने के बावजूद उनका विस्तार नहीं हो पाया है.
भाखड़ा बांध की बिजली पर मिलने वाली रायल्टी का मुद्दा कई दशकों बाद भी हल नहीं हो पाया है जिसके चलते प्रदेश को 4200 करोड़ की रकम नहीं मिल पा रही है, जो बीबीएमबी में 7.19 प्रतिशत की दर से हिस्सेदार राज्यों द्वारा देय है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद पड़ोसी राज्य देय रकम का भुगतान नहीं कर रहे हैं. केन्द्र, हरियाणा तथा अब हिमाचल में भाजपा की सरकार बनने पर उम्मीद की जा रही है कि बद्दी-चंडीगढ़ प्रस्तावित रेल नेटवर्क गति पकड़ेगा. अब तक हरियाणा, पंजाब जमीन देने में आनाकानी करते आये हैं. औद्योगिक निवेश के बढ़ाने के लिए राज्य सरकार को केन्द्र की मदद की जरूरत है. औद्योगिक पैकेज के तहत पुरानी परियोजनाओं पर 2020 तक ही छूट प्राप्त है. नई परियोजनाओं पर कोई राहत नहीं है, इसलिए औद्योगिक निवेश बढ़ाने के लिए विभिन्न विकल्पों की तलाश करने की जरूरत है ताकि राजस्व बढ़ने के साथ ही रोजगार के मौके भी बढ़ें. निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सिंगल विंडो प्रणाली लागू करने की जरूरत है ताकि परियोजनाओं के जल्दी मंजूरी मिले और भ्रष्टाचार पर लगाम लग सके. विभिन्न विभागों से मंजूरी हासिल करने में वर्षों से कई परियोजनाओं पर काम ही शुरू नहीं हो सका है. केन्द्रीय विश्वविद्यालय स्थापना का मुद्दा पिछले 6 वर्षों से लटका है. भाजपा-कांग्रेस इसपर राजनीति करते आये हैं और यह मुद्दा एक बार फिर उछलेगा. इस विश्वविद्यालय को लेकर नई जयराम सरकार देहरा में ही बनाएगी या फिर इसे कहीं और स्थापित करने पर चर्चा शुरू होगी. आर्थिक तंगी और केन्द्र से तनातनी के चलते करोड़ों की सुरंग परियोजनाएं पिछले एक दशक से अधर में हैं. नेशनल हाइवे के कई प्रोजेक्ट लटके हुए हैं. दोनों जगह भाजपा की सरकारें होने से इनमें तेजी आने की उम्मीद है. शिमला-कालका रेल ट्रैक सुधारने की योजना अब तक सिरे नहीं चढ़ी है. इस हेरिटेज रेल लाइन का नवीनीकरण होने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. मोदी सरकार आने के बाद रेलवे लाइनों के विस्तार की अपेक्षा की जा रही थी और कुछ विस्तार योजनाओं का खाका तैयार भी हुआ है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि केन्द्र और राज्य सरकार में समन्वय के चलते भानुपल्ली-बिलासपुर रेललाईन लेह तक बनेगी. बद्दी औद्योगिक क्षेत्र से चंडीगढ़ से जुड़ेगा और जोगिंद्रनगर-पठानकोट नैरोगेज लाइन ब्रॉडगेज होगी. ऊना से हमीरपुर तक रेललाइन विस्तार को मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे भी गति मिलने की उम्मीद है. रेल लाइनों के विस्तार से न केवल निवेश बढ़ेगा बल्कि पर्यटन एवं व्यापार के भी गति मिल सकेगी.

विजय शर्मा

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