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बुजुर्गों की व्यथा कथा : मानवता फिर हुई शर्मसार

बुजुर्गों को लेकर मानवता एक बार फिर शर्मसार हुई है। गुजरात के राजकोट से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली वारदात सामने आई है। यहां एक बेटे ने अपनी बुजुर्ग और बीमार मां को छत से फेंककर मार डाला । आरोपी बेटा असिस्टेंट प्रोफेसर है। । भारत में कभी बुजुर्गों की पूजा की जाती थी। बुजुर्ग घर की आन बान और शान थे। बिना बुजुर्ग को पूछे कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता था। आज वही बुजुर्ग अपने असहाय होने की पीड़ा से गुजर रहा है। दुर्भाग्य से उसे यह मर्मान्तक पीड़ा देने वाले कोई और नहीं अपितु उनके परिजन ही है।
बुजुर्गो का सम्मान करने और सेवा करने की हमारे समाज की समृद्ध परंपरा रही है। समाचार पत्रों में इन दिनों बुजुर्गों के सम्बन्ध में प्रकाशित होने वाले समाचार निश्चय ही दिल दहला देने वाले हैं। राम राज्य का सपना देखने वाला हमारा देश आज किस दिशा में जा रहा है, यह बेहत चिंतनीय है। भारत में बुजुर्गों का मान-सम्मान तेजी से घटा है। यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अवमूल्यन है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएं क्या है और उनका निराकरण कैसे किया जाये इस पर गहनता से मंथन की जरूरत है। आज घर घर में बुजुर्ग है। ये इज्जत से जीना चाहते है। मगर यह कैसे संभव है यह विचारने की जरूरत है।
रिसर्च एंड एडवोकेसी सेंटर ऑफ एजवेल फाउंडेशन के एक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ कि हमारी युवा पीढ़ी न केवल वरिष्ठजनों के प्रति लापरवाह है, बल्कि उनकी समस्याओं के प्रति जागरूक भी नहीं है। वह पड़ोस के बुजुर्गों के सम्मान में तो तत्पर दिखती है लेकिन अपने घर के बुजुर्गों की उपेक्षा करती है, उन्हें नजरअंदाज करती है। सर्वेक्षण के अनुसार 59.3 फीसद लोगों का मानना है कि समाज व घर में बुजुर्गों के साथ व्यवहार में विरोधाभास है। केवल 14 फीसद का मानना है कि घर-बाहर, दोनों जगह बुजुर्गों की हालत में कोई अंतर नहीं है जबकि 25 फीसद मानते हैं कि घर में बुजुर्गों का सम्मान खत्म हो गया है।
एक सर्वे रिपोर्ट बताती है कि देश के दो-तिहाई बुजुर्ग तिरस्कृत जीवन जीने को विवश हैं। एक सामाजिक-स्वैच्छिक संगठन द्वारा किए गए सर्वेक्षण के दौरान करीब पांच हजार बुजुर्गों से बातचीत की गई, जिसमें यह निष्कर्ष निकलकर सामने आया कि करीब 65 फीसदी बुजुर्ग परिवार के तिरस्कार के शिकार हैं। 54.1 फीसदी बुजुर्गों को अपने घर में अभद्रता का सामना करना पड़ रहा है। तकरीबन 25.3 फीसदी बुजुर्ग अपने परिवारजनों के हाथों विभिन्न तरीकों से शोषित हैं। कुल 89.7 फीसदी बुजुर्गों का मानना था कि परिवार के दुर्व्यवहार के पीछे आर्थिक कारण ज्यादा होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रत्येक पांच में से एक बुजुर्ग अकेले या अपनी पत्नी के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है, यानी वह परिवार नामक संस्था से अलग रहने को विवश है। ऐसे बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। अशिक्षित बुजुर्गों की हालत और भी ज्यादा दयनीय है। अधिकतर बुजुर्ग डिप्रेशन, आर्थराइटिस, डायबिटीज एवं आंख संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं और महीने में औसतन 11 दिन बीमार रहते हैं।
विश्व में बुजुर्गों की संख्या लगभग 60 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रत्येक पांच में से एक बुजुर्ग अकेले या अपनी पत्नी के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है। यानी वह परिवार नामक संस्था से अलग रहने को विवश है। ऐसे बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। अशिक्षित बुजुर्गों की हालत और भी ज्यादा दयनीय है। अधिकतर बुजुर्ग डिप्रेशन, आर्थराइटिस, डायबिटीज एवं आंख संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं और महीने में औसतन 15 दिन बीमार रहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन बुजुर्गों को होती है, जिनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है हेल्पेज इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट बताती है कि देश के लगभग 10 करोड़ बुजुर्गों में से पांच करोड़ से भी ज्यादा बुजुर्ग आए दिन भूखे पेट सोते हैं। देश की कुल आबादी का आठ फीसदी हिस्सा अपने जीवन की अंतिम वेला में सिर्फ भूख नहीं, बल्कि कई तरह की समस्याओं का शिकार है। रिपोर्ट बताती है कि बुजुर्गों को राज्य सरकारों की ओर से जो पेंशन दी जा रही है, वह इतनी नाकाफी है कि उससे महीना भर तो क्या, चार दिन भी बसर हो सकना असंभव है।
बुजुर्गों की देखभाल के लिए वर्ष 2007 में मेन्टीनेंस एण्ड वेलफेयर आॅफ पेरेन्ट्स एवं सीनियर सिटीजन कानून का निर्माण हुआ था। इस कानून के अनुसार वृद्ध माता-पिता को यह अधिकार है कि वे अपने भरण-पोषण के लिए अपनी सन्तान से गुजारा भत्ता हासिल कर सकते हैं। गुजारा खर्चा नहीं देने वाली सन्तानों पर जुर्माना एवं कारावास की सजा का प्रावधान है। बुजुर्गों को हालांकि इस कानून की कोई जानकारी नहीं है। यदि कुछ लोगों को जानकारी है तो सामाजिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए वे कोई कार्यवाही नहीं करते। सामाजिक मूल्यों के अवमूल्यन के कारण बुजुर्गों का मान-सम्मान घटा है और वे एक अंधेरी कोठरी का शिकार होकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। यदि बुजुर्ग माता-पिता बीमार हो गये हैं तो अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं है। अनेक बुजुर्गों को एक पुत्र से दूसरे पुत्र के पास ठोकरे खाते देखा जाता है। अनेक को घरों से निकालने के समाचार मीडिया में सुर्खियों में प्रकाशित हो रहे हैं आज भी ऐसे अनेक बुजुर्ग मिल जायेंगे जो अपनी संतान और परिवार की उपेक्षा व प्रताड़ना के शिकार हैं। बुजुर्गों की देखभाल और उनके सम्मान की बहाली के लिए समाज में चेतना जगाने की जरूरत है। सद्व्यवहार से हम इनका दिल जीत सकते हैं।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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