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लव कुमार ‘प्रणय’ की *गज़ल*

करूँ क्या मैं उसे अब याद करके
वो खुश तो है मुझे बरबाद करके

सुना है हो गई बहरी अदालत
मिलेगा क्या भला फरियाद करके

दुआयें लाख देगा कैद पक्षी
कभी तो देखना आजाद करके

सितम कितने भी तुम करलो नहीं डर
मैं लाया दिल सनम फौलाद करके

कभी देखो किसी का घर बसा कर
बहुत मिलती खुशी आबाद करके

बताऊँ क्या कि कैसा दोस्त मेरा
वो खुश होता बहुत नाशाद करके

कमालो तुम दुआओं का खजाना
गरीबों की ‘प्रणय’ इमदाद करके

ग़ज़ल-2

किसी के आगे झुका न होगा
वो इससे पहले हँसा न होगा

कहाँ हो साक़ी इधर तो आओ
बिना तुम्हारे नशा न होगा

लिखे हुये ख़त मिलेंगे कैसे
जो उनके घर का पता न होगा

वफ़ा की बातें तभी हैं अच्छी
अगर कोई बेवफा न होगा

सुनोगे सबकी करोगे मन की
कभी किसी से गिला न होगा

भले ही कुन्दन हो पर ‘प्रणय’ वो
तुम्हारे जैसा खरा न होगा

लव कुमार ‘प्रणय’
अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश )

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