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वीजा नियमों में बदलाव को टालना ट्र्ंप की मजबूरी

सबसे पहले तो यह साफ हो जाना चाहिए कि एच-1 बी वीजा नियमों में बदलाव को टालना अमेंरिकी राष्ट्र्पति ट्र्ंप की मजबूरी है तो दूसरी और भारतीय कूटनीति और युवा कौशल की शानदार जीत। अमेरिकी नागरिकता व आव्रजन सेवा के मीडिया रिलेशंस प्रमुख जोनाथन द्वारा वीजा नियमों में किसी तरह के बदलाव पर विचार नहीं किए जाने की घोषणा से भारत के साढ़े सात लाख युवाओें की राहत की बात करना इस मायने बेमानी है कि अगर आव्रजन नियमों में बदलाव किया भी जाता तो इससे भारतीय युवाआंे से ज्यादा नुकसान अमेरिका के साॅफ्टवेयर कारोबार को होने जा रहा था। देखा जाए तो यह भारतीय युवाओं और भारतीय कौशल की जीत है। आज अमेरिका का 65 फीसदी साॅफ्टवेयर कारोबार भारतीय युवाओं पर निर्भर है। हांलाकि यह भी भारत की सबसे बड़ी विजय है कि अमेरिकी सरकार के इस विचार मात्र का विरोध अमेरिका में ही सबसे ज्यादा हुआ। वहां की साॅफ्टवेयर कंपनियां भारतीय युवाआंे के पक्ष में खड़ी हो गई और डेमोक्रेटिक सांसदों ने खुले तौर पर कहा कि इससे केवल भारत के साथ संबंध ही खराब नहीं होंगे बल्कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। वैसे भी आर्थिक उदारीकरण के बाद से अमेरिका आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यहां तक कि बैंकों तक के बंद होने की स्थितियां देखी जा चुकी है। अमेरिका में बेरोजगारी चरम पर है।
एच-1 बी वीजा नीति 1990 में तत्कालीन राष्ट्र्पति जार्ज बुश ने शुरु की थी। एक मोटे अनुमान के अनुसार अमेरिका में प्रतिवर्ष 85 हजार युवाओं को एच-1 बी वीजा जारी करने की सीमा है। इस सीमा में आधे से अधिक वीजा पाने वाले भारतीय युवा होते हैं। सामान्यतः एस-1 वीजा विदेशी पेशेवरों को जारी किया जाता है। इससे विदेशियों को अमेरिका में अस्थाई रुप से काम करने का अवसर मिल जाता है। बाद में अमेरिका की स्थाई नागरिकता हासिल करने में भी यह सहायक होता है। नियमों में बदलाव से सबसे ज्यादा नुकसान आईटी कंपनियों को होने वाला था। नियमों के अनुसार वीजा धारक को काम के बदले कम से कम 60 हजार अमेरिकी डाॅलर देना आवश्यक हैं वहीं अमेरिकी आईटी प्रोफेशनल को 150 अमेरिकी डाॅलर का कम से कम भुगतान करना होता है। हांलाकि यह नियम ही अमेरिका की दूसरे देशों के पेशोवरों के लिए उनके दृष्टिकोण को साफ कर देता है। ऐसे में इंफोसिस, विप्रो,टीसीएस, एचसीएल टेक जैसी कंपनियों को विदेशी पेशेवरों खासतौर से भारतीय पेशेवरों को काम पर रखना सस्ता पड़ता है। इसके अलावा भारतीय आईटी पेशेवरों की अपनी पहचान और कुशलता को लोहा आज सारी दुनिया मानती है। ऐसे मंे यदि वीजा नियमों में सख्ती होती, किसी तरह का बदलाव हो भी जाता तो अमेरिका का आईटी सेक्टर चरमराकर रह जाता इसमंे कोई संदेह नहीं है।
अमेरिका के 45 वें राष्ट्र्पति डोनाल्ड ट्र्म्प ने शपथ ग्रहण के साथ ही अमेरिकी नागरिकोें को स्वदेशी का संदेश दिया। शपथ ग्रहण के बाद देशवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने जिन दो बातों पर सर्वाधिक बल दिया है उनमें से एक बाय अमेरिकन-हायर अमेरिकन तो दूसरा संदेश दुनिया से इस्लामी आतंकवाद का खात्मा। अमेरिका के अब तक के सबसे उम्रदराज राष्ट्र्पति चुनाव प्रचार के दौरान लगातार विवादों से जुड़े रहे और यह सिलसिला शपथ के अवसर पर भी जारी रहा। डोनाल्ड ट्र्म्प अमेरिका के गैरसियासी राष्ट्र्पति है। ट्र्म्प देश की कीमत पर अंतरराष्ट्र्ीय मुद्दों पर पहल करने के पक्ष में नहीं है। यह उनके चुनाव केम्पेन के समय ही साफ हो गया था। यही कारण है कि चुनाव केम्पेन और पूरे चुनाव अभियान के दौरान ट्र्म्प से भारी हिलेरी को माना जा रहा था। पर जिस तरह से अमेरिकी मतदाताओं ने परिणाम दिए उससे स्थिति साफ हो गई और लगभग हमारे देश में गत लोकसभा चुनाव परिणामों जैसी ही स्थिति उभर कर आई। उन्होंने साफ कर दिया कि अब अमेरिकी नीतियों में पहली और महत्वपूर्ण प्राथमिकता अमेरिकी हितों को होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इण्डिया की तर्ज पर मेक अमेरिका को अमली जामा पहुंचाने का साफ संदेश दिया गया । संदेश साफ था कि अमेरिकी युवाओं को बेहतर शिक्षा, बेहतर रोजगार और बेहतर कारोबार के अवसर मिलेंगे। अमेरिका की वीजा नीति में भी बदलाव इसी दिशा में बढ़ता कदम होता पर वीजा नियमों में बदलाव नहीं करने का निर्णय निश्चित रुप से अमेरिका के हित में किया गया निर्णय ही माना जाएगा।
यह सही है कि पिछले लंबे समय से अमेरिका की आर्थिक स्थिति डांवाड़ोल अवस्था में चल रही है। नवें दशक के उदारीकरण और वैश्वीकरण से अमेरिकी अर्थ व्यवस्था प्रभावित हुई। शीतयुद्ध की समाप्ति और सोवियत रुस के अंतरराष्ट्र्ीय राजनीति में दखल कम होने का परिणाम यह रहा कि दुनिया में अमेरिका की दखलदांजी अधिक बढ़ी। इससे अतंरराष्ट्र्ीय स्तर पर तो अमेरिका विश्व की केवल और केवल एक मात्र डाॅन के रुप में उभरा पर आंतरिक रुप से देश खोखला भी हो गया। अमेरिकी युवाओं का शिक्षा के प्रति रुझान कम हुआ, जो नाॅलेज और कौशल अमेरिकी युवाओं मंे होना चाहिए था और अमेरिकी उद्योग धंधों व उद्यमियों में अमेरिकी युवाओं की भागीदारी होनी चाहिए थी उस पर विदेशी युवाओं की भागीदारी अधिक हो गई। इसके अलावा वैश्विक नेता बनने के चक्कर में अमेरिकी दखलंदाजी जिस तरह से बढ़ी, सैनिक हस्तक्षेप बढ़ा, उससे अमेरिका की विदेशी सहायता का दायरा अधिक बढ़ गया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि डोनाल्ड टं्र्प का अमेरिका को ग्रेट बनाने का संदेश अपने मायने रखता है। देशवासियों को बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन का संदेश देकर स्वदेशी पर जोर दे दिया है। हांलाकि अब लगने लगा है कि नब्बे के दशक के विश्वव्यापी उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और सूचना के विस्पोट की रिवर्स स्थिति बन सकती है। आर्थिक उदारीकरण का माॅडल अब बदलता लग रहा है। नोटबंदी के बाद लगभग ऐसी स्थिति हमारे देश में भी आ गई है। डोनाल्ड ट्रंप देशवासियों को बार बार यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका का पुराना गौरव कहीं खो गया है, उस गौरव को प्राप्त करना प्रत्येक अमेरिकीवासी का दायित्व और अधिकार है।यह सब साफ होने के बावजूद अमेरिका को पहले अपने देश के युवाओं में कौशल विकास पर जोर देना होगा। युवाओं में स्किल डवलपमेंट की कार्य योजना बनाकर आगे बढ़ना होगा अन्यथा स्थिति में वीजा नियमों में बदलाव या विदेशी पेशेवरों पर अंकुश से अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी और इससे होने वाले नुकसान की भरपाई अमेरिका के लिए और भी बुरी हो सकती है। ऐसे में ट्र्ंप प्रशासन का वीजा नियमों में बदलाव नहीं करने का निर्णय उसे आत्मघाती होने से बचाने में सहायक ही होगा।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,
रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

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