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दलित राजनीति का नया आगाज

दलित का मतलब पीड़ित ,शोषित व्यक्ति से है। अनुसूचित जाति को दलित बताया जाता है। दलित शब्द पूर्णता जाति विशेष को बोला जाने लगा हजारों वर्षों तक अस्पृश्य या अछूत समझी जाने वाली उन तमाम शोषित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त होता है। संवैधानिक भाषा में इन्हें अनुसूचित जाति कहां गया है। भारतीय जनगनणा 2011 के अनुसार भारत की जनसंख्या में लगभग 16.6 प्रतिशत या 20.14 करोड़ आबादी दलितों की है। आरोप है कि स्वर्ण जाति ने हजारों वर्षों से दलित कही जानेवाली जाति के लोगों का शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न और शोषण किया जिसके फलस्वरूप इस समुदाय के लोग कभी ऊपर नहीं उठ पाए। रामचंद्र वर्मा ने अपने शब्दकोश में दलित का अर्थ लिखा है, मसला हुआ, मर्दित, दबाया, रौंदा या कुचला हुआ, विनष्ट किया हुआ।
आजादी के बाद दलित का अर्थ काफी बदल गया है। भारत में दलित आंदोलन की शुरूआत ज्योतिराव गोविंदराव फुले के नेतृत्व में हुई। ज्योतिबा पहले शख्स थे जिन्होंन दलितों के अधिकारों के साथ-साथ उनकी शिक्षा की भी पैरवी की। इसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम महात्मा गांधी और बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने किया। संविधान निर्माता डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर के प्रयासों से दलित समुदाय ने स्वतंत्रता के साथ जीना सीखा। डॉ. आंबेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं। डॉ. आंबेडकर ने दलितों को शिक्षित करो ,संघर्ष करो और संघटित करो का नारा दिया। आंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी चुनावी मोर्चे पर सफल नहीं हुई हुए उनके देहांत के बाद तिनके की तरह बिखर गई।
आजादी के बाद सातवें दशक तक कांग्रेस पार्टी दलितों की सर्वेसर्वा रही। समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने जाति तोड़ों का नारा बुलंद किया और पिछड़े पावे सौ में साठ की वकालत की। उन्होंने अपनी पार्टी में रविराय को संसदीय दल का नेता बना कर दलितों को आगे बढ़ाया। लोहिया के बाद दलित राजनीति पर कांग्रेस का वर्चस्व रहा। जनता पार्टी के शासन में जगजीवन राम ने कांग्रेस से अलग होकर दलितों की हिमायत का परचम लहराया मगर यह भी अधिक दिनों तक नहीं चला। आठवें दशक के बाद कांशीराम दलितों के नए मसीहा के रूप में उभरे। कांशीराम ने दलितों की भावना को भड़काया और उन्हें एकजुट करने में सफलता प्राप्त की। कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया जिसने तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार नारे के साथ कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों के सारे समीकरण बिगाड़ दिए । कांशीराम को मायावती जैसी सहयोगी मिलने के बाद उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता हासिल करने में ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ा। कांशीराम के निधन के बाद मायावती दलितों की एकछत्र नेता के रूप में स्थापित होगयी।
धीरे धीरे दलित राजनीति ने एक नयी अंगड़ाई ली। अब वे किसी एक दल की पकड़ में नहीं रहे। रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे नेताओं की दलितों पर पकड़ कमजोर हो रही है। भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में दलितों की अधिकांश सीटों पर सफलता प्राप्त करली। एक दलित को राष्ट्रपति के पद पर बैठकर भाजपा ने दलित राजनीति को लुभाने का जबरदस्त प्रयास किया। अब जैसे जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आते जारहे है वैसे वैसे दलित सियासत में नया उफान देखा जा सकता है। गुजरात में जिग्नेश मेवानी जैसे युवा नेता ने प्रधानमंत्री को ललकारा है और 2019 के चुनाव में देख लेने की धमकी तक दे डाली है। कन्हैया कुमार ,हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और शेहला रशीद का साथ भी मेवानी को मिला है। यूपी में भीम आर्मी के नेता रावण भी काफी जोशखरोश में है। आज जिग्नेश मेवानी और चंद्रशेखर रावण दलित राजनीती के अगले अध्याय को शुरू कर रहे हैं । भविष्य में उनका संघर्ष कितना सफल होगा यह देखने और विचारने का विषय है। ये लोग दलित आन्दोलन को वैसा ही कोई महत्वपूर्ण हथियार देंगे जैसे मायावती ने प्रतीकों की राजनीति कर के दिया था। दलित, पिछड़े और मुस्लिम का एक नया गठजोड़ स्थापित हो रहा है। इसके साथ महाराष्ट्र जैसे राज्य में दलित राजनीति की चिंगारी शोले का रूप ले रही है। हालाँकि अभी कहा नहीं जासकता की दलित राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा मगर अब दलितों की चुनौती सभी राजनीतिक दलों पर भारी पड़ेगी इसमें कोई संदेह नहीं है।
दलित राजनीति को वर्तमान में एक नए दौर के आगाज के रूप में देखा जा रहा है। देखना यह है कि यह आगाज दलित राजनैतिक शक्ति को भाजपा की ओर ले जाएगा, या बसपा के लिए संजीवनी बनेगा अथवा उग्र आंबेडकरवाद का मार्ग प्रशस्त करेगा।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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