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राजद के लिए आसान नहीं ‘राज’ की राह

लालू यादव अब कैदी हैं। करोड़ों रूपये के चारा घोटाला में वे मुजरिम हैं। सजायाफ्ता हैं। उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अब कठिन परीक्षा के दौर में है। तेजस्वी यादव अपने राजनीतिक सफर के शुरूआती दौर में मुश्किल में हैं। सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में पार्टी बिखरने का भी डर है। राजद परेशानियों से घिरी है। बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अब तक के राजनीतिक सफर में काफी प्रभावित किया है। बावजूद इसके लालू की अनुपस्थिति में नेतृत्व की कमी को दूर करना राजद के लिए चुनौती तो है ही। लालू यादव, उनके पूरे परिवार और राजद की राजनीतिक मैदान पर अब राह आसान नहीं दिखती। राजद के लिए बिहार की सियासत में वापसी अब एक कठिन चुनौती है।

राजद की रणनीति और प्रबंधन तेजस्वी यादव के हाथों में है। तेजस्वी के नेतृत्व में युवा शक्ति को बिहार में गोलबंद करने का लक्ष्य राजद ने बनाया है। लेकिन युवाओं को गोलबंद कर नीतीश सरकार की विफलताओं और घोटालों के खिलाफ जमीनी स्तर पर आन्दोलन को सफल करना राजद और तेजस्वी के लिए आसान नहीं है। राजनीति के पंडितो का मानना है कि लालू के जेल में रहने से नीतीश की राह आसान हो जायेगी। लेकिन बिहार की सियासत कभी इतनी आसान नहीं रही है। यह बात जरूर है कि लालू के जेल जाने का लाभ नीतीश कुमार को मिलेगा।

तेजस्वी राजनीति में अभी नये हैं। संगठन की राजनीति का अनुभव उनके पास बहुत कम है। तेजस्वी के लिए सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रख पाना है। हालांकि एक बात जो राजद को राहत देती है कि लालू यादव के जेल जाने से राजद के वोटो में बिखराव कभी नहीं हुआ। लालू यादव की छवि एक जन नेता की है। घोटालो में दोषी होने के बाद भी लालू के प्रशंसक उन्हें भगवान मानते हैं। संकट के समय राजद मजबूत बनकर उभरी है। कार्यकर्ताओं ने साथ दिया है। बिहार के मुसलमान जदयू की अपेक्षा राजद के साथ ज्यादा रहे हैं। यही कारण थे कि 2015 में राजद बिहार में सबसे ज्यादा सीट प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टी बनी।

राजनीतिक विश्लेषक फिलहाल अपनी अपनी राय दे रहे हैं। लोगों की राय है कि राजद के लिए हालात अब ठीक नहीं है। बिहार की राजनीति की बुनियाद जातीय समीकरण है। नीतीष कुमार कुर्मी हैं। नीतीश कुमार की पकड़ कोयरी और कुर्मी पर मजबूत है। राजद की लड़ाई भाजपा और जदयू से है। जदयू अब भाजपा के साथ गठबंधन में है। इस परिदृष्य के कारण राजद से कोयरी, कुर्मी अलग दिखता है।

तेजस्वी ने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय गठबंधन टुटने के बाद सदन में अपने भाषण से दिया था। तेजस्वी को लेकर राजद आशान्वित है। राजद के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके नेता जेल के भीतर हैं। छोटे दल इसका लाभ उठा सकते हैं। राजद के जातीय समीकरण में छोटे दल सेंध लगाने की कोशिश करेगें। हालांकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद ने भी अपनी तैयारी कर रखी है। सियासत में सेंधमारी इतनी आसान भी नहीं है। राजद में अब उत्तराधिकारी की समस्या नहीं है। लेकिन तेजस्वी और मीसा पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ऐसे में हर तरफ राजद के लिए मुश्किलें ही दिखती है।

तमाम आरोपों घोटालों के बावजूद लालू यादव की एक खासियत रही है कि वे जल्दी घबराते नहीं है। विपक्षी भी इस बात कर लोहा मानते हैं। लालू ने ठेठ अंदाज को अपनी ताकत बनाकर अपने समर्थकों के बीच अपने पकड़ को मजबूत बनाया। लालू पर कार्रवाइयों के कारण लालू के समर्थकों में सहानूभूति पनपी है। यह कहा जा सकता है कि लालू के जेल जाने से उनके वोट बैंक में बिखराव मुश्किल है। लालू के उपर कार्रवाई से राजद इसे भाजपा की साजिश बता रहा है साथ ही नीतीश कुमार को इस साजिश में साथ देनेवाले के तौर पर राजद पेश कर रही है। यह उसी रणनीति का हिस्सा है जिससे कि भाजपा विरोध की राजनीति प्रबल हो। सहानूभूति जन्म ले।

लालू यादव अब कभी चुनाव नहीं लड़ सकते। तेजस्वी और तेजप्रताप जनता के बीच जाएंगे। लालू के उपर कार्रवाई को वे भाजपा की खीझ के तौर पर जनता के समक्ष रखेंगे। राजद तमाम परिस्थितियों के लिए नीतीश कुमार और भाजपा पर आरोप लगाकर इसका राजनीतिक फायदा उठाने की हरसंभव कोशिश करेगी। राजद के लिए राहत की बात यह कि दोनों बेटे राजनीति में उभर रहे हैं। तेजस्वी और तेजप्रताप की जोड़ी अपने अपने अंदाज में दिखाई पडती है। तेजस्वी सुलझे हुए प्रतीत होते हैं। तेजप्रताप लालू की तरह आक्रमक दिखते हैं। तेजस्वी यादव ने नेतृत्व देने का प्रयास किया है। लालू के जेल जाने के बाद वे आक्रमक दिखे हैं। दोनों ने पार्टी को संभालने का हर संभव प्रयास किया है।

राजद में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता हैं। वे अपने नेता लालू को मानते हैं। तेजस्वी अभी युवा हैं। वरिष्ठ नेता तेजस्वी को अपना नेता अब भी नहीं मानते। पार्टी में कई नेताओं को तेजस्वी का नेतृत्व असहज करता है। तेजस्वी को अपना नेतृत्व साबित करना होगा तभी राजद बिहार की सियासत में वापसी कर सकती है। यह तय है कि राजद तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सहानूभूति का कार्ड खेलेगी। लालू के जेल जाने की घटना को भाजपा की साजिश के तौर पर शुरूआत से प्रचार किया जा रहा है। यह राजद की भावनात्मक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। तेजस्वी यादव अपनी आक्रमकता जाहिर कर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि हम मुश्किलों में डरते नहीं, संघर्ष करते हैं। तेजस्वी के तेवर किस हद तक राजद के लिए संजीवनी का काम करता है यह भविष्य के गर्भ में है। तमाम पहलुओं पर नजर दौड़ाने के बाद एक ही बात स्पष्ट होती है कि लालू परिवार और राजद की राजनीतिक राज सत्ता हासिल की राह फिलहाल आसान नहीं है।

संजय मेहता

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