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अपनों से ही शर्मसार होती मानवता

यह आंकड़े भले ही दिल्ली के हो पर कमोबेस यह तस्वीर सारी दुनिया की देखने को मिलेगी। दिल्ली पुलिस द्वारा राजधानी दिल्ली में 2017 की आपराधिक गतिविधियों के इसी माह जारी आंकड़ों में कहा गया है कि रेप के 97 फीसदी मामलों में महिलाएं अपनों की ही शिकार होती है। अपनों से मतलब साफ है कि या तो रिश्तेदार या जान-पहचान वाले या फिर दोस्त। इसका मतलब यह है कि रेप के मामलों में ले देकर यही निकल के आता है कि रेप करने वाला आरोपी और रेप पीड़िता एक दूसरे को जानते हैं। इस जानपहचान का ही फायदा उठाते हुए महिलाओं को अपना आसानी से शिकार बना लेते हैं। 97 फीसदी का आंकड़ा दिल्ली का जरुर है पर दुनिया के किसी भी कोने में महिलाओं के प्रति अपराध का आंकड़ा लगभग इसी के आसपास देखने को मिलेगा। यह दूसरी बात है कि गाहे बेगाहे निर्भया जैसे कांड अंजान लोगों द्वारा कर दिए जाते हैं और मीडिया की सुर्खियां बन जाते हैं। निर्भया जैसे कांड होते ही सरकारी, गैरसरकारी संगठन और ना जाने कौन-कौन आगे आकर झकझोरने की कोशिश में जुट जाते हैं। यहां निर्भया जैसे कांड को कमतर देखने की कतई मंशा नहीं है और इस तरह की घटनाओं की जितनी निंदा की जाए वो कम है और यह भी कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति ना हो इसके लिए सख्त से सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। पर देखना यह है कि अखबारों में प्रतिदिन कोई ना कोई समाचार रेप या छेड़छाड़ का अवश्य आ जाता है जो अपने आप में गंभीर व मानवता का शर्मसार करने वाला है।
निर्भया कांड पर जिस तरह से दिल्ली ही नहीं देश भर में विरोध के स्वर गूंजे थे और जैसे सरकारी, गैरसरकारी संगठनोें ने महिला अपराधों की रोकथाम के लिए जनचेतना से लेकर कानूनी प्रावधानों तक में बदलाव की चर्चाएं की थी, उपाय सुझाने-खोजने में लगे थे परिणाम तो ठीक उसके उलट ही देखने को मिले। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के जो आंकड़े सामने आये हैं वे सभ्य समाज के लिए शर्मनाक तो है ही बेहद निराशाजनक है। लगता है जैसे हमसे तो आदिम समाज ही ठीक था। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2015 में देश में 34,651 मामलें रेप से संबंधित दर्ज हुए हैं। शरीर से छेड़छाड़ के मामलें देखे तो यही कोई 8 लाख से ज्यादा मामलें एक वर्ष में ही पुलिस के सामने आए हैं वहीं रेप के प्रयास के मामलों को देखे तो यह आंकड़ा एक लाख 30 हजार को पार था। हांलाकि संतोष की बात यह है कि रेप के 96 फीसदी मामलों में अदालत में चालान पेश करने के साथ ही 29 फीसदी मामलों मंे सजा भी सुनाई जा चुकी है। महिलाओं से छेड़छाड़ हो या मर्यादा हनन, अपहरण हो या क्रूरता सभी क्षेत्रों में ब़ढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि देश दुनिया में आज भी महिलाएं सुरक्षित नहीं है। हांलाकि महिलाओं के प्रति अपराध में बढ़ोतरी के कई कारण है। यह भी सही है कि देश में कतिपय महिलाओें द्वारा महिला सुरक्षा के लिए बने कानून का दुरुपयोग व झूठे आरोप लगाने के मामलें भी तेजी से सामने आ रहे हैं और रेप के आरोप को हथियार बनाकर ब्लेकमेंलिग कर लूटने का रास्ता अख्तियार भी किया जाने लागा है।
सभ्य समाज में महिलाओं के साथ छेड़-छाड, अभद्र व्यवहार या रेप जैसी घटनाएं बेहद चिंतनीय है। दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद देश भर में जिस तरह से महिलाओं के सम्मान के प्रति जनभावना और युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखाई दिया, उससे लगा था कि अब संवेदनशीलता बढ़ेगी और असामाजिक तत्वों पर प्रभावी रोक लगेगी। पर आए दिन की घटनाओं और पुलिस द्वारा समय-समय पर जारी आंकड़ों ने तो इस स्थिति को पूरी तरह से झूठला ही दिया है। समाज व युवाओं के विरोध के स्वर से आशा की किरण जगी थी पर पिछले दिनों कोने-कोने में रेप की घटनाएं बेहद चिंतनीय है। अधिक चिंतनीय यह है कि रेप या इस तरह की घटनाआंें को राजनीतिक व सांप्रदायिक रुप दिया जाने लगा है और राजनीति व सांप्रदायिकता की आग में महिलाओें की इज्जत तार-तार होने के साथ ही सामाजिक ताने-बाने मे बिखराब आने लगा हैै।
महिलाओं के प्रति अपराध विश्वव्यापी समस्या है। अमेरिका की जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता ईव एंसलर ने पिछले वर्षों से अभियान चलाकर महिला अस्मिता के प्रति आवाज बुलंद की। वैजाइन मोनोलाॅग्स व गुड बाॅडी जैसे नाटकों की लेखिका वीडे नाम से एनजीओ का संचालन करने वाली ईव एंसलर ने बस, अब और नहीं, से अभियान का आगाज किया था। इस अभियान को वन बिलियन राइजिंग नाम दिया गया। करीब 200 देशों में हजारों गैरसरकारी संगठनों के सामूहिक प्रयासों से इस जागरुकता अभियान में भागीदारी निभाई। इस अभियान से जुड़कर सेलिबिट््री, युवक-युवतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और वुद्धिजीवियों द्वारा महिला अस्मिता के लिए संघर्ष किया जा रहा है। हमारे यहां अनुष्का शंकर, नंदिता दास, राहुल बोस, फरहान अख्तर, जावेद अख्तर, मल्लिका साराभाई, शबाना आजमी आदि सामाजिक कार्यकर्ताओं व सेलिब्रिटिज ने महिलाओं के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई है।
मजे की बात यह है कि आज सभ्य समाज का दावा करने के बावजूद महिलाएं सुरक्षित नहीं है। देश में रक्षा मंत्री तक का भार महिला के जिम्मे हैं। देश की रक्षा मंत्री सीतारमण सुखोई में उड़ानभर कर महिला शक्ति का प्रदर्शन कर रही है। महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकली है, नए नए क्षेत्रों में सफलता के परचम पहरा रही है। कंपनियों में महिला डायरेक्टर की नियुक्ति की जा रही हैं पर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इतना सब होने के बाद भी महिलाओं के सम्मान को कदम-कदम पर ठेस भी पहंुचाई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र् संघ के आंकडों के अनुसार दुनिया में हर तीन में से एक महिला का कभी ना कभी शारीरिक-मानसिक शोषण होता है। आंकड़ें वास्तव में चैकाने वाले हैं। दुनिया में 71 फीसदी महिलाएं शारीरिक-मानसिक या यौन शोषण व हिंसा का शिकार होती है। अमेरिका मंे प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं अपने परिचितों द्वारा ही मार दी जाती है। दक्षिण अफ्रिका मंे हर 6 घंटे में एक महिला को उसके साथी द्वारा ही मौत के घाट उतार दिया जाता है। हमारे देश में 53 मिनट में यौन शोषण व 28 मिनट में अपहरण के मामलें सामने आते हैं। अब तो रेप व छेडछाड के मामलों में भी लगतार बढ़ोतरी हो रही है। यह आंकड़े भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण हो पर इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि महिला अस्मिता को ठेस पहुंचाने के मामलें कम नहीं हो रहे हैं। तस्वीर का निराशाजनक पहलू यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद महिलाओं के अस्मत से खिलवाड, फब्तियां कसने, यौन शोषण, जबरन छूने, मानसिक कुंठा का इजहार करने के मामलें अधिक आए हैं। सबसे निराशाजनक यह कि टेलीविजन पर सर्वाधिक देखे जाने वाले सीरियलों में महिलाओं द्वारा महिलाओं के खिलाफ साजिशों को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है जिससे मानसिकता प्रभावित हो रही है।
महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों खासतौर से रेप व छेड़छाड़ के मामलों में रिश्तेदारों या परिचितों का अधिक हाथ होना इस बात को दर्शाता है कि हमारा सभ्य समाज में जीने का दावा पूरी तरह से गलत है। आदिम समाज से उपर उठने की बात बेमानी होती जा रही है।कहने को हम अधिक सुशिक्षित और सुरक्षित हो गए हैं। साक्षरता का स्तर बढ़ा है, अधिक साधन संपन्न हो गए हैं। सुविधाओं का विस्तार हुआ है, जीवन सहज,सरल और अधिक आसान हुआ है पर मन में दबी कलुषिता में कहीं कोई कमी दिखाई नहीं दे रही है। आखिर समाज जा कहां रहा है। समाज विज्ञानियों को इसके कारण खोजने होंगे।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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